‘नारी को शिक्षित करो, स्वतंत्र करो, तभी शांति संभव है’ क्योंकि “जिस दिन नारी अपना व्यक्तित्व पाएगी, उसी दिन ही शांति जन्म लेगी” _ओशो
ओशो- नारी और शांति के संबंध में कुछ थोड़े से सूत्र समझना उपयोगी हैं। एक तो सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि नारी का अब तक कोई व्यक्तित्व नहीं रहा है और पुरुष ने उसके व्यक्तित्व को मिटाने की भरसक चेष्टा भी की है। नारी या तो किसी की बेटी होती है, या किसी की बहन होती है और या किसी की पत्नी होती है। नारी का अपना होना नहीं है। विवाह हो तो उसका नाम भी पुरुष बदल डालते हैं, नया नाम रख लेते हैं। विवाह हो जाने के बाद उसका सीधा कोई तादात्म्य, कोई सीधी आइडेंटिटी अपने साथ नहीं होती है। वह किसी की श्रीमती हो जाती है। उसके परिचय में भी हम कहते हैं, श्रीमती खन्ना या श्रीमती गूजर या कुछ। सीधा उसका कोई व्यक्तित्व समाज के समक्ष नहीं होता। बीच में पुरुष को लेकर ही उसका कोई अर्थ बनता है। पुराने शास्त्र कहते हैं कि जब वह कुंआरी हो तो पिता उसकी रक्षा करे; जब वह युवा हो तो पति उसकी रक्षा करे; जब वह वृद्ध हो जाए तो उसके बेटे उसकी रक्षा करें; लेकिन किसी भी स्थिति में उसका अपना कोई अस्तित्व स्वीकार नहीं किया गया है।
नारी को समझने के लिए पहली बात ही समझनी जरूरी है कि उसके पास व्यक्तित्व नहीं है, और जिसके पास व्यक्तित्व न हो, वह शांति का आधार कभी भी नहीं बन सकती। जिसके पास व्यक्तित्व नहीं है, वह स्वयं इतना अशांत होगा कि वह शांति का आधार नहीं बनता। जीवन की बड़ी से बड़ी शांति की उपलब्धि अपने व्यक्तित्व को पाने से शुरू होती है। और जिस दिन जो हम बनने को पैदा हुए हैं, वही बन जाते हैं; उसी दिन मन प्रफुल्लता से भर जाता है।
एक गुलाब का पौधा है। उसकी खुशी कब पूरी होती है! उसका आनंद कब प्रकट होता है? जब उसके फूल पूरी तरह खिल जाते हैं, जब आकाश में हवाओं को वह अपनी सुगंध को लुटा देता है और जब सूरज की किरणों में उसके खिले हुए फूल नाच लेते हैं। और जब राह से गुजरने वाले अपरिचित राहगीर उसकी सुगंध के संगीत से भर जाते हैं तब वह पौधा तृप्त हो जाता है। लेकिन जब तक किसी पौधे में फूल न आएं, तब तक उस पौधे में एक बेचैनी, एक अशांति, एक परेशानी बनी रहती है। नारी फूल को उपलब्ध ही नहीं हो पाती है क्योंकि उसका व्यक्तित्व ही अस्वीकृत है। उसके व्यक्तित्व को ही जगह नहीं है। अपनी हैसियत जब तक नारी को उपलब्ध नहीं है तब तक नारी शांत नहीं हो सकती।
और नारी की अशांति इतनी महंगी है जिसका हिसाब नहीं। यद्यपि पुरुष ने ही नारी का व्यक्तित्व छीना है और पुरुष ही नारी के अशांत होने से हजार गुना अशांत हो गया है। लेकिन उसे पता नहीं चलता कि उसने व्यक्तित्व छीना है इसलिए इतनी अशांति है। बल्कि शायद तर्क यही कहता है, सभी मूढ़ तर्क इसी भांति चलते हैं कि वह सोचता है कि नारी का व्यक्तित्व थोड़ा बहुत और बचा हो, वह भी छीन लेना जरूरी है ताकि शांति पूरी हो जाए। शांति होगी व्यक्तित्व के प्रकट होने से, व्यक्तित्व छीन लेने से नहीं, क्योंकि नारी कभी तृप्ति अनुभव कर ही नहीं पाती।
