परिचित सुरक्षा से अपरिचित खतरा बेहतर है, क्योंकि जीने का रस, जीने की ऊर्जा, जीने की चुनौती, वहां मिलती है

ओशो- भारत के समाज की जिंदगी एक तालाब की जिंदगी हो गई है। एक नदी की जिंदगी नहीं है। हां, तालाब की जिंदगी एक अर्थों में सुरक्षित होती है, सिक्योर होती है–न कहीं जाना है, न कोई तकलीफ है; न रास्ते की अड़चने हैं, न अनजान रास्तों की भटकने हैं; न पहाड़ों को पार करना है, न अज्ञात सागर, जो मिलेगा या नहीं मिलेगा, उसके सपने देखने हैं–अपनी जगह बंद, अपनी जगह निशिं्चत। तालाब का अपना सुख है। भारत तालाब का सुख भोग रहा है, सरिता का संघर्ष नहीं है। और इस सुख भोगने के हम इतने आदी हो गए हैं कि हमने अब किसी भी तरह के खतरे को उठाना हजारों साल से बंद कर दिया है।
लेकिन ध्यान रहे, जो समाज खतरों को उठाना बंद कर देता है, वह समाज धीरे-धीरे अपनी ज्योतिशिखा को क्षीण कर लेता है। खतरों के मुकाबले में ही ज्योति जगती है भीतर की। नीत्शे अपनी टेबल पर एक तख्ती रखे हुए था। उस तख्ती पर दो शब्द लिखे हुए थे। और जब भी कोई उससे पूछता कि तुम्हारी जिंदगी का सारभूत, तुम्हारी जिंदगी का सार आ जाए, ऐसी कोई बात क्या है? तो वह तख्ती को बता देता। उस तख्ती पर लिखा हुआ था–लिव डेंजरसली, खतरे में जीओ।

