“शिक्षा का असली मकसद: व्यक्ति को बचाना, न कि समाज को”_ओशो

ओशो– बहुत से कारण हैं। शिक्षा खुद ही समाज की व्यवस्था से निकली हुई चीज है। अब तक जो शिक्षा है वह शिक्षा समाज के ढांचे को मजबूत करने के लिए ही व्यवस्थित की गई है, उसे तोड़ने के लिए नहीं। तो हम स्कूल में भी बच्चों को सिखा रहे हैं कि चोरी करना पाप है लेकिन यह नहीं सिखा रहे हैं कि शोषण करना पाप है; जब कि शोषण जारी रहेगा तो चोरी जारी रहेगी।
तो हम यह तो सिखा रहे हैं कि गरीब अमीर की संपत्ति छीने तो पाप है, अर्थात चोरी पाप है। तो भी कोई अमीर गरीब के घर चोरी करने नहीं जाता, गरीब अमीर के घर चोरी करने जाता है। चोरी पाप है, यह बच्चों को सिखा रहे हैं। शोषण, एक्सप्लायटेशन पाप है, यह नहीं सिखा रहे हैं, क्योंकि एक्सप्लायटेशन उलटे ढंग की चोरी है। वहां अमीर गरीब के घर में घुसता है। यानी मेरी दृष्टि में शोषण अमीर की चोरी करने की तरकीब है गरीब के घर से। और चोरी गरीब की तरकीब है शोषण करने की।
तो गरीब की तरकीब को तो हम इनकार कर रहे हैं शिक्षा में और अमीर की तरकीब को स्वीकार कर रहे हैं! तो अब तक जो शिक्षा है, वह समाज का जो ढांचा है, वह उस ढांचे से ही पैदा हुई है और उसमें ढांचे के सारे स्वार्थ स्वीकृत कर लिए गए हैं। फिर उसी ढांचे के अनुकूल हम शिक्षा दे रहे हैं। बच्चों को हम महत्वाकांक्षा की शिक्षा दे रहे हैं। उनको सिखा रहे हैं कि तुम आगे बढ़ो, यह पाओ, वह पाओ–बड़ा मकान, बड़ा पद, बड़ा धन; यह सब संपत्ति का जो जगत है उसकी ही दौड़ हम उसमें पैदा कर रहे हैं। फिर जो जीत जाएगा वह सफल है, जो हार गया, वह असफल है। यह शिक्षा मनुष्य की शांति, मनुष्य के आनंद, मनुष्य के स्वास्थ्य को ध्यान में रख कर निर्धारित नहीं हुई है। यह शिक्षा समाज का जो मौजूदा ढांचा है उस ढांचे को कैसे चलाया जाए, उसको ध्यान में रख कर निर्धारित की गई है।
समझ लें कि एक गांव हो और जिसमें सब पागल हों और उस गांव में शिक्षा का एक स्कूल भी हो, तो वह पागल अपने बच्चों को अपने जैसा बनाने के लिए जो-जो पागलपन के होने के रास्ते हैं, उस सबकी शिक्षा दे, ताकि वे बच्चे भी अपने मां-बाप के समाज में सम्मिलित हो जाएं। तो उस गांव के पागल शिक्षक और पागल समाज मिल कर बच्चों को इसके पहले कि उनमें बुद्धि, समझ आए, उनको पागल बना देने का सारा उपाय करेंगे। वह शिक्षा उन बच्चों को ध्यान में रख कर नहीं है। वह शिक्षा समाज के ढांचे को ध्यान में रख कर है।
तो अब तक की सारी शिक्षा समाज के ढांचे की बाई-प्राॅडक्ट है। और निश्चित ही जीवन बहुत जुड़ा हुआ है। समाज शिक्षा को बनाता है, फिर शिक्षा समाज को बनाने लगती है। फिर समाज शिक्षा को बनाता है, फिर शिक्षा समाज को बनाने लगती है। आज हम एक बच्चे को शिक्षित करते हैं, कल वह शिक्षक हो जाता है। मैं जिस शिक्षा की बात कर रहा हूं, उसमें पहली दफा व्यक्ति हमारा केंद्र होगा, समाज नहीं। समाज का हम केंद्र ही नहीं रखना चाहते। व्यक्ति के सुख, शांति, आनंद, स्वास्थ्य, व्यक्ति की परम संगीतपूर्ण उपलब्धि के लिए क्या किया जाना जरूरी है, वह हमारे ध्यान में होगा।
