कोई आदमी किसी और जैसा बनने को पैदा नहीं हुआ लेकिन हम आज तक भी यह नहीं कह पाए बच्चों को कि तुम अपने जैसे बन जाओ, यह साहस शिक्षा अब तक नहीं जुटा पाई
ओशो- यह दुनिया में आपको पता है, जिस दिन से शिक्षा बढ़ गई है, उस दिन से युवकों के मन में गहरा विध्वंस का, डिस्ट्रक्शन का भाव पैदा हो गया है? लोग कहते हैं, पहले के लोग बड़े अच्छे थे, वे विध्वंस नहीं करते थे। उसका कुल कारण इतना था कि वे अशिक्षित थे, शिक्षित नहीं थे। और कोई कारण नहीं था। आज भी दुनिया में जहां अशिक्षा है, वहां का युवक शांत है।
क्या मैं यह कह रहा हूं, कि शांति बनाए रखने के लिए दुनिया में अशिक्षा बनाई रखी जाए? नहीं, मैं यह नहीं कह रहा हूं। मैं यह कह रहा हूं कि यह शिक्षा गलत है, हमें कोई और शिक्षा खोजनी चाहिए। आज नहीं कल, इस संबंध में सोचना ही पड़ेगा। नहीं सोचेंगे तो यह शिक्षा ही हमारे आत्मघात का कारण बन सकती है। इसमें पहला स्वर, इस शिक्षा में जो भूल भरा है, वह महत्वाकांक्षा का, एंबीशन का है।
एंबीशन या महत्वाकांक्षा कहां पहुंचाती है मनुष्य के मन को? जब कोई व्यक्ति प्रथम आने के लिए कोशिश में संलग्न होता है तो आपको पता है, वह क्या सीख रहा है? वह क्या कर रहा है? उसके भीतर क्या गुजर रहा है? उसका मन किस प्रक्रिया से पार हो रहा है, उसके मन में क्या निर्मित हो रहा है? उसको जो खुशी मिलती है प्रथम आकर, आपको पता है कि वह खुशी किस बात पर खड़ी है?
वह प्रथम आने की खुशी नहीं है, वह दूसरों को दुखी करने का सुख है। वह स्वयं के प्रथम आने की खुशी है ही नहीं, वह दूसरों को दुखी करने का आनंद है। जो पीछे छूट गए हैं और जिनकी आंखें आंसुओं से भरी हैं, उन्हीं से वह मुस्कुराहट निर्मित होती है जो प्रथम आने वाले की थी।
महत्वाकांक्षा इसलिए अनिवार्य रूप से हिंसा सिखाती है, वायलेंस सिखाती है। महत्वाकांक्षा हिंसा का गहरे से गहरा परिणाम है। महत्वाकांक्षा के केंद्र पर हिंसा है, वायलेंस है। और फिर जब एक बार युवा होते-होते तक चित्त इसमें दीक्षित हो जाता है, तो फिर जीवन भर इसी दौड़ में दौड़ता है और जीता है। फिर किनके कंधों पर पैर रखने पड़ते हैं, किनकी लाशों को सीढ़ियां बनाना पड़ता है, फिर इसका कोई ध्यान नहीं दिया जा सकता है।
जिंदगी छोटी है और प्रथम पहुंचना बहुत जरूरी है। बहुत जरूरी है कि हम प्रथम पहुंच जाएं। क्योंकि जगत उनका गुणगान करता है, जो प्रथम पहुंच जाते हैं। फिर वह यह पूछता ही नहीं कि वह प्रथम पहुंचे कैसे? उनके प्रथम पहुंचने के पीछे क्या-क्या हुआ, यह फिर कोई भी नहीं पूछता! सफलता से कोई प्रश्न ही पूछे नहीं जाते! प्रश्न सिर्फ असफलता से पूछे जाते हैं। असफल आदमी से लोग पूछते हैं, आप असफल कैसे हो गए? सफल आदमी से कोई भी नहीं पूछता कि किन सीढ़ियों को, किन सैनियों को, किन पुलों को पार करके आप पहुंचे हैं। कहीं उन सब सीढ़ियों पर खून के निशान तो नहीं हैं, कहीं उन सब मंजिलों पर लाशें तो नहीं रखी हैं? यह कोई भी नहीं पूछता! सफलता सफल होते ही महिमावंत हो जाती है। तो फिर दौड़ को आदमी दौड़ता रहता है, दौड़ता रहता है। और इसको हम सिखाना शुरू कर देते हैं पहले दिन से!
