“शिक्षा वह नहीं जो बाहर से थोप दी जाए, शिक्षा वह है जो भीतर से प्रकट हो – ओशो”

ओशो- हम आज सारी दुनिया में पिछड़े हुए हैं, उसका एक कारण है कि हमारी शिक्षा आज भी उत्तर पर निर्भर है। अभी भी प्रश्नों पर निर्भर नहीं है। बट्र्रेंड रसल ने लिखा है कि जब मैं बच्चा था तो मैं सोचता था कि फिलासफी पढूंगा, दर्शन शास्त्र पढूंगा, तो मुझे सब उत्तर मिल जाएंगे। अब जब मैं बूढ़ा हो गया हूं, नब्बे वर्ष पार कर रहा हूं, तब मैं यह कहना चाहता हूं कि वह मेरी बड़ी भूल थी कि मैं सोचता था कि सब प्रश्नों के उत्तर मिल जाएंगे। अब मैं नब्बे वर्ष में जानता हूं कि जो उत्तर बचपन में उत्तर मालूम पड़ते थे वह भी उत्तर नहीं रहे हैं, और हजार नये प्रश्न खड़े हो गए हैं, जिनका कोई उत्तर नहीं है। तो उसने लिखा है कि पहले मैं परिभाषा करता था फिलासफी की कि वह शास्त्र जो उत्तर देता है। अब मैं परिभाषा करना चाहता हूं, वह शास्त्र जो प्रश्न देता है। पुराना शिक्षक उत्तर देता था। जो उत्तर हमें मालूम न था वह बता देता था। नया शिक्षक प्रश्न देगा, जो प्रश्न हमें नहीं मालूम, वह हममें जगा देगा। और जब प्रश्न जगता है किसी के प्राणों में तो एक बड़ी क्रांति हो जाती है। और जब उत्तर आता है, तो क्रांति नहीं होती, बड़ा संतोष हो जाता है।

नहीं, मरे हुए उत्तर नहीं चाहिए, जीवंत प्रश्न चाहिए। क्यों? ताकि हम अपने उत्तर की खोज पर निकल सकें। और जब कोई व्यक्ति प्रश्नों को लेकर उत्तर की खोज पर निकलता है, तो उसका जीवन एक यात्रा बन जाती है। नया शिक्षक नई पीढ़ियों को जीवन की खोज की, जिज्ञासा की यात्राओं पर निकलने का माध्यम बनना चाहिए–अतीत के प्रश्नों को दोहरा देने वाला, अतीत के उत्तर हाथ में दे देने वाला नहीं। भविष्य के प्रश्नों को जगाने वाला, और भविष्य के अनजान प्रश्नों में आतुरता भरने वाला–तो शिक्षक नई स्थिति में, नया मापदंड और नया मूल्य बन सकता है। जैसा मैंने कहा, शिक्षा का मौलिक और गहरे से गहरा अर्थ–वह जो भीतर है वह बाहर लाना है। इसका मैं कुछ उदाहरण देना चाहूंगा।

रवींद्रनाथ को उनके घर के लोग पढ़ा रहे हैं, लेकिन वह हैं कि वे पढ़ते नहीं हैं। कुछ उनके भीतर है जो बहुत भिन्न है। गणित पढ़ाया जाता है और गणित उनकी पकड़ के बाहर है। जिसकी भी कवि होने की संभावना है, गणित उसकी पकड़ के बाहर होगा। गणितज्ञ और कवि एक साथ होना असंभव है, क्योंकि गणित के नियम बहुत और हैं, काव्य के नियम बहुत विपरीत हैं। गणित में दो और दो चार होते हैं, काव्य में कभी दो और दो तीन भी होते हैं और कभी पांच भी होते हैं। असल में काव्य तरल है, गणित ठोस है। गणित बिलकुल पथरीला है और काव्य बहुत तरल और बहाव वाला है। गणित के अपने नियम हैं और काव्य के अपने नियम हैं। गणित के नियम गणित की दुनिया में ठीक हैं और काव्य के नियम काव्य की दुनिया में ठीक हैं। अगर गणितज्ञ कविता लिखेगा तो बड़ी बेरस होगी।

