“प्रेम की कला और स्त्रीत्व की मौन महिमा”_ओशो

ओशो- नारी होने का ठीक अर्थ पुरुष से बहुत भिन्न है और दोनों के व्यक्तित्व के भेद को भी थोड़ा समझना उपयोगी है। पुरुष एक्टिव है, पुरुष का सारा व्यक्तित्व क्रियात्मक है, विधायक है। स्त्री का सारा व्यक्तित्व पैसिव है, निषेधात्मक है। इस फर्क को समझ लेना जरूरी है, तो हम उनकी दोनों की शिक्षाएं, उन दोनों के जीवन का ढंग अलग तरह से सोचेंगे।

एक स्त्री किसी पुरुष को कितना ही प्रेम करती हो तो भी कभी कोई स्त्री ने पुरुष के प्रति निवेदन नहीं किया है कि मैं तुम्हें प्रेम करती हूं। स्त्री कितना ही प्रेम करती हो तो भी वह प्रतीक्षा करती है कि पुरुष निवेदन करे। स्त्री पैसिव है, पैसिव का मतलब है, वह प्रतीक्षा कर सकती है–आक्रामक नहीं है, आक्रमण नहीं करेगी, पहल नहीं करेगी। पुरुष को ही आक्रमण करना होगा, पुरुष को ही पहल करनी होगी। पुरुष को ही पहला कदम उठाना होगा। स्त्री प्रतीक्षा करेगी। और बड़ी हैरानी की बात है, अगर स्त्री पहल करे और आक्रमण करे तो पुरुष के लिए कभी प्रीतिकर न हो पाएगी। क्योंकि आक्रमण करने वाली और पहल करने वाली स्त्री में पुरुष को पुरुष के ही दर्शन दिखाई देंगे। उसे स्त्री नहीं मिल सकेगी फिर वहां, स्त्री अनंत प्रतीक्षा है–मौन प्रतीक्षा, आक्रामक नहीं, अनाक्रामक। पुरुष आक्रमण है, एग्रेशन है। वह जाएगा, पहल करेगा। लेकिन अगर कोई पुरुष प्रतीक्षा करे तो कोई स्त्री उसे पसंद नहीं करेगी, कभी प्रेम नहीं कर पाएगी। इसलिए कोई स्त्री ऐसे पुरुष को प्रेम नहीं कर पाती जो उसके पीछे छाया बन कर चलने लगे, उससे कभी प्रेम नहीं कर पाएगी क्योंकि उसमें उसे एक स्त्री ही दिखाई पड़ेगी।स्त्री उसी पुरुष के प्रति आकर्षित होती है जो अगम्य मालूम पड़ता हो, अलंघ्य मालूम पड़ता हो, गौरीशंकर का शिखर मालूम पड़ता हो, दूर बहुत दूर, जिसे पाना मुश्किल है। जो बुलाता है, लेकिन बहुत दूर है। जो पुकारता है, लेकिन बहुत फासले पर है। जिसे पाना, जिसे छूना बहुत मुश्किल है। स्त्री का मन उसके लिए पागल आकांक्षा से भर जाएगा।

मैं यह कह रहा हूं कि पॅाजिटिव, निगेटिव के; एक्टिव और पैसिव के, सक्रिय और निष्क्रिय के भेद को समझ लेना बहुत जरूरी है। हम एक पत्थर को पानी में फेंकते हैं, तो पत्थर पानी में गिरता है, फौरन गड्ढा बना लेता है। पत्थर एक्टिव है, सक्रिय है और पानी पैसिव है, वह फौरन गड्ढा बन जाता है। लेकिन बड़ा मजा यह है कि पत्थर नीचे गया कि पानी फिर अपनी जगह पर वापस लौट आता है। पैसिविटी, निष्क्रियता शक्तिहीनता नहीं है। अगर एक पहाड़ से पानी का झरना गिरता हो और नीचे पहाड़ पर पत्थर की चट्टानें पड़ी हों तो आज पत्थर की चट्टानें बहुत शक्तिशाली मालूम पड़ेंगी, क्योंकि झरना उन पर बिखर-बिखर जाएगा, टूटेगा और बिखर जाएगा और चट्टानें अकड़ी खड़ी रहेंगी; लेकिन सौ साल बाद झरना बह रहा होगा, चट्टानें रेत हो चुकी होंगी, उनका कोई पता न रह जाएगा। वह जो पहले दिन बहुत एग्रेसिव मालूम पड़ी थी चट्टानें, टूटने को बिल्कुल राजी नहीं, और पानी जो बिल्कुल ही विनम्र मालूम पड़ा था, कि पत्थर ने जैसा कहा वैसा हो गया था, वह सौ साल में जीत गया है।

