“शिक्षा में बदलाव का समय: आदेश नहीं, संवाद चाहिए,  अब सिखाने वाला विनम्र होगा, तभी सीखने वाला विनम्र हो सकेगा” _ओशो 

ओशो- परमात्मा नये में सदा से उत्सुक है, पुराने को रोज विदा कर देता है। नये को रोज जन्मा देता है। लेकिन अब तक हमारे चिंतन की जितनी धारणाएं थीं, वे पुराने को केंद्र बनाती थीं और नये को परिधि पर रख देती थीं। अब यह नहीं हो सकेगा। यह अब असंभव ही हो गया है। असंभव अब तक क्यों न हुआ था? अब तक न होने के भी कारण थे। जैसे मैंने कहा कि शिक्षक एक नई घटना है, वैसे ही युवक भी एक नई घटना है। पहले दुनिया में बच्चे होते थे और बूढ़े होते थे, युवक नहीं होता था। उसके कारण थे। युवक न हो सके, इसकी हमने पूरी व्यवस्था की थी। वह सब व्यवस्था टूट गई। छोटे बच्चों का विवाह कर देते थे, वह उन्हें कभी युवा नहीं होने देता था। विवाहित होते ही वह बूढ़े की दुनिया में प्रविष्ट हो जाते थे और एक बच्चे के बाप बन जाने के बाद–उम्र कितनी है, यह सवाल नहीं है, बाप बूढ़ा हो ही जाता है।

सारी पुरानी दुनिया में बच्चों को हम सीधा वृद्धावस्था में प्रवेश कर देते थे। बीच का जो अंतराल था, युवा होने का वह विलुप्त हो जाता था। इसलिए पुरानी दुनिया ने बगावत नहीं थी, क्योंकि बगावत न तो बच्चे कर सकते हैं, न बूढ़े कर सकते हैं। बगावत सिर्फ युवक कर सकता है। इसलिए पुरानी दुनिया में नई घटना नहीं घटती थी, क्योंकि नई घटना न तो बच्चे घटा सकते हैं, न बूढ़े घटा सकते हैं। बच्चे असमर्थ होते हैं, बूढ़े शक्तिहीन हो जाते हैं। बच्चों को कुछ पता नहीं होता और बूढ़े अब नये को बनाने और जानने में उत्सुक नहीं रह जाते।

युवक भी नई घटना है। इसलिए दुनिया की सारी की सारी व्यवस्था में मुसीबत खड़ी हो गई है, क्योंकि युवक पहले था ही नहीं। उसको हमने सोच कर कुछ नियम न बनाए थे। बच्चे आदर देते थे, बूढ़े आदर ले लेते थे। और शिक्षक पुराना जो था, वह निरंतर सदा ही बूढ़ा होता था, क्योंकि अनुभव के बाद ही तो वह कुछ सिखा सकता था। इस मुल्क में तो ऐसा ही था कि चैथे आश्रम में, जब आदमी कुछ करने में समर्थ न रह जाए तब वह शिक्षक हो जाए। तब उसने जो जीवन में जो जाना है वह उन बच्चों को बता दे जो कल आ रहे हैं। बूढ़े सिखाते थे, बच्चे सीखते थे। आज हालत बिलकुल बदल गई है। आज युवक ही सिखा रहे हैं, और युवक ही सीख रहे हैं। यह स्थिति बिलकुल भिन्न है और नई है। इसलिए बच्चे बूढ़ों को जो आदर देते थे वह युवक ही युवकों को आदर देंगे, यह असंभव है।

लेकिन स्थितियां बदल जाती हैं, हमारा मन नहीं बदलता, हमारे आग्रह पुराने बने रहते हैं। और हम जब पुराने आग्रह को नई स्थितियों में थोपते हैं, तो आग्रह टूटता है, स्थिति नहीं बदलती। स्थिति बहुत बलशाली है। लेकिन यदि यह सब समझा जा सके, तो एक नये शिक्षक की अवधारणा, एक नये शिक्षक का कंसेप्ट विकसित हो सकता है।