आइंस्टीन की पत्नी गणितज्ञ नहीं थी, कवि थी, आइंस्टीन तो गणितज्ञ था। वह पहली रात को ही उसकी पत्नी जब उसे मिली थी, तो उसने एक कविता सुनानी चाही थी। पहली रात को जो कवि नहीं होते वे भी कविताएं सुनाते हैं, तो वह कवि थी। उसने कविता सुना देनी चाही। लेकिन आइंस्टीन कविता को ऐसे सुनता रहा, जैसे कोई परीक्षक सुनता है, या तो पुलिस का इंस्पेक्टर सुनता है, वैसा सुनता है। पूरी कविता सुनने के बाद उसने कहाः एब्सर्ड, एब्सर्ड, एब्सर्ड बिलकुल बेकार है!

उसकी पत्नी ने कहाः क्या कहते हैं आप? कई लोगों ने इसकी प्रशंसा की है। उसने कहा, वे कुछ जानते नहीं होंगे। क्योंकि उसने उस कविता में कुछ प्रेमी की, प्रेयसी की बात की है और प्रेमी प्रेयसी के लिए कह रहा है कि तेरा चेहरा चांद जैसा सुंदर है। आइंस्टीन कहता है, हो ही नहीं सकता, हो ही नहीं सकता। क्योंकि कहां चांद और कहां प्रेयसी का चेहरा, इसमें कोई अनुपात ही नहीं है। इसमें कोई प्रपोर्शन ही नहीं है। और उसने कहाः एक स्त्री के ऊपर अगर हम चांद को रख दें तो उस स्त्री का कहीं पता ही नहीं चलेगा कि वह कहां गई। चेहरा तो बन ही नहीं सकता। और उसने कहाः तुझे पता ही नहीं चांद–किसने कहा कि सुंदर है? बड़े गड्ढे हैं, खाइयां हैं, टीले हैं, बड़ा कुरूप है, किसने कहा कि चांद सुंदर है? उसकी पत्नी ने किताब बंद कर दी। उसने कहाः यह बात ही बंद करो, क्योंकि यह, इसमें कम्युनिकेशन संभव नहीं है।

रवींद्रनाथ को मां-बाप पढ़ा रहे हैं। घर में बहुत बच्चे थे। रवींद्रनाथ के घर में एक किताब रखी हुई है। अभी भी रखी हुई है। उस किताब में हर बच्चे के जन्म दिन पर घर के जो बड़े बूढ़े हैं, वे अपने बच्चों के बाबत कुछ भविष्यवाणियां करते रहे हैं। तो उसमें रवींद्रनाथ की मां ने लिखा है कि और सब बच्चे तो ठीक हैं, उनसे बड़ी आशा है, रवींद्र से कोई आशा नहीं है। कैसे आशा होगी, क्योंकि जब शिक्षक क्लास में गणित पढ़ाता है, तब वह शिक्षक का चित्र बना रहे हैं। और जब शिक्षक पढ़ाने आया है, तो वह उसके नाक-नक्शे का ध्यान कर रहे हैं कि कल उसका चित्र कैसे बन जाए। वह चूक गए, वह कभी मैट्रिक पास नहीं हुए। लेकिन भगवान की बड़ी कृपा कि उनके मां-बाप सफल नहीं हुए, नहीं तो वह मैट्रिक पास करवा सकते थे और दुनिया एक बहुत अदभुत आदमी से वंचित रह जाती। क्योंकि उस आदमी के भीतर काव्य था, और ऊपर से गणित, भूगोल और इतिहास थोपे जा रहे थे।

