प्रेम, आनंद और युद्धविराम: शांतिपूर्ण संसार के लिए स्त्री की सशक्तता_ ओशो

ओशो- स्त्री को अपनी मुक्ति के लिए अपने व्यक्तित्व को खड़ा करने की दिशा में सोचना चाहिए, प्रयोग करने चाहिए। लेकिन ज्यादा से ज्यादा वह क्लब बना लेती है, जहां ताश खेल लेती है; कपड़ों की बात कर लेती है, फिल्मों की बात कर लेती है, चाय-कॅाफी पी लेती है, पिकनिक कर लेती है; और समझती है कि बहुत, शिक्षित होना पूरा हो गया। ताश खेल लेती होगी। पुरुषों की नकल में दो पैसे जुए के दांव पर लगा लेती होगी। बाकी इससे उसको कुछ व्यक्तित्व नहीं मिलने वाला है।

स्त्री को भी सृजन के मार्गों पर जाना पड़ेगा। उसे भी निर्माण की दिशाएं खोजनी पड़ेंगी। जीवन को ज्यादा सुंदर और सुखद बनाने के लिए उसे भी अनुदान करना पड़ेगा, तभी स्त्री का मान, स्त्री का सम्मान, उसकी प्रतिष्ठा है, वह समकक्ष आ सकती है। और मेरे देखने में, स्त्री अगर आनंदित हो जाए तो हम जीवन को शांत करने के मार्ग पर बड़े कदम उठा सकते हैं। मैं तो यहां तक कह सकता हूं, यह किसी को अतिशयोक्ति मालूम हो सकती है; लेकिन मेरी अपनी समझ यह है कि अगर दुनिया से युद्ध और हिंसा खत्म करनी हो तो जो बुनियादी इकाई है स्त्री और पुरुष की, उसको शांत कर दें। अगर वह शांत, प्रेमपूर्ण, आनंदपूर्ण बन जाए तो दुनिया में कोई लड़ने को राजी न होगा।क्या आपको पता है, सैनिकों को अविवाहित रखना पड़ता है, क्योंकि विवाहित सैनिक ठीक से लड़ने को राजी नहीं होता। सैनिकों को अविवाहित रखना पड़ता है ताकि वे लड़ सकें। असल में जिनके जीवन में प्रेम नहीं है, वे ही लड़ सकते हैं। इसलिए सैनिकों को स्त्रियों से दूर रखना पड़ता है कि कहीं उनके जीवन में प्रेम की किरण न आ जाए। अगर प्रेम आ जाए तो न वे मरना चाहते हैं, न किसी को मारना चाहते हैं, वे फिर जीना चाहते हैं। आज वियतनाम में अमरीका के सैनिक ज्यादा ताकत होने पर भी हारते चले जाते हैं। उसका कुल कारण इतना है कि अमरीका का सैनिक स्त्री के निकट आ गया है। दुनिया का कहीं का सैनिक स्त्री के उतने निकट नहीं है। अमरीकन सैनिक अपनी गल्र्स फ्रेंडस को लेकर वियतनाम के युद्ध पर पहुंच गए हैं, उनकी लड़कियां दोस्त, उनकी पत्नियां, उनकी प्रेमिकाएं तंबू में उनकी प्रतीक्षा कर रही हैं।

अब एक सैनिक लड़ने गया है और उसकी प्रेयसी तंबू में उसकी प्रतीक्षा कर रही है। वह युद्ध पर लड़ सकेगा? वह दिन भर इस प्रतीक्षा में होगा, किस भांति मैं वापस लौट जाऊं। और क्या वह किसी को मार सकेगा? जो आदमी किसी के प्रेम में है, वह किसी को भी मारने में असमर्थ हो जाता है।

तो पिछले कोरिया के युद्ध में कोरिया में जो अमरीकी जनरल था, उसने रिपोर्ट दी है अमरीकी सीनेट को कि हमारे सौ सैनिक लड़ने जाते हैं, उसमें से चालीस प्रतिशत बंदूकों का उपयोग नहीं करते। वे बंदूकें लटकाए हुए घूम-घाम कर वापस आ जाते हैं। और उनसे कहा जाए कि तुम मारते क्यों नहीं, तो वे कहते हैं कि जीवन इतना आनंदपूर्ण है कि दूसरे के लिए भी तो इतना ही आनंदपूर्ण होगा।

इसलिए पुरुषों को स्त्रियों से दूर रखना जरूरी है, अगर लड़ाना हो। क्योंकि जब उनका जीवन प्रेमपूर्ण नहीं होता, तब वे तोड़ने को, मारने को उत्सुक हो जाते हैं। जब अपना ही जीवन इतना दुखपूर्ण है, तो किसी को भी खत्म करो, कोई फर्क नहीं पड़ता। तोड़ो, मिटाओ, नष्ट करो!

मेरी दृष्टि में इस पृथ्वी पर एक स्वर्ग बन सकता है, लेकिन प्रेम का स्वर्ग ही नहीं बन पाया। वह पहली इकाई पर ही सब गड़बड़ हो गया है। मकान की नींव ही डगमगा गई। ऊपर के शिखर सब कंप रहे हैं। इस पर सोचें। जरूरी नहीं कि मेरी सभी बातें ठीक हों। कौन दावा कर सकता है सभी बातों के ठीक होने का। ऐसा मैं सोचता हूं, वह मैंने कहा। उस पर सोचना। हो सकता है कोई बात ठीक लगे, तो ठीक लगते ही बात सक्रिय हो जाती है। न ठीक लगे, बात समाप्त हो जाती है। मैं कोई उपदेशक नहीं हूं। मुझे जो ठीक लगता है, वह कह देता हूं, निवेदन कर देता हूं। क्रमशः….