नये शिक्षक का काम अब ज्यादा से ज्यादा बड़े भाई का होगा, पिता का नहीं। नया शिक्षक ठीक अर्थों में मित्र होगा, गुरु नहीं। उसको मित्रता की कोई धारणा विकसित करनी होगी। उसे आज्ञा देने वाले की शक्ल छोड़ देनी पड़ेगी। अब वह आज्ञा नहीं देगा, कमांड नहीं करेगा, ज्यादा से ज्यादा परसुएड करेगा, समझाएगा, बुझाएगा, राजी करेगा। और राजी हो जाए तो ठीक है; न राजी हो तो नाराज नहीं हो जाएगा। इसलिए आधुनिकशिक्षक के सामने जो बड़े से बड़ा सवाल है वह यह है कि उसे पुरानी सारी की सारी जो परिकल्पनाएं थीं शिक्षक के आस-पास, वे छोड़नी हैं और नई परिकल्पनाएं विकसित करनी हैं, जो अब तक नहीं थीं। उसे विनम्र होना पड़ेगा। जैसे मैंने कहा, एक बहुत बुनियादी आधार–हम सदा सिखाए हैं अब तक कि बच्चों को, विद्यार्थियों को विनम्र होना चाहिए। क्योंकि हम कहते थे कि जो विनम्र है वही सीख सकता है।

अब सूत्र बदलना पड़ेगा। अब तो जो विनम्र है, वही सिखा सकता है। असल में, विनम्र हुए बिना कोई सिखा नहीं सकता। और मेरा मानना है, जिस दिन सिखाने वाला विनम्र होगा उसी दिन सीखने वाला भी विनम्र हो सकता है। क्योंकि सिखाने वाला ही विनम्र न हो, तो सीखने वाला विनम्र कैसे हो सकता है? सिखाने वाला अब तक बहुत अविनम्र था। अगर हम पुराने शिक्षक की कल्पना करें, तो वह बहुत ईगोसेंट्रिक है, वह बहुत अहंकार से भरा हुआ है। उसके अहंकार के आस-पास उसने पैर छूने से लेकर सब तरफ से नई पीढ़ी को झुकाने का काम किया था।

अब यह नहीं संभव है, उचित भी नहीं है, बहुत हिंसात्मक थी यह बात और इस बात को चलाए रखने के लिए बहुत इंतजाम करना पड़ा था और वह इंतजाम ऐसा था कि उसने मनुष्य को विकसित न होने दिया। अगर हमें अंधी श्रद्धा मांगनी हो, अगर किसी से भी अंधी विनम्रता मांगनी हो तो हमें जिनसे भी अंधी श्रद्धा मांगनी है उनके भीतर विचार की हत्या करनी चाहिए। उसके बिना अंधी श्रद्धा नहीं मिल सकती। जो विचार कर सकता है वह अंधी श्रद्धा देने में असमर्थ हो जाता है। तो पुरानी सारी की सारी शिक्षा अंधे विश्वास पर और अंधी श्रद्धा पर निर्भर थी। विचार करने की प्रेरणा नहीं दी जाती थी, विचार को रोकने की चेष्टा की जाती थी।

और ध्यान रहे, विचार बहुत विद्रोही है, विचार सदा विद्रोही है। विचार का मतलब ही विद्रोह है, क्योंकि विचार हमेशा इनकार करने से शुरू होता है। जो इनकार नहीं करता है, वह विचार ही नहीं कर सकता है। अगर मैं हां कहता हूं तो विचार करने का आगे कोई उपाय नहीं रह जाता। हां, डेड एंड है। जब मैं कहता हूं, ‘हां’, तो अब आगे कोई उपाय नहीं है। जब मैं कहता हूं, ‘नहीं’, तो अब आगे सब उपाय हैं। ‘नहीं’, जो है, वह द्वार है, क्योंकि जब मैं कहता हूं नहीं, तो तर्क करना पड़ेगा, सोचना पड़ेगा, दलील देनी पड़ेगी। और जब मैं कहता हूं ‘ हां’ तो न सोचना पड़ेगा, न तर्क देना पड़ेगा, न दलील करनी पड़ेगी। क्रमशः……

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-3 

नये युग का शिक्षक: गुरु नहीं, मित्र होगा — ओशो का आधुनिक शिक्षा पर दृष्टिकोण

 परमात्मा सदा नये में उत्सुक है

ओशो कहते हैं — परमात्मा हमेशा नये में उत्सुक रहता है। वह हर दिन पुराने को विदा कर देता है और नये को जन्म देता है।
लेकिन हमारे चिंतन की धारणाएं अब तक पुराने पर टिकी रही हैं — नया हमेशा परिधि पर रहा, और पुराना केंद्र में।
अब यह संभव नहीं है।
समय बदल चुका है, परिस्थितियां बदल चुकी हैं, और इंसान के सोचने का तरीका भी बदलना ही होगा।