आत्मिक चिंतन के लिए एक बड़ी समस्या है, और वह यह कि क्या हम हर विद्यार्थी में वह थोपते जाएं जो हमने तय किया है, या किसी सिलेबस कमेटी ने तय किया है, या दिल्ली में किसी आयोग ने तय किया है। या कि उस व्यक्ति को देखें कि वह व्यक्ति क्या भीतर होने की क्षमता लेकर आया है। बड़ा कठिन है–बड़ा कठिन है, क्योंकि एक-एक व्यक्ति की क्षमता अलग है, और हमें तो मास एजुकेशन देनी है, तो यह हो नहीं सकता, यह होना बड़ा मुश्किल मालूम पड़ता है। एक-एक व्यक्ति अलग तरह का आदमी होने आया है और शिक्षा सबको एक जैसी दी जानी है। तो ऊपर से थोपने का काम ही हो सकता है।

यह ऐसे ही है कि जैसे कि किसी गांव में बहुत मरीज हों और एक ही डाक्टर हो, और उसके पास एक ही दवाई हो, और वह परेशान हो कि एक-एक मरीज की कहां जांच करूं और कहां पता लगाओ कि किसको टी. बी. है, किसको कैंसर है, किसको नजला है, किसको क्या है, और दवाई भी ज्यादा नहीं है। आदमी भी एक है और मरीज बहुत हैं, तो वह जो भी आए, उसको दवा देता चला जाए।

तो जो उस गांव की हालत हो जाए, वह दुनिया की हालत हो गई है, शिक्षकों के कारण। क्योंकि शिक्षक को एक-एक व्यक्ति के व्यक्तित्व का कोई मूल्य नहीं है। मैं आपसे कहता हूं, टी. बी. और कैंसर में जितना फर्क है उससे ज्यादा फर्क दो आदमियों में होता है। और मजा तो यह है कि दो आदमियों को भी अगर टी. बी. हो जाए तो दो तरह की टी. बी. होती है, एक तरह की टी. बी. नहीं होती है।

हमारी हाथ की रेखाएं जितनी अलग हैं और हमारे अंगूठे के निशान जितने अलग हैं। अभी मैं अंगूठे का निशान बनाऊं, तो सारी जमीन पर खोज कर भी वह निशान फिर नहीं मिल सकता है। उतना ही व्यक्तित्व अलग है। और शिक्षा को इसकी अभी तक कोई चिंता नहीं रही है। यह चिंता करनी पड़ेगी–यह चिंता करनी ही पड़ेगी। अगर यह चिंता हम नहीं कर पाएंगे तो शिक्षा का पूरा अर्थ ही प्रकट नहीं हो पाता। सबके लिए न तो भूगोल जरूरी है, सबके लिए न गणित जरूरी है, सबके लिए न काव्य जरूरी है, न पेंटिंग जरूरी है।

लेकिन हमने जो अभी दुनिया बनाई है उस दुनिया में कुछ चीजें बहुत जरूरी हैं और कुछ चीजें बिलकुल गैर-जरूरी हैं। जैसे अगर गणित में आप सफल हो जाते हैं, तो आप काम के आदमी हो जाएंगे और कविता में सफल हुए तो बेकाम हुए। अगर कविता में सफल भी हो गए तो भी भूखों मरना पड़ेगा, अगर गणित में बहुत सफल न भी हुए तो रोजी-रोटी मिल जाएगी। यह दुनिया हमने बनाई है, चारों तरफ वह जैसी सब आदमियों के लायक नहीं बनाई है और शिक्षा भी जो हम दे रहे हैं, वह किन्हीं खास ढांचों में सबको ढाल देना चाह रहे हैं। उस ढांचे में जो ठीक पड़ जाता है उसको तो आनंद आ जाता है, जो ठीक नहीं पड़ता है, वह मुश्किल में पड़ जाता है। उससे वह बहुत कठिनाई में पड़ जाता है।