यह मैं क्यों कह रहा हूं कि प्रथम आने का सुख खुद के प्रथम आने का सुख नहीं है!
एक छोटे से गांव में मेरे एक मित्र रहते हैं। उन्होंने उस गांव में एक बहुत बड़ा आलीशान भवन बनाया था। वे खूब खुश थे जब मैं उनके गांव गया। वे बहुत प्रसन्न थे अपने मकान के बाबत। तीन दिन वहां था तो बार-बार बात करते थे, कैसा आपको लगा? फिर दो वर्ष बाद मैं उनके गांव गया। उनका मकान उतना ही अच्छा था, लेकिन एक गड़बड़ हो गई थी। पड़ोस में उससे भी बड़ा एक मकान खड़ा हो गया था। फिर वे मुझसे बिलकुल भी नहीं पूछते थे कि इस मकान के बाबत आपका क्या खयाल है? बल्कि बहुत उदास मालूम पड़ते थे। मैंने उनसे पूछा, आप कुछ खिन्न-खिन्न, कुछ उदास-उदास मालूम होते हैं, बात क्या है? उन्होंने कहा, जब से यह बड़ा मकान पड़ोस में बन गया, न मालूम कैसी उदासी मन में छा गई? तो मैंने उनको कहा कि क्या मैं निवेदन करूं, वह जो खुशी थी आपकी, अपने मकान के कारण नहीं थी, बगल में जो झोपड़ियां खड़ी थीं, उनके कारण थी। क्योंकि बगल का महल उदास करने लगा। आपका मकान तो वैसा का वैसा है, उसमें कोई भी फर्क नहीं पड़ा। अगर उसके ही कारण खुशी थी तो खुशी आज भी होती। लेकिन वह खुशी विलीन हो गई। पास में बड़ा मकान खड़ा हो गया। पास में झोपड़ियां थीं, मन बड़ा खुश था।
अमीर आदमी की खुशी अमीरी में नहीं, आस-पास के गरीबों में होती है। सुंदर आदमी की खुशी सौंदर्य में नहीं, पास-पड़ोस छिपे हुए कुरूप चेहरों में होती है, जीते हुए आदमी की खुशी जीत में नहीं, हारे लोगों की कतार में और पंक्तियों में होती है। लेकिन यही हम सिखाते हैं। यही हम कोशिश करते हैं। यही हम श्रम करते हैं। इसके लिए ही हम इतना उपाय और आयोजन करते हैं और अंत में हम यह सिखाते हैं।
और क्या आपको पता है कि जो आदमी प्रथम पहुंच जाता है—थोड़े से लोग ही सही—क्या वे भी सच में आनंदित हो जाते हैं? क्योंकि जिनका आनंद दूसरों के दुख पर खड़ा हो, वे ज्वालामुखी के ऊपर बैठे हुए हैं, वे वस्तुतः आनंदित हो नहीं सकते हैं। और फिर एक बड़ा मजा है। प्रथम होने की यह जो दौड़ है, इसमें आप कितने भी प्रथम हो जाएं, आप अंतिम रूप से प्रथम कभी भी नहीं हो पाते। आज तक दुनिया में एक भी आदमी ऐसा नहीं हुआ, जिसने यह कहा हो, मैं बिलकुल प्रथम हो गया हूं, अब मुझसे आगे कोई भी नहीं। हुआ है कोई आदमी? सिकंदर, नेपोलियन, या हिटलर या स्टैलिन की आत्माओं से पूछें? वे पहुंच गए वहां जिसके आगे कोई भी न हो? आज तक एक भी आदमी नहीं पहुंचा।
