लेकिन ध्यान रहे, जो समाज खतरों को उठाना बंद कर देता है, वह समाज धीरे-धीरे अपनी ज्योतिशिखा को क्षीण कर लेता है। खतरों के मुकाबले में ही ज्योति जगती है भीतर की। नीत्शे अपनी टेबल पर एक तख्ती रखे हुए था। उस तख्ती पर दो शब्द लिखे हुए थे। और जब भी कोई उससे पूछता कि तुम्हारी जिंदगी का सारभूत, तुम्हारी जिंदगी का सार आ जाए, ऐसी कोई बात क्या है? तो वह तख्ती को बता देता। उस तख्ती पर लिखा हुआ था–लिव डेंजरसली, खतरे में जीओ।
उन घास के फूलों में से एक फूल का दिमाग खराब हो गया और उसने एक दिन झांक कर बाहर देखा कि एक गुलाब का फूल दीवाल के ऊपर आकाश की तरफ उठा हुआ है। उसके मन में भी एक कामना और एक सपना समाया कि मैं भी नहीं बन सकता हूं गुलाब, मैं भी नहीं उठ सकता हूं ऐसा ही? उसने रात भगवान से बहुत प्रार्थना की कि मुझे गुलाब बना दो। भगवान ने उसे बहुत समझाया कि पागल, तू बहुत सुरक्षित है। गुलाब सुबह खिलता है, सांझ गिर जाता है। तेरा फूल खिलता है तो महीनों खिला रहता है। लेकिन उस घास के फूल ने कहाः वह मैं समझा। मेरा फूल महीनों इसीलिए खिला रहता है कि सच में मेरा फूल खिलता ही नहीं। घास का फूल पहले से ही सूखा होता है, इसलिए कुम्हलाता भी नहीं। नहीं, मुझे तो खिलना है गुलाब की तरह। मखमली गुलाब की कलियों की तरह मेरी भी कलियां हों। नहीं, मुझे इस पत्थर की ओट में नहीं जीना है। मैं तो खुले आकाश में उठना चाहता हूं। एक क्षण को सही, लेकिन उठूं तो, सिर तो उठाऊं।