दवा टेंडर ठप: 614 दिन से रुकी प्रक्रिया, सरकारी अस्पतालों में बढ़ी दिक्कतें, घोटाले की गूंज से थमी व्यवस्था

रायपुर/  छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विस कॉर्पोरेशन (सीजीएमएससी) में हुए रीएजेंट घोटाले का असर अब प्रदेश के सरकारी अस्पतालों तक पहुंच गया है। घोटाले के बाद से नई दवाओं और उपकरणों की खरीदी के टेंडर की प्रक्रिया पूरी तरह ठप पड़ी हुई है।

दो साल पुरानी सप्लाई, अब तक अटका भुगतान

कई दवा कंपनियों ने दो वर्ष पहले ही सरकारी मांग के अनुसार सप्लाई पूरी कर दी थी, लेकिन आज तक उनका भुगतान नहीं हुआ है। इसी कारण दवा कंपनियों ने सीजीएमएससी से दूरी बना ली है। अब नई खरीदी न होने से सरकारी अस्पतालों में दवाओं की कमी गहराती जा रही है।

16 निविदाएं दो साल से अटकी, एक भी ‘कवर ए’ नहीं खुली

जानकारी के अनुसार, दवा एवं औषधियों की खरीद के लिए जारी की गई कुल 16 निविदाएं पिछले दो वर्षों से लंबित हैं। सबसे पुरानी निविदा को 614 दिन हो चुके हैं जबकि नई निविदा को 246 दिन बीत चुके हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इतने लंबे समय में एक भी निविदा की कवर ए तक नहीं खोली गई है।
कई निविदाएं 2023-24 और 2024-25 अवधि की हैं, जिनमें बार-बार पुरानी कंपनियों से ही री-टेंडर किया जा रहा है।

बिना टेंडर के 100 करोड़ की खरीदी

पिछले आठ महीनों में बिना किसी नए टेंडर के करीब 100 करोड़ रुपए की दवाओं की खरीदी की जा चुकी है। खास बात यह है कि इसका अधिकांश हिस्सा सिर्फ नाइन एम फार्मा कंपनी को मिला है। इस कंपनी से करीब 100 तरह की दवाएं खरीदी गईं, जबकि इस कंपनी की छह से अधिक दवाएं पहले क्वालिटी टेस्ट में फेल हो चुकी हैं।

भुगतान रुका, निर्माण ठप

रीएजेंट घोटाले के बाद सप्लाई देने वाली कंपनियों के भुगतान भी अटक गए हैं। निर्माण कार्यों में भी यही स्थिति है — जिसके चलते कई सरकारी अस्पतालों की इमारतें समय पर तैयार नहीं हो पा रहीं। नतीजतन, प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं पर सीधा असर पड़ रहा है।

सरकार का पक्ष

स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने बताया कि लंबित निविदाओं को शीघ्र पूरा करने के निर्देश जारी किए गए हैं। साथ ही, तत्काल जरूरतों के लिए सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) के माध्यम से खरीदी की जा रही है।

सीजीएमएससी में जारी घोटाले की जांच ने दवा खरीदी प्रणाली को पूरी तरह जकड़ लिया है। 614 दिन से लंबित टेंडरों और अटके भुगतानों की वजह से सरकारी अस्पतालों को भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। जनता की सेहत पर असर पड़ रहा है और व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठने लगे हैं।