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-3 

स्त्री — निर्माण, आनंद और विश्वशांति का आधार

ओशो के विचारों में स्त्री की सृजनात्मक शक्ति और समाज में उसकी भूमिका पर गहन दृष्टि

स्त्री की मुक्ति सिर्फ दिखावे से नहीं, व्यक्तित्व से होगी

ओशो कहते हैं —
स्त्री को अपनी मुक्ति के लिए अपने व्यक्तित्व को खड़ा करने की दिशा में सोचना और प्रयोग करने की आवश्यकता है।
लेकिन होता यह है कि वह क्लब बना लेती है, जहां ताश खेल लेती है, कपड़ों और फिल्मों की बातें कर लेती है, चाय-कॉफी पी लेती है, पिकनिक कर लेती है — और समझ लेती है कि वह बहुत शिक्षित हो गई।

ओशो का कहना है —
“ताश खेल लेने या पुरुषों की नकल में जुए के दांव लगाने से स्त्री को व्यक्तित्व नहीं मिलने वाला। उसे सृजन के मार्गों पर चलना होगा, निर्माण की दिशाएं खोजनी होंगी।”

सृजन ही स्त्री के सम्मान का आधार है

स्त्री को भी जीवन को सुंदर और सुखद बनाने के लिए योगदान देना होगा।
ओशो मानते हैं कि जब स्त्री सृजनशील और आनंदित होती है, तब ही समाज और जीवन दोनों में सौंदर्य और संतुलन आता है।
वे कहते हैं —
“स्त्री अगर आनंदित हो जाए तो हम जीवन को शांत करने के मार्ग पर बड़े कदम उठा सकते हैं।”

प्रेम से भरा जीवन हिंसा को समाप्त कर सकता है

ओशो आगे कहते हैं कि यदि दुनिया से युद्ध और हिंसा खत्म करनी हो, तो सबसे पहले स्त्री-पुरुष के संबंधों में शांति और प्रेम लाना होगा।
“जब यह बुनियादी इकाई शांत, प्रेमपूर्ण और आनंदपूर्ण बन जाएगी, तो दुनिया में कोई भी लड़ने को तैयार नहीं होगा।”

क्यों सैनिकों को अविवाहित रखा जाता है

ओशो एक दिलचस्प उदाहरण देते हैं —
“सैनिकों को अविवाहित रखना पड़ता है, क्योंकि विवाहित सैनिक ठीक से लड़ने को तैयार नहीं होता।”
वे कहते हैं कि जिनके जीवन में प्रेम नहीं होता, वही लड़ने और मारने को तैयार रहते हैं।
“अगर प्रेम जीवन में आ जाए, तो न कोई मरना चाहता है, न किसी को मारना। जो प्रेम में है, वह जीना चाहता है — अपने लिए और दूसरों के लिए भी।”

प्रेम आने पर युद्ध कमजोर पड़ जाता है

ओशो वियतनाम युद्ध का उदाहरण देते हैं —
“अमेरिका के सैनिक वहां हारते चले गए, क्योंकि वे स्त्रियों के निकट आ गए। उनकी गर्लफ्रेंड्स, पत्नियां या प्रेमिकाएं तंबू में उनकी प्रतीक्षा कर रही थीं। अब जो सैनिक प्रेम में है, वह युद्ध में मन से लड़ सकेगा? वह तो जीने की प्रतीक्षा करेगा।”

वे बताते हैं कि कोरिया युद्ध में एक अमेरिकी जनरल ने रिपोर्ट दी थी —
“हमारे सौ सैनिकों में से चालीस बंदूकों का इस्तेमाल ही नहीं करते। जब पूछा गया क्यों, तो उन्होंने कहा — जीवन इतना आनंदपूर्ण है कि दूसरे का जीवन भी उतना ही आनंदपूर्ण होगा। हम उसे नष्ट नहीं कर सकते।”

प्रेम से रहित जीवन विनाश की ओर ले जाता है

ओशो का निष्कर्ष है —
“जब जीवन में प्रेम नहीं होता, तो व्यक्ति तोड़ने, मिटाने और नष्ट करने की ओर बढ़ता है।
जब अपने भीतर ही दुख भरा हो, तो किसी और का जीवन खत्म करने में अपराधबोध नहीं रहता।”

प्रेम का स्वर्ग — जो अभी अधूरा है

ओशो कहते हैं कि इस पृथ्वी पर स्वर्ग बन सकता है, लेकिन वह प्रेम का स्वर्ग अभी तक नहीं बन पाया।
“मकान की नींव ही डगमगा गई है, ऊपर के शिखर सब कंप रहे हैं। पहली इकाई — स्त्री और पुरुष — वहीं सब गड़बड़ हो गया है।”

ओशो का निवेदन

“मेरी बातें सब सही हों, यह जरूरी नहीं।
जो ठीक लगे, उस पर सोचें; जो न लगे, उसे छोड़ दें।
मैं कोई उपदेशक नहीं हूं — मुझे जो ठीक लगता है, वही निवेदन कर देता हूं।”

🕉️: ओशो के इस दृष्टिकोण में स्त्री को केवल समानता नहीं, बल्कि सृजन और प्रेम की केंद्रीय शक्ति के रूप में देखा गया है —
क्योंकि जब स्त्री आनंदित होती है, तो समाज में हिंसा की जगह शांति और प्रेम का स्वर्ग जन्म लेता है।