पुरुष की जीत प्राथमिक हो सकती है, अंतिम जीत स्त्री की हो जाती है। वह पैसिव, प्रतीक्षा है, वह अनंत प्रतीक्षा है। वह चुप, चुप पानी की तरह जगह दे देगी, प्रतीक्षा करेगी, धैर्य रखेगी। लेकिन पुरुष जो शिक्षा दे रहा है स्त्री को, वह उसे पुरुष बनाए दे रही है, वह भी अधीर हुई चली जा रही है। वह भी आक्रामक हुई चली जा रही है, वह भी हमलावर हो रही है; वह भी एक्टिव हो रही है। वह उसके परिणाम घातक हो रहे हैं। उससे स्त्रियों का मन अपने मूल स्वभाव से ही विच्युत हुआ चला जा रहा है। इसलिए पश्चिम में एक दुर्घटना घटी, जो यहां भी घट जाएगी। वहां स्त्री करीब-करीब पुरुष के पास आ गई है, पुरुष जैसी होकर। लेकिन उसने अर्थ खो दिया है। उसने व्यक्तित्व की गरिमा, और गौरव, और संगीत और काव्य सब खो दिया है। उसने वह विनम्रता भी खो दी है, जो उसका गुण थी।

स्त्री को एक और तरह की शिक्षा चाहिए जो उसे संगीतपूर्ण व्यक्तित्व दे, जो उसे नृत्यपूर्ण लयबद्ध व्यक्तित्व दे; जो उसे प्रतीक्षा की अनंत क्षमता दे; जो उसे मौन की, चुप होने की, अनाक्रामक होने की, प्रेम की और करुणा की गहरी शिक्षा दे। सामान्यतया सभी स्त्रियां सोचती हैं कि उन्हें प्रेम उपलब्ध है, लेकिन, प्रेम भी कला है जो उपलब्ध नहीं है। कोई पैदा होते से ही प्रेम करने में सक्षम नहीं है।

और मनुष्य एक बहुत अदभुत प्राणी है। अगर हम अपने बच्चों को पैदा होने के बाद चलना न सिखाएं तो बहुत संभव है, वह चलना सीखें ही न। ऐसे बच्चे हैं, कलकत्ते के दो बच्चों को कुछ भेड़िए उठा कर ले गए थे रात, फिर जंगल से उनको दो-चार साल बाद पकड़ा जा सका, कोई बीस साल, तीस साल पहले। तब उनकी उम्र हो गई थी, कभी का उनको चलना शुरू कर देना चाहिए था। लेकिन भेड़ियों के पास रहने की वजह से वे दो हाथ-पैर से नहीं, चारों हाथ-पैर से चलते थे। अभी लखनऊ के पास अभी चार-पांच वर्ष पहले एक लड़का पकड़ा गया, जिसकी उम्र चैदह साल थी। उसको भी भेड़ियों ने अपनी मांद में पाल लिया था। वह भेड़ियों के बच्चों के पास पला था। चैदह साल का था, लेकिन चलता चारों हाथ-पैर से था! उसे पता ही नहीं चला था कि दो से चलना है। और जब उसे पकड़ लिया गया तब बड़ी मुसीबत हुई। छह महीने लग गए उसको सीधा खड़ा करने में, क्योंकि उसकी हड्डी सब सख्त हो गई थी। वह मुड़ती नहीं थी। चैदह साल का होकर भी वह एक शब्द नहीं बोल सकता था आदमी का, सिर्फ भेड़ियों जैसी आवाज करता था। छह महीने लग गए उसको सिर्फ राम शब्द बुलवाना सिखाने में। राम उसका नाम रख दिया। यही बड़ी भारी घटना थी कि छह महीने में वह राम कहना सीख गया। लेकिन इससे वह इतना परेशान हो गया यह भाषा का सिखाना, एक शब्द का सिखाना और दो पैर पर खड़े होना कि वह नौ महीने बाद मर गया। डाक्टरों का कहना है कि मरने का कुल कारण इतना है कि उसे यह आदमी का होना सीखना इतना परेशानी लाए हुए था कि वह एकदम परेशान हो गया, उसकी नींद खत्म हो गई। वह एकदम स्वस्थ था, वह जंगली जानवर की तरह स्वस्थ था, वह कभी बीमार ही नहीं पड़ा था जंगल में। बड़ा शक्तिशाली था, लेकिन वह नौ महीने में आदमी के इंतजाम में समाप्त हो गया। क्रमशः….