 पहले दुनिया में “युवक” नाम की कोई श्रेणी नहीं थी

ओशो बताते हैं कि जैसे “शिक्षक” एक नई घटना है, वैसे ही “युवक” भी नई घटना है।
पुराने समय में समाज में सिर्फ बच्चे और बूढ़े हुआ करते थे, युवक नहीं।
क्योंकि बच्चे बड़े होते ही उनका विवाह कर दिया जाता था — और विवाह होते ही वे “बूढ़ों” की दुनिया में प्रवेश कर जाते थे।
इस व्यवस्था ने “युवा अवस्था” को ही समाप्त कर दिया था।

 बगावत सिर्फ युवक कर सकता है

ओशो कहते हैं — “बगावत न तो बच्चे कर सकते हैं, न बूढ़े।”
नई घटनाएं, नई सोच, और नया समाज — ये सब युवक की चेतना से ही जन्म ले सकते हैं।
बच्चे असमर्थ होते हैं, बूढ़े उत्सुक नहीं रह जाते।
इसीलिए पुरानी दुनिया में न कोई नया विचार जन्म लेता था, न कोई परिवर्तन।

 अब शिक्षक भी बदल चुका है

पुराने समय में शिक्षक हमेशा बूढ़ा होता था — अनुभव का प्रतीक, आदर का पात्र।
वह जीवन के अंतिम चरण में शिक्षक बनता था और बच्चों को वह सिखाता था जो उसने सीखा था।
लेकिन आज स्थिति पूरी तरह बदल गई है।
अब युवक ही सिखा रहा है, और युवक ही सीख रहा है।
यह परिस्थिति बिल्कुल नई है। इसलिए पुरानी शिक्षा व्यवस्था के सारे नियम अब अप्रासंगिक हो गए हैं।

 नया शिक्षक पिता नहीं, मित्र होगा

ओशो कहते हैं — अब शिक्षक का काम “पिता” जैसा नहीं, बल्कि “बड़े भाई” या “मित्र” जैसा होना चाहिए।
वह अब आदेश नहीं देगा, बल्कि समझाएगा, मनाएगा, प्रेरित करेगा।
अगर विद्यार्थी सहमत हो जाए तो अच्छा, और न हो तो भी शिक्षक नाराज नहीं होगा।
नई शिक्षा में आज्ञा नहीं, संवाद की आवश्यकता है।

अब शिक्षक को ही विनम्र होना होगा

ओशो का यह विचार बेहद क्रांतिकारी है —
“अब तक हम सिखाते रहे कि विद्यार्थी को विनम्र होना चाहिए, क्योंकि वही सीख सकता है।
लेकिन अब सूत्र बदल गया है — अब वही सिखा सकता है जो विनम्र है।”
वास्तव में, विनम्र हुए बिना कोई शिक्षक नहीं बन सकता।
जब सिखाने वाला विनम्र होगा, तभी सीखने वाला भी विनम्र हो पाएगा।

 पुराना शिक्षक अहंकार से भरा हुआ था

ओशो बताते हैं कि पुरानी व्यवस्था में शिक्षक अहंकारी और ईगो-सेंट्रिक था।
वह पैर छुवाता था, आदर की मांग करता था, और नए विचारों को दबाता था।
यह शिक्षा नहीं, बल्कि हिंसा थी —
क्योंकि अंधी श्रद्धा के लिए विचार की हत्या करनी पड़ती है।
जो सोचता है, वह अंधी श्रद्धा नहीं कर सकता।

विचार ही सच्चा विद्रोह है

ओशो कहते हैं — “विचार हमेशा विद्रोही होता है।”
विचार का अर्थ ही इनकार से शुरू होता है।
जब हम ‘हाँ’ कहते हैं, तो सोचने का अंत हो जाता है;
लेकिन जब हम ‘नहीं’ कहते हैं, तभी सोचने की शुरुआत होती है।
‘नहीं’ ही द्वार है — सोचने, समझने, और नए मार्ग खोजने का।

 निष्कर्ष: शिक्षा को पुनर्परिभाषित करने का समय

ओशो के अनुसार, अब शिक्षा को अंधी श्रद्धा से मुक्त कर विचार की स्वतंत्रता देनी होगी।
नया शिक्षक अब आदेश देने वाला नहीं,
बल्कि समझाने वाला, सहयोगी, और मित्रवत मार्गदर्शक होगा।
यही शिक्षा का नया युग है —
जहाँ शिक्षक भी सीखता है, और विद्यार्थी भी सिखाता है।