इस समय जो बेचैनी है मनुष्य-जाति की और आदमी पागल होता जा रहा है, आत्महत्या कर रहा है। चित्त परेशान है, रात नींद नहीं है, मानसिक अशांति है, और जितनी शिक्षा बढ़ती है, उतना यह सब उपद्रव बढ़ता है। ऐसा कुछ मालूम पड़ता है कि शिक्षित होने में और पागल होने के अनुपात में कोई गहरा संबंध है। होता चला जाता है। आज अमरीका में पंद्रह लाख से लेकर तीस लाख लोग रोज मानसिक चिकित्सा के लिए सलाह लेते हैं। और ये सरकारी आंकड़े हैं और सरकारी आंकड़े कभी भी सही नहीं होते हैं। क्योंकि अमरीकी सरकार कैसे कहे कि कितने आदमी रोज पागलपन की हालत में हैं, तो घटा-बढ़ा कर तीस लाख बताती है। लेकिन यह संख्या इससे चैगुनी होनी चाहिए। क्रमशः….

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-3 

मरे हुए उत्तर नहीं चाहिए, जीवंत प्रश्न चाहिए

शिक्षा उत्तरों पर नहीं, प्रश्नों पर निर्भर होनी चाहिए

ओशो कहते हैं — हम आज सारी दुनिया में पिछड़े हुए हैं, क्योंकि हमारी शिक्षा अब भी “उत्तर” पर निर्भर है, “प्रश्न” पर नहीं।
ब्रिटिश दार्शनिक बर्ट्रेंड रसेल का उदाहरण देते हुए ओशो बताते हैं कि रसेल जब युवा थे तो सोचते थे कि दर्शन पढ़ने से सभी प्रश्नों के उत्तर मिल जाएंगे।
परंतु जब वे 90 वर्ष के हुए, तब उन्होंने स्वीकार किया कि बचपन में जो उत्तर सच लगते थे, अब वे भी उत्तर नहीं हैं — और उनके स्थान पर हजारों नए प्रश्न खड़े हो गए हैं।

रसेल ने कहा था —

“पहले मैं सोचता था कि दर्शन वह शास्त्र है जो उत्तर देता है,
अब मैं कहता हूँ कि दर्शन वह शास्त्र है जो प्रश्न देता है।”

पुराना शिक्षक उत्तर देता था, नया शिक्षक प्रश्न जगाएगा

ओशो कहते हैं —
पुराना शिक्षक उत्तर देता था, लेकिन नया शिक्षक वह होगा जो प्रश्न जगाएगा।
क्योंकि जब किसी व्यक्ति के भीतर प्रश्न जन्म लेता है, तो एक भीतरी क्रांति घटित होती है।
उत्तर केवल संतोष देता है, जबकि प्रश्न खोज और यात्रा का आरंभ करते हैं।

“मरे हुए उत्तर नहीं चाहिए, जीवंत प्रश्न चाहिए।
ताकि हम अपने उत्तर की खोज पर निकल सकें।”

जीवन को खोज की यात्रा बनाना है

जब कोई व्यक्ति अपने प्रश्नों को लेकर उत्तर की खोज पर निकलता है, तो उसका जीवन एक यात्रा बन जाता है।
ओशो कहते हैं — शिक्षक को नई पीढ़ी को इस यात्रा पर ले जाने का माध्यम बनना चाहिए।
वह सिर्फ अतीत के उत्तर दोहराने वाला न हो, बल्कि भविष्य के प्रश्न जगाने वाला बने।

रवींद्रनाथ टैगोर का उदाहरण – शिक्षा थोपना नहीं, भीतर से खिलाना है

ओशो रवींद्रनाथ टैगोर का उदाहरण देते हैं।
रवींद्रनाथ के घर में सभी बच्चे पढ़ाई में अच्छे थे, पर वे गणित में कमजोर थे।
उनकी मां ने परिवार की भविष्यवाणी की किताब में लिखा —

“रवींद्र से कोई आशा नहीं है।”

