हमारी श्रमहीन नपुंसक प्रार्थनाएं न सुनी गई हैं, न सुनी जा सकती हैं, लेकिन हम सोचने को राजी नहीं हैं!

ओशो- रूस में उन्होंने सारे रेगिस्तानों को बदल कर खेत बना दिया है, और हमारे सब खेत धीरे-धीरे रेगिस्तान बने जाते हैं! उन्होंने जहां कभी कुछ पैदा नहीं हुआ था, वहां सब पैदा करके बता दिया! जहां कभी पानी की बूंद नहीं गई थी, वहां नदियां पहुंचा दीं उन्होंने! जहां कुछ भी नहीं होता था, वहां बहुत कुछ करके दिखा दिया! जहां कल बिलकुल रेगिस्तान था, आदमी जिन जगहों में प्रविष्ट नहीं हुआ था, वहां सुंदर गांव बना दिए! तो भगवान अगर कहीं भी है, तो उनके श्रम की प्रार्थना को सुनता होगा।हमारी श्रमहीन प्रार्थना कहीं भी नहीं सुनी गई है–आज तक तो नहीं सुनी गई है। अभी भी हम श्रमहीन प्रार्थना ही किए चले जाते हैं। नहीं, ऐसी इंपोटेंट प्रेयरस, ऐसी नपुंसक प्रार्थनाएं न सुनी गई हैं, न सुनी जा सकती हैं। लेकिन हम सोचने को राजी नहीं हैं! हमने सोचना ही छोड़ दिया है। हमारे बच्चे भी नहीं सोच रहे हैं। हम सिर्फ अंधों की भीड़ की तरह चलते चले जाते हैं।क्या यह उचित है?

यही सवाल पूरे मुल्क में जगह-जगह मैं लोगों से पूछता हूं, क्या यह उचित है? क्या यह हितकर है कि हम इस तरह अंधों की भांति चलते चले जाएं, या कि हम जिंदगी के संबंध में कोई निर्णय लें, जिंदगी को अच्छा बनाने की कोई कोशिश करें?
नहीं, हमने ऐसी व्याख्याएं तय कर ली हैं, जिनसे जिंदगी को अच्छा बनाने का सवाल ही खत्म कर दिया है। हमने जिंदगी में इस तरह की तरकीबें खोज ली हैं, जिससे न सोचने की जरूरत है, न काम करने की जरूरत है, न कुछ बदलने की जरूरत है। अगर एक आदमी गरीब है तो हम कहते हैं, वह अपने भाग्य के कारण गरीब है। एक आदमी अमीर है तो हम कहते हैं, अपने भाग्य के कारण अमीर है! तो फिर मानना चाहिए कि हिंदुस्तान में सब भाग्यहीन पैदा होते हैं। और अमरीका पर भगवान की कुछ ज्यादा कृपा है, सब भाग्यवान वहीं पैदा हो जाते हैं। और कोई आदमी गरीब है तो हम कहते हैं, पिछले जन्मों में पाप किए होंगे इसलिए गरीब है। कोई आदमी अमीर है तो पिछले जन्मों में पुण्य किए होंगे। तो फिर भगवान इस मुल्क को क्या कोई नरक समझ रहा है कि सब पापियों को यहीं भेजता चला जा रहा है? एक ही मतलब होगा इसका कि सब पापी यहीं पैदा हो जाते हैं। सब पुण्यात्मा कहीं और पैदा हो जाते हैं। सब पापी यहीं पैदा हो जाते हैं–क्या यह ठीक मालूम पड़ता है?
नहीं, यह व्याख्या ही गलत है। सच बात यह है कि गरीबी मिटाने के संबंध में हमें चिंतन करना पड़े, इससे हम बच गए। हमने एक एक्सप्लेनेशन खोज लिया है कि गरीब आदमी पिछले जन्मों के कारण होता है। अब सोचने की कोई जरूरत न रही, बात खत्म हो गई। अब अपना अगला जन्म सुधारो, इस जन्म में तो कुछ हो नहीं सकता है, यह तो पिछले जन्म से हुआ है। तो हमने बात टाल दी पीछे। और बात टाल दी आगे। और आज? आज हम कुछ भी करने से बच गए–न सोचने की जरूरत है, न कुछ करने की जरूरत है।