चूंकि व्यक्तित्व छीना गया है इसलिए वह कभी अॅाथेंटिक, प्रामाणिक रूप में अपने पैरों पर खड़ी ही नहीं हो पाती और हमने सारी व्यवस्था ऐसी की है कि वह खड़ी न हो पाए। हजारों वर्षों तक नारी को शिक्षा नहीं दी, सिर्फ इसलिए कि शिक्षित होते से ही वह अपने पैरों पर खड़े होने का प्रयास शुरू करेगी। पैर के नीचे से जमीन खींचनी हो तो शिक्षा मत दो। अगर शिक्षा न दी जाए तो पंगु हो जाता है व्यक्ति, और उस समाज में, जहां शिक्षित की गति होगी, नारी कोई गति न कर पाएगी। इसलिए नारी को वर्जित रखा, हजारों वर्षों तक शिक्षा नहीं दी।
लेकिन अशिक्षित नारी का मतलब? –अशिक्षित मां, अशिक्षित पत्नी, अशिक्षित बेटी, अशिक्षित बहन, अशिक्षित प्रेमिका। नारी को अशिक्षित रखने का अर्थ क्या होगा? कि जीवन के सब तलों पर अशिक्षित नारी खड़ी हो जाएगी। और शिक्षित पुरुष और अशिक्षित नारी के बीच इतना बड़ा फासला हो जाएगा कि उसके बीच तालमेल बिठालना मुश्किल है। इसलिए धीरे-धीरे नारी की स्थिति एक दासी की हो गई और पुरुष मालिक बन गया। पति का मतलब ही मालिक होता है। स्वामी का मतलब भी मालिक होता है। और हजारों साल से स्त्री पति को स्वामी कह रही है और अपने पत्रों में आपकी दासी लिख कर दस्तखत कर रही है।
लेकिन पुरुषों के समकक्ष होने की जो मैंने दौड़ कही वह जूते की एड़ी से लेकर कपड़ों, वस्त्रों तक, शिक्षा तक भी चल रही है। जब मैं कहता हूं, स्त्रियां भी शिक्षित होनी चाहिए, तो मेरा मतलब यह नहीं है कि वे ठीक पुरुषों जैसी शिक्षा से शिक्षित हो जाए। तब उपद्रव होगा, वैसा उपद्रव भी हो रहा है। अगर स्त्रियों को गणित में, तर्क में, व्यायाम में, फिजिक्स में, केमिस्ट्री में, विज्ञान में, ठीक पुरुषों जैसा शिक्षित कर दिया जाए, तो इस सारी शिक्षा में उनके भीतर स्त्रैण-तत्व का कोई अनिवार्य हिस्सा मर जाता है। असल में कुछ चीजों का को-एक्झिस्टेंस नहीं होता, कुछ चीजों का सह-अस्तित्व नहीं होता है। जैसे अगर कोई आदमी बहुत तर्कनिष्ठ हो तो उसके भीतर काव्य का अस्तित्व नहीं होगा। अगर कोई व्यक्ति बहुत तर्कयुक्त हो तो उसके भीतर कविता मर जाएगी। और अगर किसी के भीतर कविता विकसित हो तो उसके भीतर तर्क नहीं रह जाएगा। इन दोनों का सह-अस्तित्व नहीं होता। हो ही नहीं सकता है। क्योंकि काव्य के सोचने का ढंग बड़ा तर्कमुक्त है और तर्क के सोचने का ढंग काव्य के बिल्कुल उलटा है।
आइंस्टीन तो बड़ा गणितज्ञ था। उसने जिस युवती से विवाह किया था, फ्रा आइंस्टीन से, वह एक जर्मन भाषा की कवयित्री थी। एक गणितज्ञ था, एक कवयित्री थी। और फ्रा ने सोचा था कि आइंस्टीन को पहली ही रात अपनी कुछ कविताएं बताए। बड़ी प्रशंसा हुई थी उसकी कविताओं की। उसने पहली ही रात अपनी कुछ कविताएं आइंस्टीन को सुनाईं। वह बड़े आश्चर्य से सुनता रहा, और जब पूरा सुन चुका, तब फ्रा घबड़ा गई, क्योंकि वह ऐसे सुन रहा था जैसे कोई बच्चे की परीक्षा लेते वक्त उसको देखता है। या कोई पुलिस का इंस्पेक्टर किसी चोर की छान-बीन करता है, उसके खीसे की छान-बीन करता है, ऐसे देख रहा था। जब वह पूरा बोल चुकी, तो वह डरी कि पूछूं भी कि नहीं कि कैसा लगा।