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-3 

नारी की मौन शक्ति और पुरुष की सक्रियता : ओशो का दृष्टिकोण

ओशो कहते हैं — नारी होना पुरुष होने से बहुत भिन्न है।
दोनों के व्यक्तित्व में मौलिक अंतर है। पुरुष सक्रिय (एक्टिव) है, जबकि स्त्री का व्यक्तित्व निष्क्रिय (पैसिव) है।
इस अंतर को समझ लेना जरूरी है, तभी हम उनके जीवन और शिक्षा के भेद को सही रूप से जान पाएंगे।

प्रेम में भी स्त्री करती है प्रतीक्षा, पुरुष करता है पहल

ओशो के अनुसार, एक स्त्री चाहे कितनी भी गहराई से किसी पुरुष को प्रेम करे,
वह स्वयं पहल नहीं करती। वह प्रतीक्षा करती है कि पुरुष ही निवेदन करे।
स्त्री पैसिव है — प्रतीक्षा करने वाली, आक्रामक नहीं।
पुरुष को ही पहला कदम उठाना होता है।

अगर कोई स्त्री पहल करे, तो पुरुष के लिए वह आकर्षक नहीं रह जाती।
क्योंकि उस स्थिति में पुरुष को स्त्री में पुरुषत्व दिखाई देता है, नारीत्व नहीं।
उसी तरह कोई पुरुष यदि सिर्फ प्रतीक्षा करे, पहल न करे, तो स्त्री उसके प्रति आकर्षित नहीं होती।

स्त्री को वही पुरुष भाता है जो ‘अगम्य’ हो

ओशो कहते हैं — स्त्री का मन उसी पुरुष के प्रति आकर्षित होता है
जो अलंघ्य, दूर और रहस्यमय लगे।
जो पुकारे भी, लेकिन बहुत फासले पर हो।
जिसे छूना, पाना कठिन लगे — वही उसके भीतर गहरी आकांक्षा जगाता है।

निष्क्रियता का अर्थ कमजोरी नहीं, बल्कि गहरी शक्ति है

ओशो एक सुंदर उदाहरण देते हैं —
जब हम एक पत्थर पानी में फेंकते हैं, पत्थर एक्टिव होता है,
पानी पैसिव। पत्थर गड्ढा बनाता है, लेकिन पल भर बाद
पानी फिर अपनी जगह भर लेता है।

पैसिविटी यानी निष्क्रियता कमजोरी नहीं है।
पानी में वह धैर्य और सहनशीलता है जो अंततः विजयी होती है।
झरना सौ साल बाद भी बहता रहता है,
लेकिन उसके रास्ते की चट्टानें रेत बन जाती हैं।

पुरुष की जीत तात्कालिक हो सकती है,
पर अंतिम जीत स्त्री की होती है।

पश्चिम में स्त्री ने शक्ति तो पाई, पर खो दिया सौंदर्य

ओशो चेतावनी देते हैं — आधुनिक शिक्षा स्त्री को पुरुष जैसा बना रही है।
वह अधीर हो रही है, आक्रामक हो रही है,
और इससे उसका मूल स्त्रीत्व नष्ट होता जा रहा है।

पश्चिम में स्त्री लगभग पुरुष जैसी हो गई है,
पर उसने अपने व्यक्तित्व की गरिमा, कोमलता,
संगीत और काव्य सब कुछ खो दिया है।

स्त्री को चाहिए संगीतपूर्ण शिक्षा, प्रेम की साधना

ओशो कहते हैं —
स्त्री को ऐसी शिक्षा चाहिए जो उसके भीतर संगीत, लय और करुणा जगाए।
जो उसे प्रतीक्षा की अनंत क्षमता, मौन की गहराई और प्रेम की कला सिखाए।

क्योंकि प्रेम कोई सहज उपलब्ध वस्तु नहीं,
यह एक कला है — और हर कला की तरह इसे सीखा जाता है।

प्रकृति सिखाती है, मनुष्य भूल गया है

ओशो एक उदाहरण देते हैं —
अगर बच्चे को जन्म के बाद चलना न सिखाया जाए,
तो वह शायद कभी चलना सीख ही न पाए।
उन्होंने जंगली बच्चों के उदाहरण से बताया
कि मनुष्य का मन और शरीर दोनों शिक्षा और संस्कार से ही विकसित होते हैं।

इसी तरह प्रेम, करुणा और मौन की शिक्षा भी दी जानी चाहिए,
क्योंकि ये गुण स्वाभाविक नहीं, साधना से विकसित होते हैं।

निष्कर्ष : स्त्रीत्व की शक्ति उसकी प्रतीक्षा में है

ओशो का संदेश स्पष्ट है —
स्त्री को पुरुष बनने की नहीं,
अपने भीतर की प्रतीक्षा, मौन और करुणा को पहचानने की जरूरत है।
उसी में उसकी वास्तविक शक्ति, सौंदर्य और विजय निहित है।