इस तरह की आत्मघाती धारणाएं छोड़नी पड़ेंगी। मैं नहीं कहता हूं कि जो मैं कहूं, वह सही है। मैं कहता यह हूं कि कोई भी कुछ कहे, किसी के कहने से कुछ सही नहीं होता है। हम सबको सामूहिक चिंतन के लिए तैयारी दिखानी चाहिए। और एक-एक सवाल को वापस जगा लेना चाहिए, मुल्क के सामने सारे सवाल खड़े कर देने चाहिए। और मुल्क की आने वाली पीढ़ियों को विश्वास में नहीं ढालना चाहिए। बहुत हो चुका विश्वास। उन्हें विचार की प्रक्रिया में गति देनी चाहिए।स्कूल और कालेज में भी जो बच्चे पढ़ रहे हैं, उनको भी सिखाने का हमारा ढंग ऐसा ही है कि वे भी वहां से विचारवान होकर वापस नहीं लौटते। वे वहां से विज्ञान सीख कर लौटते हैं लेकिन उनके दिमाग का ढांचा वही है, जो पुराना था। वे विज्ञान को भी पकड़ लेते हैं अंधे की तरह। उनको यह पता नहीं है कि विज्ञान को अंधे की तरह पकड़ना खतरनाक है। क्योंकि विज्ञान रोज बदल जाता है। जब हम विश्वविद्यालय से पढ़ कर आते हैं, जब हम विश्वविद्यालय में पढ़ते हैं, तब तक सच में विज्ञान बदल गया होता है। पकड़ने की कोई जरूरत नहीं है अंधे की तरह, सोचने की जरूरत है, विचारने की जरूरत है, ताकि मैं जिंदगी को सीधा-सीधा हल करने के लिए कुछ कर सकूं।

और अगर एक बड़ा मुल्क सोचने लगे–इतना बड़ा मुल्क है हमारा, अगर यहां विचार की प्रक्रिया मुक्त हो जाए तो शायद हम जीवन को सब तरफ से बदलने में समर्थ हो सकते हैं। अब गरीब रहने की कोई जरूरत नहीं है। सिर्फ अज्ञान गरीब बनाए हुए है। अब इतनी बीमारियां झेलने की कोई जरूरत नहीं है, सिर्फ अज्ञान बीमारियां बनाए हुए है। अब पृथ्वी को नरक और दुख बनाने की कोई जरूरत नहीं है, विज्ञान ने इतनी शक्तियां मुक्त कर दी हैं कि अगर हमारे मन विचारपूर्ण हों तो हम उन सारी शक्तियों से जमीन को स्वर्ग बना सकते हैं।

लेकिन यह नहीं हो पा रहा है, क्योंकि हमारे मन पुराने हैं और उनका ढांचा बिलकुल बंद है, क्लोज्ड है। सब दिमाग बंद हैं, जैसे कोई आदमी सब द्वार-दरवाजे बंद करके भीतर अपने मकान में छिप गया हो। वह न द्वार खोलता है, न दरवाजा खोलता है–न सूरज की रोशनी आती है, न हवाएं आती हैं। वह भीतर ही सड़ता और मरता है। ऐसे हम बंद हैं।

नहीं, खुला हुआ मस्तिष्क चाहिए–सब तरफ से खुला हुआ। गीता पर संदेह चाहिए, रामायण पर संदेह चाहिए, कृष्ण पर, गांधी पर, बुद्ध पर, महावीर पर संदेह चाहिए तो मन खुलेगा, तो मन मुक्त होगा। तो हम सोचना शुरू करेंगे। लेकिन हम कहते हैं, महावीर! महावीर सर्वज्ञ थे। उन्होंने जो जान लिया वह हमेशा के लिए सत्य है! और हमारी किताब में जो लिखा है चांद के बाबत, वह सही है। शंकराचार्य भी यह कह रहे हैं! वह यह कह रहे हैं कि पहली तो बात यह है कि चांद पर गए ही नहीं लोग, यह सब झूठी अफवाह है! दूसरा, अगर वे चले भी गए हों, तो यह वह चांद नहीं है, जो हमारे शास्त्रों में लिखा हुआ है! वह चांद बहुत आगे है। हम किस तरह अपने दिमाग को बंद किए हुए बैठे हैं!
एक बूढ़ी औरत ने मुझे आकर कहा कि सुना आपने, शंकराचार्य ने क्या कहा है? मैंने कहाः मैंने सुना है, और अगर मुल्क समझदार होगा तो ऐसे लोगों के मस्तिष्क का इलाज करवाना चाहिए। उस बूढ़ी औरत ने कहाः आप क्या कहते हैं? हमारे वह जगतगुरु हैं, वह जो कहते हैं, वह ठीक कहते हैं। मैंने कहाः वह तुम्हें ठीक लगता है, तुम्हें ठीक लगता रहेगा, क्योंकि तुम्हारा मस्तिष्क भी उतना ही बंद है, जितना उनका है। लेकिन, दुनिया में यह चलेगा नहीं। आज नहीं कल, वह तो पागल सिद्ध होंगे, उनके पीछे चलने वाली पूरी जमातें भी पागल सिद्ध हो जाएंगी। लेकिन हम चले चले जाएंगे! हम चलते चले जाएंगे! क्रमशः…….

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-३