चाहे इसको ध्यान में रखने से समाज टूट जाए–टूटेगा समाज, यह समाज तो टूटेगा ही। पुरानी शिक्षा का आधार यह था कि समाज का ढांचा बचे, चाहे व्यक्ति टूट जाए। इसलिए वह व्यक्तियों को तोड़ने पर लगी थी। उसने सब व्यक्ति तोड़ डाले थे। कभी चूक कर कोई व्यक्ति बच जाता था, वह बात दूसरी है। लेकिन तब समाज उसे विद्रोही, बगावती, दुश्मन मानता था। वह व्यवस्था समाज को बचाती थी, व्यक्ति को मारती थी। और मजा यह है कि समाज को बचा कर क्या करिएगा, अगर व्यक्ति मर जाते हैं तो? क्योंकि अंततः इन्हीं व्यक्तियों का जोड़ समाज है। समाज तो सिर्फ एक ढांचा है मुर्दा। व्यक्ति जीवित शक्ति है। तो हमने उलटा काम किया हुआ था। यानी हमने कुछ ऐसा किया हुआ था कि एक रेलगाड़ी में कुछ यात्री बैठे हुए हैं, तो रेलगाड़ी को हम प्रमुख समझे हुए थे कि चाहे सारे यात्री मर जाएं, लेकिन रेलगाड़ी बचनी चाहिए। और यह हम भूल ही गए थे कि रेलगाड़ी हम किसके लिए बचाते हैं!
अब मेरा मानना है कि समाज को हमें यंत्र मानना चाहिए, व्यक्ति को प्राण। और व्यक्ति को बचाने के लिए चाहे समाज चला जाए, कोई फिकर नहीं! जाएगा नहीं, यह समाज चला जाएगा, नया समाज इसकी जगह आएगा। तो व्यक्ति केंद्र होगा शिक्षा का और जैसे ही व्यक्ति केंद्र हो जाएगा, तो अब तक जो हजार तरह की पैथालाॅजी, मानसिक बीमारी पैदा होती है, वह बहुत कम पैदा होगी। अब तक जो सामाजिक रोग, चोरी, हत्याएं, आत्महत्याएं पैदा होती हैं, वे बहुत कम पैदा होंगी। होता क्या है? हमें दिखाई नहीं पड़ता। अब जैसे कि सारी दुनिया में स्त्रियां बहुत आत्महत्याएं करती हैं। उसका कारण, स्त्रियों का स्वभाव नहीं है, उसका कारण स्त्रियों के ऊपर थोपी गई गुलामी है। गुलामी इस सीमा पर पहुंचा देती है जहां कि जीने से मरना बेहतर हो जाता है।
अब जैसे हिंदुस्तान में विधवाएं सती होती रही हैं, वह आत्महत्या को धार्मिक शक्ल देनी थी, और कुछ भी नहीं। आत्महत्या को सामाजिक सैंक्शन देना था, और कुछ भी नहीं। तो विधवा की हमने इतनी कष्टपूर्ण स्थिति बना रखी है कि उससे तो उसे मर जाना ही बेहतर मालूम पड़ा हमेशा। अगर विधवाएं आत्महत्याएं कर लें, या आत्महत्याएं न करें और चरित्रहीन हो जाएं, या चरित्रहीन हों और पाखंड को अंगीकार करके ऊपर से पाखंड जारी रखें, तो हम व्यक्ति को ही जिम्मेवार ठहराएंगे कि इस स्त्री ने आत्महत्या की, यह गलत थी। यह स्त्री व्यभिचारिणी हुई, यह गलत है। यह स्त्री पाखंडिनी है, यह ऊपर से कुछ दिखाती है, भीतर से कुछ है। जब कि सारा मामला यह है कि समाज इसको यही विकल्प दे रहा है। समाज इसको फिर से बस जाने का स्वस्थ विकल्प नहीं दे रहा है और समाज इसको समादृत रूप से अपने जीवन की आवश्यकताएं पूरे करने का विकल्प नहीं दे रहा है।
