हमारी श्रमहीन प्रार्थना कहीं भी नहीं सुनी गई है–आज तक तो नहीं सुनी गई है। अभी भी हम श्रमहीन प्रार्थना ही किए चले जाते हैं। नहीं, ऐसी इंपोटेंट प्रेयरस, ऐसी नपुंसक प्रार्थनाएं न सुनी गई हैं, न सुनी जा सकती हैं। लेकिन हम सोचने को राजी नहीं हैं! हमने सोचना ही छोड़ दिया है। हमारे बच्चे भी नहीं सोच रहे हैं। हम सिर्फ अंधों की भीड़ की तरह चलते चले जाते हैं।
क्या यह उचित है?
नहीं, यह व्याख्या ही गलत है। सच बात यह है कि गरीबी मिटाने के संबंध में हमें चिंतन करना पड़े, इससे हम बच गए। हमने एक एक्सप्लेनेशन खोज लिया है कि गरीब आदमी पिछले जन्मों के कारण होता है। अब सोचने की कोई जरूरत न रही, बात खत्म हो गई। अब अपना अगला जन्म सुधारो, इस जन्म में तो कुछ हो नहीं सकता है, यह तो पिछले जन्म से हुआ है। तो हमने बात टाल दी पीछे। और बात टाल दी आगे। और आज? आज हम कुछ भी करने से बच गए–न सोचने की जरूरत है, न कुछ करने की जरूरत है।
स्कूल और कालेज में भी जो बच्चे पढ़ रहे हैं, उनको भी सिखाने का हमारा ढंग ऐसा ही है कि वे भी वहां से विचारवान होकर वापस नहीं लौटते। वे वहां से विज्ञान सीख कर लौटते हैं लेकिन उनके दिमाग का ढांचा वही है, जो पुराना था। वे विज्ञान को भी पकड़ लेते हैं अंधे की तरह। उनको यह पता नहीं है कि विज्ञान को अंधे की तरह पकड़ना खतरनाक है। क्योंकि विज्ञान रोज बदल जाता है। जब हम विश्वविद्यालय से पढ़ कर आते हैं, जब हम विश्वविद्यालय में पढ़ते हैं, तब तक सच में विज्ञान बदल गया होता है। पकड़ने की कोई जरूरत नहीं है अंधे की तरह, सोचने की जरूरत है, विचारने की जरूरत है, ताकि मैं जिंदगी को सीधा-सीधा हल करने के लिए कुछ कर सकूं।