सच बात तो यह है कि खतरे में जीने पर ही जीवन का पता चलता है। सुरक्षा में जीने पर जीवन का पता ही नहीं चलता। और इसलिए कब्र में जो रहते हैं, वे बहुत सुरक्षित जीते हैं। वहां कोई खतरा नहीं है। तालाब की जिंदगी खतरे से बचने की जिंदगी है। लेकिन तालाब सड़ता है, पुराना पड़ता है, नष्ट होता है, गंदा होता है। भारत में भी सैकड़ों वर्षों से सुरक्षा की एक जिंदगी चुन ली है। अपनी खोल बना लिए हैं, उसके भीतर हम बैठ गए हैं। न हमें दुनिया के विस्तार में प्रवेश करना है, न हमें चांद-तारों की यात्राएं करनी हैं, न हमें कहीं जाना है। हम अपने घर से बंधे हुए हैं। हम आदमी कम, वृक्षों की तरह ज्यादा हैं, जिनकी जड़ें जमीन से बंधी हैं। और जो वहीं अटके रह गए हैं, वहां से हिलते-डुलते भी नहीं हैं। और हर बेटा अपने बाप की जगह पकड़ लेता है। पीढ़ी दर पीढ़ी यह जगह पकड़ते चले जाते हैं। पुनरुक्ति होती चली जाती है। आदमी बदलते चले जाते हैं, लेकिन समाज वैसा का वैसा है, जैसा था।
अगर हजार साल पहले का कोई आदमी आज भी भारत के गांव में आ जाए तो उसे कोई अड़चन नहीं होगी। कोई तबदीली उसे मालूम नहीं होगी–वही सब, वैसा सब, जैसा था। और हम इससे बहुत सुखी भी होते हैं। हम कहते हैं, हमारे नेतागण कहते हैं कि रोम मर गया, यूनान मर गया, इजिप्त मर गया। सीरिया कहां है अब, बेबीलोन कहां है? लेकिन हम? हम हैं। यह हमारी थिरता को हम बहुत सम्मान देते हैं। यह थिरता सम्मान की बात नहीं है, यह थिरता बहुत अपमानजनक है। यह थिरता यह कहती है कि हमारे भीतर परिवर्तन की क्षमता खो गई है। वह परिवर्तन की जो पात्रता है हमारे भीतर, वह खो गई है। हम थिर हो गए हैं। एक पत्थर पड़ा हो गुलाब के फूल के पास। सुबह गुलाब का फूल खिलता है, नाचता है सूरज की रोशनी में, आकाश में उठने की कोशिश करता है, सांझ होते-होते कुम्हला जाता है और गिर जाता है। पास सुबह जो पत्थर पड़ा था, वह जैसा सुबह पड़ा था, वैसा ही सांझ भी पड़ा रहा। वह पत्थर अपने मन में जरूर सोचता होगा–मिट गया फूल, हम जैसे हैं, वैसे ही हैं। कई फूल आए और गए लेकिन हम? हम जैसे हैं वैसे हैं। बड़ा प्रसन्न होता होगा वह पत्थर। लेकिन पत्थर को पता नहीं कि फूल होने का आनंद क्या है! पत्थर को यह भी पता नहीं कि परिवर्तन की पुलक क्या है! पत्थर को यह भी पता नहीं कि जिंदा होना, खिलना, कुम्हलाना और गिर जाना, इसका भी अर्थ है, और राज है, और इसका भी रहस्य है। और पत्थर को यह भी पता नहीं कि मुर्झाते केवल वे ही हैं जो खिलते हैं। और गिरते केवल वे ही हैं जो उठते हैं। और पत्थर को यह भी पता नहीं है कि मरते केवल वे ही हैं जो जीते हैं। अगर मरने से बचना है तो जीने से बच जाओ। अगर गिरने से बचना है तो उठने से बच जाओ। अगर मुर्झाने से बचना है तो खिलना ही मत। लेकिन पत्थर को क्या पता है?
मैंने सुना है, एक बगीचे में एक दिन सुबह बड़ी अजीब घटना घट गई। पत्थरों की दीवाल में दबे हुए घास के कुछ छोटे-छोटे फूल थे। वे दीवाल के पत्थरों की आड़ में ही दब कर जीते थे। न उन्हें तूफानों का पता चलता था, क्योंकि दीवाल सदा ओट बन जाती थी। न उन्हें सूरज की रोशनी का पता चलता था कि कब सूरज उगा, कब डूबा। वे तो अपनी पत्थर की ओट में, अपनी गुफा में छिपे रहते थे। वर्षा आती थी, तो उन्हें पता नहीं चलता था। रात चांद-तारे खिलते थे, तो उन्हें पता नहीं चलता था। लेकिन वे बड़े सुरक्षित थे, कोई खतरा न था।उन घास के फूलों में से एक फूल का दिमाग खराब हो गया और उसने एक दिन झांक कर बाहर देखा कि एक गुलाब का फूल दीवाल के ऊपर आकाश की तरफ उठा हुआ है। उसके मन में भी एक कामना और एक सपना समाया कि मैं भी नहीं बन सकता हूं गुलाब, मैं भी नहीं उठ सकता हूं ऐसा ही? उसने रात भगवान से बहुत प्रार्थना की कि मुझे गुलाब बना दो। भगवान ने उसे बहुत समझाया कि पागल, तू बहुत सुरक्षित है। गुलाब सुबह खिलता है, सांझ गिर जाता है। तेरा फूल खिलता है तो महीनों खिला रहता है। लेकिन उस घास के फूल ने कहाः वह मैं समझा। मेरा फूल महीनों इसीलिए खिला रहता है कि सच में मेरा फूल खिलता ही नहीं। घास का फूल पहले से ही सूखा होता है, इसलिए कुम्हलाता भी नहीं। नहीं, मुझे तो खिलना है गुलाब की तरह। मखमली गुलाब की कलियों की तरह मेरी भी कलियां हों। नहीं, मुझे इस पत्थर की ओट में नहीं जीना है। मैं तो खुले आकाश में उठना चाहता हूं। एक क्षण को सही, लेकिन उठूं तो, सिर तो उठाऊं।

नहीं माना घास का फूल। पड़ोस के दूसरे फूलों ने भी समझाया कि पागल हो गए हो, हमारे कुल-परंपरा में ऐसा कभी नहीं हुआ है। यह तो सदा की रीति चली आई है कि हम यहीं रहते हैं, इसी पत्थर के नीचे दबे रहते हैं। हमारे बापदादों ने कभी ऐसा नहीं सोचा। उनके बापदादों ने भी नहीं सोचा। यह कभी बात ही नहीं सोची गई, हमारे पुराणों में कहीं नहीं लिखी है। यह तो क्या पागलपन की बात है? दिखता है तेरा सिर फिर गया है। दूसरों के सत्संग में दिखता है बिगड़ गया है। अपने भीतर रहो, अपनी सीमा में रहो। अपनी जितनी चादर है उतने पैर फैलाओ। यह बाहर पैर फैलाना खतरनाक है। मर जाओगे, देखते नहीं, गुलाब के फूल को कितनी तकलीफें होती हैं? अभी परसों तूफान आया था, तब गुलाब के फूल जमीन पर पड़े थे, देखा? उस दिन जब वर्षा हो रही थी, तब गुलाब के पत्ते-पत्ते रो रहे थे। और जब तेज हवाएं चलती हैं, तो गुलाब की जड़ें तक कंप जाती हैं। हम सब सुरक्षित और आनंदित हैं। और पता नहीं, सुबह खिलता है गुलाब और सांझ पंखुड़ियां गिरने लगती हैं, जब कि हम महीनों खिले रहते हैं।
लेकिन वह घास का फूल नहीं माना। उसने कहा कि नहीं, मुझे तो एक दिन गुलाब होकर देखना है। नहीं माना। और मत मानिए तो भगवान भी क्या कर सकता है? मान जाइए तो ही कुछ कर सकता है। मत मानिए तो भगवान भी क्या कर सकता है?