लेकिन यही “निराशा” एक वरदान साबित हुई।
रवींद्रनाथ के भीतर कवि था, और ऊपर से गणित, भूगोल, इतिहास थोपे जा रहे थे।
यदि माता-पिता उन्हें जबरन पढ़ाई में सफल कर देते, तो दुनिया एक महान कवि से वंचित रह जाती।

गणितज्ञ और कवि – दो अलग संसार

ओशो कहते हैं —
जिसमें कवि होने की संभावना है, उसमें गणित की समझ कमजोर होगी।
क्योंकि गणित ठोस है, नियमों से बंधा है;
जबकि काव्य तरल है, भावनाओं का प्रवाह है।

वे आइंस्टीन का उदाहरण देते हैं —
आइंस्टीन की पत्नी कवि थी। जब उसने पहली रात को कविता सुनाई,
तो आइंस्टीन ने कहा — “एब्सर्ड! बिल्कुल बेकार!”
क्योंकि उसके लिए चांद और प्रेमिका के चेहरे में कोई “अनुपात” नहीं था।
ओशो हँसते हुए कहते हैं —

“गणितज्ञ कविता नहीं समझ सकता, और कवि गणित नहीं।”

मास एजुकेशन – सबको एक जैसा बनाना सबसे बड़ी भूल

ओशो के अनुसार, आज की शिक्षा प्रणाली हर बच्चे में वही थोपती है जो किसी “सिलेबस कमेटी” ने तय किया है।
यह वैसा ही है जैसे किसी गांव में एक ही डॉक्टर हो और सबको एक ही दवाई दे दे —
बिना यह देखे कि किसे क्या बीमारी है।

हर व्यक्ति का स्वभाव, क्षमता और रचना-शक्ति अलग है।
जैसे दो अंगूठों के निशान समान नहीं होते, वैसे ही दो व्यक्तित्व भी समान नहीं हो सकते।
लेकिन शिक्षा इन अंतरों को नज़रअंदाज़ कर रही है।

हर बच्चे के भीतर की क्षमता पहचानना होगी

ओशो कहते हैं —
शिक्षा को अब यह चिंता करनी ही पड़ेगी कि हर विद्यार्थी के भीतर क्या छिपा है।
सबके लिए गणित जरूरी नहीं, सबके लिए कविता जरूरी नहीं।
पर हम ऐसी दुनिया बना बैठे हैं जहाँ अगर कोई कविता में सफल है तो भूखा रहेगा,
और अगर गणित में औसत है तो भी रोज़गार मिल जाएगा।

“हमने शिक्षा को जीवंतता की जगह रोज़ी-रोटी का साधन बना दिया है।”

शिक्षा और मानसिक असंतुलन का बढ़ता संबंध

ओशो चेतावनी देते हैं कि आज जितनी शिक्षा बढ़ रही है, उतनी ही मानसिक अशांति भी।
अमेरिका का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि वहाँ लाखों लोग रोज़ मानसिक चिकित्सक के पास जाते हैं।
यह स्थिति बताती है कि शिक्षा मनुष्य को शांत नहीं, बल्कि और अधिक बेचैन बना रही है।

“ऐसा लगता है कि शिक्षित होने और पागल होने के बीच कोई गहरा संबंध बनता जा रहा है।”

शिक्षा का सच्चा उद्देश्य – भीतर की ज्योति जगाना

ओशो अंत में कहते हैं —
शिक्षा का वास्तविक अर्थ है – “जो भीतर है, उसे बाहर लाना।”
शिक्षा का लक्ष्य बच्चे को किसी साँचे में ढालना नहीं,
बल्कि उसकी अंतर्निहित प्रतिभा को पहचानना और प्रकट करना है।

“शिक्षा वह है जो व्यक्ति के भीतर छिपे देवत्व को बाहर लाए,
न कि उसे समाज के पुराने साँचे में ठूँस दे।”