तो मेरा मानना यह है कि व्यक्ति पापी नहीं है, व्यक्ति अपराधी नहीं है, व्यक्ति व्यभिचारी नहीं है, अनाचारी नहीं है। मूलतः गहरे में समाज व्यभिचारी है, समाज पापी है, समाज अपराधी है। और समाज की इतनी बड़ी ताकत है कि एक-एक व्यक्ति को दबा कर उसकी जान ले लेता है और एक-एक व्यक्ति में इतनी ताकत होनी बहुत मुश्किल है कि उस बड़े समाज के ढांचे का वह विद्रोह करके और संघर्ष ले सके।
तो अगर एक अच्छी समाज व्यवस्था बनती है एक अच्छी शिक्षा आती है तो मेरा मानना है कि जो हमें व्यवस्था का बहुत डर है, वह तो रह नहीं जाएगा। जैसे एक पागलखाने में हम पूछ सकते हैं, पागलखाने के सुपरिन्टेंडेंट से हम कहें कि स्वतंत्रता होनी चाहिए, दरवाजे पर ताले नहीं होने चाहिए। तो वह कहेगा, आपको पता नहीं, सब व्यवस्था गड़बड़ हो जाएगी, पागल सब निकल भागेंगे। और कहां जाएंगे पता नहीं और क्या करेंगे, पता नहीं। तो हम उससे कहें कि हम पहले पागल को स्वस्थ करेंगे, फिर दरवाजा खोलेंगे। वह फिर भी पूछता है कि स्वस्थ हो जाएगा, वह ठीक है, लेकिन दरवाजा खुला रखने में हमेशा खतरा है पर उसे पता नहीं है कि खतरा उसके पागलपन में है, दरवाजा खुले होने में नहीं है।
समाज को इतने नियम में बांधने की जरूरत इसलिए है, कि हमने एक-एक व्यक्ति को उस हालत में खड़ा कर दिया है कि अगर इतने नियम न हों तो वह अभी गड़बड़ हो जाने वाला है। और इतने नियम होते हुए भी वह गड़बड़ होता है। अब यह इतनी अजीब स्थिति पैदा हो गई है और हमें दिखाई भी नहीं पड़ती। तो हमें हमेशा डर लगता है कि अगर कुछ नया किया और सब व्यवस्था टूट गई! व्यवस्था तो तोड़ ही दी जाएगी, व्यवस्था की कोई जरूरत नहीं है। व्यवस्था है इसलिए कि आदमी को हम ठीक पैदा नहीं कर पा रहे हैं, जैसा वह होना चाहिए। न हम उसे भोजन की, न कपड़ों की, न सेक्स की, जीवन की किसी बुनियादी जरूरत की परिपूर्ण स्वतंत्रता, सुविधा, शांति और आनंद नहीं जुटा पा रहे हैं। तो सब तरफ से उसे बीमार और परेशान कर रहे हैं। और ऐसा इंतजाम किया हुआ है पूरा का पूरा कि उस इंतजाम में या तो वह पागल हो जाए या पाखंडी हो जाए। यही, दो ही ऑल्टरनेटिव हैं। तो इतनी खतरनाक स्थिति अगर पैदा की गई हो तो उससे हमें बहुत बड़ा जाल नियम का बनाना पड़ा है।
आने वाली दुनिया में व्यवस्थित मनुष्य को ध्यान में रखा जाए और उसकी मनोवैज्ञानिक जरूरतें पूरी की जाएं, अब जैसे मेरा मानना है कि यह बात गलत ही है कि कोई आदमी जीवन भर एक पत्नी के साथ रहे। कोई रहना चाहे तो रहे, यह उसकी मौज होनी चाहिए। और आदमी इतना शांत और स्वस्थ होना चाहिए कि अगर एक के साथ रहने में आनंदित है तो रहे, लेकिन इसको थोपना खतरनाक है। आदमी परिपूर्ण स्वस्थ होगा तो शायद वह एक के साथ ही रहना आनंदपूर्ण पाएगा। क्रमशः……