फिर उसने पूछा डरते-डरते, कैसा लगा? आइंस्टीन ने कहा: क्या एब्सर्ड, यह क्या बेहूदी और फिजूल की बातें? इनका कोई मतलब? मैं तो दंग हूं कि इतनी बुद्धिहीन बातें भी तू सोच सकती है। अपने प्रेमी को उसने सोचा है, जैसा कि कवि हजारों वर्षों से सोचते रहे हैं, प्रेमी अपनी प्रेयसी को चांद के चेहरे से तुलना देते रहे हैं, प्रेमी प्रेयसियों को, प्रेयसियां प्रेमियों को चांद में देखते रहे हैं। तो उसने भी गीत में गाया है कोई प्रेमी अपनी प्रेयसी के लिए चांद की उपमा देता है कि तेरा चेहरा चांद की भांति है।
आइंस्टीन कहता है, पागल हो गई हो? चांद कितना बड़ा है, चेहरा कितना छोटा है, गणित का हिसाब तो बहुत अलग है। कहां चांद, कहां चेहरा, कोई संबंध नहीं दोनों का। और चांद पर इतने-इतने बड़े गड्ढे हैं, इतनी-इतनी बड़ी खाइयां हैं, इतने-इतने बड़े पहाड़ हैं कि अगर किसी स्त्री के चेहरे पर हों तो कोई पसंद ही न कर सके। वह फ्रा तो बहुत घबड़ा गई, वह आइंस्टीन को नहीं समझा पाती है। बहुत कोशिश करती है कि नहीं, यह तो उपमा है। लेकिन आइंस्टीन कहता है जो उपमा सीधी ही गलत है, वह ठीक कैसे हो सकती है। नहीं-नहीं, कभी यह नहीं हो सकता। आइंस्टीन कहता है कि अगर किसी स्त्री के सिर की जगह चांद रख दिया जाए तो उसका पता भी नहीं चलेगा। इतना वजनी है चांद कि वह कहां दब कर खो जाएगी, कुछ पता नहीं चलेगा। एकदम गलत है, एकदम ठीक नहीं है। फिर फ्रा ने कसम खा ली है कि उसे कविता नहीं बताएगी क्योंकि कविता वह पकड़ ही नहीं सकता। क्रमशः….
ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-3
नारी का व्यक्तित्व ही शांति का आधार है – ओशो
ओशो ने अपने एक प्रवचन में कहा है कि नारी और शांति का गहरा संबंध है, लेकिन दुखद यह है कि अब तक नारी को उसका व्यक्तित्व ही नहीं मिल पाया। जब तक नारी अपने अस्तित्व को नहीं पहचानती, तब तक वह शांति का आधार नहीं बन सकती।
नारी का अब तक अपना कोई व्यक्तित्व नहीं रहा
ओशो कहते हैं —
नारी को समाज ने हमेशा किसी के संबंध से ही परिभाषित किया है।
वह किसी की बेटी है, किसी की बहन है, किसी की पत्नी है — लेकिन “स्वयं” नहीं है।
विवाह के बाद उसका नाम तक बदल दिया जाता है।
वह “श्रीमती फलाँ” बन जाती है, पर उसकी अपनी पहचान मिट जाती है।
पुराने शास्त्रों में कहा गया कि —
“कुंआरी हो तो पिता की रक्षा में रहो, विवाहित हो तो पति की, और वृद्ध हो जाओ तो पुत्र की।”
इस तरह, हर अवस्था में नारी को किसी न किसी के सहारे की वस्तु बना दिया गया,
जबकि उसे अपने अस्तित्व से खड़े होने की जगह नहीं दी गई।
व्यक्तित्वहीन नारी, अशांत नारी
ओशो कहते हैं —
जिसके पास व्यक्तित्व नहीं है, वह शांति का आधार नहीं बन सकता।