नहीं माना, तो गुलाब का फूल हो गया। सुबह वह जो घास का फूल था, गुलाब का पौधा हो गया। लेकिन, सूरज निकला, आकाश में बादल घिरे, जोर की हवाएं चलने लगीं; वे जो घास के फूल नीचे थे, वे झांक-झांक कर चिल्लाने लगे कि देखा पागल, अब मरोगे। क्षण भर के सुख के लिए शाश्वत सुख खो दिया। क्षण भर के लिए, गुलाब होने के लिए, वह सुरक्षा खो दी, जो सदा के लिए अपनी थी। बादल गरजने लगे, पानी गिरने लगा, तूफानी हवाएं बहने लगीं। उस गुलाब की पतली शाखाएं आकाश में डोलने लगीं। उसकी पंखुड़ियां गिरने लगीं, उसके पत्ते गिरने लगे, फिर वह पूरा पौधा गिर पड़ा। उसकी जड़ें उखड़ गईं। जब वह दम तोड़ रहा था, तो उसके पास उन घास के फूलों ने झुक कर कहाः मित्र, अब बुद्धि आई कि नहीं? क्षण भर को आकाश में उठ जाने का कितना फल भोगना पड़ा। लेकिन उस मरते गुलाब ने कहाः दोस्तो, उस क्षण में जो जान लिया, वह हजारों वर्ष भी पत्थर की ओट में छिपे हुए नहीं जाना। आकाश में उठना एक क्षण को, तूफानों से जूझ जाना! एक क्षण को सही, आकाश के खुले सूरज के सामने खड़ा होना! कमजोर शाखाएं सही, लेकिन तूफानों से जूझ जाना! थोड़ी ही देर को खिलना, लेकिन खिलना! जो मजा जाना, जो जिंदगी जानी, जो रस जाना! परमात्मा को धन्यवाद। और तुम पर लानत है कि तुम्हें कभी पता नहीं चलेगा। तुम अपनी सुरक्षा की ओट में ही जीयोगे और मर जाओगे। तुम्हारा जीना, जीना भी नहीं है, क्योंकि तुम्हें पता ही नहीं कि तूफान में जीने का क्या अर्थ होता है?

पता नहीं, यह बात कभी हुई या नहीं, लेकिन भारत की जिंदगी में यह बात हुई है, ऐसा मालूम पड़ता है। हम सुरक्षा की ओट में बैठ कर रह गए हैं। धीरे-धीरे सुरक्षा का इतना मोह हो गया है कि खतरे में, किसी भी खतरे में उतरने का साहस ही समाप्त हो गया है। और तब जो पुराना है, वह सुरक्षित है, क्योंकि पुराना परिचित है। अपरिचित–असुरक्षित है, अनजान! भय देता है। बिना पहचान के रास्ते पर जाने में डर लगता है। इसलिए एक रास्ता हमने बना लिया है, कोल्हू के बैल की तरह, हम उसी पर घूमते रहते हैं। बस उसी पर घूम रहे हैं हजारों साल से। और हमारा शिक्षक भी नई पीढ़ी को उसी में दीक्षित कर देता है। उसी कोल्हू के रास्ते पर जहां बाप-दादे और पुरखे घूमते रहे थे, वहीं हम बच्चों को भी दीक्षित कर देते हैं।

नहीं, इस तरह नये भारत का जन्म नहीं हो सकता है। शिक्षक को एक कदम उठाना पड़ेगा। सारे भारत के शिक्षकों को हिम्मत से कदम उठाना पड़ेगा कि हम उस लीक को तोड़ेंगे, जिस पर भारत की चेतना हजारों साल से चक्कर काट रही है। जरूर अनजान का खतरा होगा। लेकिन अनजान के खतरे में डर क्या है?

परिचित सुरक्षा से अपरिचित खतरा बेहतर है, क्योंकि जीने का रस, जीने की ऊर्जा, जीने की चुनौती, वहां मिलती है। क्रमशः…….

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-३