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-3 

समाज नहीं, व्यक्ति हो शिक्षा का केंद्र – ओशो

ओशो ने कहा कि अब तक की शिक्षा व्यवस्था समाज के ढांचे को बचाने के लिए बनाई गई है, व्यक्ति को नहीं। उनका मानना है कि शिक्षा का असली मकसद व्यक्ति की शांति, आनंद और स्वास्थ्य होना चाहिए, न कि व्यवस्था की सुरक्षा।

चोरी पाप है, लेकिन शोषण क्यों नहीं?

ओशो ने सवाल उठाया कि स्कूलों में बच्चों को तो यह सिखाया जाता है कि चोरी पाप है, लेकिन यह नहीं सिखाया जाता कि शोषण पाप है।
उनके अनुसार –

  • चोरी गरीब की तरकीब है अमीर के खिलाफ।
  • शोषण अमीर की तरकीब है गरीब के खिलाफ।

शिक्षा गरीब की तरकीब (चोरी) को नकार देती है, लेकिन अमीर की तरकीब (शोषण) को स्वीकार कर लेती है।

शिक्षा समाज की नहीं, व्यक्ति की होनी चाहिए

ओशो का स्पष्ट कहना है कि अब तक की शिक्षा समाज का “बाई-प्रॉडक्ट” रही है।

  • समाज शिक्षा को बनाता है।
  • फिर वही शिक्षा समाज को बनाती है।

लेकिन इस चक्र में व्यक्ति टूट जाता है। इसलिए जरूरी है कि शिक्षा का केंद्र व्यक्ति हो, समाज नहीं।

समाज को बचाने की कीमत पर व्यक्ति टूटा

ओशो ने कहा कि पुरानी शिक्षा का आधार था – “समाज बचा रहे, चाहे व्यक्ति टूट जाए।”
इसीलिए विद्रोही या बागी व्यक्तियों को समाज हमेशा दुश्मन मानता रहा।
उनका तर्क है कि समाज केवल एक मुर्दा ढांचा है, जबकि व्यक्ति जीवित शक्ति है।

“समाज पापी है, व्यक्ति नहीं”

ओशो ने साफ कहा –

  • व्यक्ति मूलतः पापी, अपराधी या व्यभिचारी नहीं है।
  • असली अपराधी समाज है, जिसने व्यक्ति पर गुलामी और बंधन थोप दिए हैं।

उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि भारत में विधवाओं की सती प्रथा दरअसल “आत्महत्या को धार्मिक शक्ल देना” था। समाज ने उन्हें जीने का कोई स्वस्थ विकल्प ही नहीं दिया।

व्यवस्था नहीं, स्वस्थ व्यक्ति जरूरी

ओशो ने समझाया कि समाज में बहुत सारे नियम सिर्फ इसलिए बनाए गए हैं क्योंकि हमने व्यक्ति को बीमार बना दिया है।

  • अगर व्यक्ति स्वस्थ, स्वतंत्र और आनंदित होगा तो इतने नियमों की ज़रूरत ही नहीं रहेगी।
  • आज हम डरते हैं कि व्यवस्था टूट जाएगी, जबकि असली खतरा व्यवस्था में नहीं, हमारे पागलपन में है।

आने वाली शिक्षा कैसी हो?

ओशो का मानना है –

  • शिक्षा का केंद्र व्यक्ति की शांति, आनंद और स्वतंत्रता हो।
  • उसकी मनोवैज्ञानिक ज़रूरतें पूरी की जाएं।
  • समाज केवल एक यंत्र है, लेकिन व्यक्ति ही प्राण है।

उनके अनुसार, अगर व्यक्ति को स्वस्थ और स्वतंत्र रखा गया तो शोषण, अपराध, आत्महत्या जैसी बीमारियां अपने आप कम हो जाएंगी।

निष्कर्ष:
ओशो का संदेश साफ है –
“व्यक्ति को बचाओ, समाज अपने आप नया बन जाएगा।”