अशांत व्यक्ति शांति का केंद्र नहीं हो सकता।
जीवन की सबसे बड़ी तृप्ति अपने व्यक्तित्व को पाने से आती है।
ओशो एक सुंदर उदाहरण देते हैं —
“एक गुलाब का पौधा तभी प्रसन्न होता है जब उसके फूल खिलते हैं।
जब तक फूल नहीं खिलते, पौधा बेचैन रहता है।”
उसी तरह, नारी का व्यक्तित्व जब तक नहीं खिलता, वह भीतर से अशांत रहती है।
और इस अशांति की कीमत पुरुष और समाज दोनों चुकाते हैं।
नारी की अशांति से समाज भी अशांत
ओशो कहते हैं कि पुरुष ने नारी का व्यक्तित्व छीना,
पर इसके परिणामस्वरूप पुरुष स्वयं भी हजार गुना अशांत हो गया।
फिर भी, उसे यह अहसास नहीं कि अशांति का कारण नारी का दबा हुआ व्यक्तित्व है।
बल्कि उल्टा वह सोचता है कि नारी में जो थोड़ा-बहुत व्यक्तित्व बचा है,
उसे भी मिटा दो — ताकि “शांति” आ जाए।
परंतु सच्चाई यह है कि शांति व्यक्तित्व के मिटाने से नहीं, बल्कि उसके खिलने से आती है।
शिक्षा से दूर रखी गई नारी
ओशो आगे कहते हैं —
“हमने हजारों वर्षों तक नारी को शिक्षा से वंचित रखा।
क्योंकि शिक्षा मिलते ही वह अपने पैरों पर खड़ी हो जाती।
और समाज को डर था कि अगर नारी खड़ी हो गई,
तो पितृसत्तात्मक ढांचा हिल जाएगा।”
पर परिणाम यह हुआ कि —
अशिक्षित मां, अशिक्षित पत्नी, अशिक्षित बेटी —
पूरा जीवन का ढांचा ही अशिक्षा पर टिका रह गया।
पुरुष शिक्षित होता गया, नारी पिछड़ती गई,
और उनके बीच का फासला इतना बढ़ गया कि तालमेल असंभव हो गया।
नारी बन गई ‘दासी’, पुरुष बना ‘स्वामी’
ओशो कहते हैं —
धीरे-धीरे यह व्यवस्था इतनी गहरी हो गई कि
“पति” का अर्थ ही “स्वामी” हो गया।
और स्त्रियां अपने पत्रों पर लिखती रहीं — “आपकी दासी।”
पुरुष मालिक बना, नारी उसकी दासी।
लेकिन ओशो चेतावनी देते हैं —
“जिस समाज में आधी आबादी दासता में जी रही हो,
वह समाज कभी शांत, संतुलित और प्रेमपूर्ण नहीं हो सकता।”
पुरुष जैसी शिक्षा नहीं, नारी सुलभ शिक्षा चाहिए
ओशो यह भी स्पष्ट करते हैं कि
नारी को शिक्षित करना आवश्यक है,
लेकिन पुरुष जैसी शिक्षा से नहीं।
“यदि नारी को केवल गणित, विज्ञान और तर्क में शिक्षित कर दिया जाए,
तो उसका स्त्रैण तत्व मर जाता है,”
वे कहते हैं।
ओशो उदाहरण देते हैं —
आइंस्टीन की पत्नी “फ्रा आइंस्टीन” कवयित्री थीं।
जब उन्होंने अपनी कविताएं आइंस्टीन को सुनाईं,
तो वह उनमें भी तर्क खोजने लगा।
कविता की भावना, उसकी लय — सब गायब हो गई गणित की कसौटी पर।
ओशो कहते हैं —
तर्क और कविता, गणित और प्रेम – साथ नहीं रह सकते।
स्त्री का सार तर्क में नहीं, संवेदना में है।
उसे उसी दिशा में विकसित होने की आवश्यकता है।
निष्कर्ष: नारी का व्यक्तित्व ही शांति का बीज है
ओशो के अनुसार —
“जिस दिन नारी अपना वास्तविक व्यक्तित्व पा लेगी,
उसी दिन समाज में शांति जन्म लेगी।”
नारी को दासी से मुक्त कर, शिक्षित कर,
स्वयं के अस्तित्व के साथ जीने का अधिकार देना
केवल न्याय नहीं, बल्कि सभ्यता की आवश्यकता है।