क्या आपको मालूम है, सिकंदर से मरते वक्त किसी ने कहा था, आपने तो सारी दुनिया जीत ली, आप तो प्रसन्न होंगे! सिकंदर ने कहा: जैसे ही मैं पूरी दुनिया जीतने के करीब पहुंचा, मेरे मन में एक उदासी घिरने लगी कि एक ही दुनिया है केवल, फिर अब आगे क्या करूंगा, दूसरी दुनिया नहीं है। ठीक कहा उसने। एक दुनिया जीत नहीं पाते कि दूसरी दुनिया जीतने को चाहिए। और कोई आदमी प्रथम नहीं हो पाता, इससे आपको कुछ पता चलता है? फेरिये करके एक वैज्ञानिक था जो छोटे-छोटे कीड़े-मकोड़ों पर शोध करता था। एक जाति के कीड़े होते हैं, जो हमेशा कतारबद्ध चलते हैं, नेता-कीड़े के पीछे चलते हैं। आदमी जैसी प्रवृत्ति उनकी भी होती होगी। एक नेता होता है, वह आगे चलता है, पीछे कतार बांध कर कीड़े चलते हैं। उस फेरिये ने क्या किया? एक गोल थाली में नेता-कीड़े को चला दिया और पीछे दस पांच कीड़े छोड़ दिए। अब वे गोल थाली में चक्कर लगाना शुरू किए, शुरू किए। अब वे लगाते जाते हैं, नेता चलता जाता है। पीछे उसके वे चलते जाते हैं। कोई अंत आता नहीं, क्योंकि गोल का कोई अंत होता नहीं। गोल चक्कर का कोई अंत हो नहीं सकता। वे चलते जाते हैं। आखिर, तब तक चलते रहते हैं कि फेरिये भी थक गया और वे कीड़े भी थक-थक कर मरने लगे। लेकिन वे चलते जा रहे हैं, वे चलते जा रहे हैं।
आदमी भी किसी गोल चक्कर में चल रहा है, इसलिए कोई कभी पहला नहीं हो पाता। हमेशा पीछे भी कोई होते हैं, आगे भी कोई होते हैं। गोल चक्कर है, उसमें पहले कोई हो ही नहीं सकता। उसमें कितने ही चलते चले जाएं आप, आप पाएंगे कि फिर भी आगे लोग मौजूद हैं। पीछे लोग मौजूद हैं। कोई कभी पहला नहीं हो पाता। और धन्यता हम सिखाते हैं उसको, जो पहला हो जाएगा। तो धन्यता तो नहीं आती, आ जाता है विषाद, आ जाता है फ्रस्ट्रेशन, आ जाती है चिंता, आ जाता है हारा हुआ पन। तो यह तो पहला सूत्र है, जिसके इर्द-गिर्द आज तक की सारी शिक्षा गलत हो गई है।
दूसरा सूत्र, जिसके कारण शिक्षा जीवनदायी नहीं हो पाती, वह है कि हम आदर्श तो सिखाते हैं, लेकिन अब तक व्यक्ति को आत्मनिष्ठ नहीं बना पाए! क्या मतलब है मेरा आत्मनिष्ठता से? शायद आपको खयाल में भी न हो, शायद आपने कभी सोचा भी न हो?
अब तक मनुष्य इस स्थिति में नहीं पहुंच पाया कि वह किसी व्यक्ति को कह सके कि तुम जैसे हो, वैसे ही बन जाओ। हम हर बच्चे से कहते हैं, राम जैसे बन जाओ, कृष्ण जैसे बन जाओ, बुद्ध जैसे बन जाओ। और पुरानी तस्वीरें फीकी पड़ गई हों तो रामकृष्ण जैसे बन जाओ, विवेकानंद जैसे बन जाओ, गांधी जैसे बन जाओ। जैसे कि हर आदमी कोई और बनने को पैदा हुआ है!
कोई आदमी किसी और जैसा बनने को पैदा नहीं हुआ। लेकिन हम आज तक भी यह नहीं कह पाए कि तुम अपने जैसे बन जाओ। यह साहस शिक्षा अब तक नहीं जुटा पाई। इसके घातक परिणाम हुए हैं। जिनकी हमें कल्पना भी नहीं हो सकती, उतने घातक परिणाम हुए हैं। क्योंकि कुछ मनुष्य के जीवन के विज्ञान को समझे बिना यह बात होती रही है। कोई मनुष्य लाख कोशिश करे, तो भी किसी जैसा नहीं बन सकता है। आज तक एक जैसे दो आदमी पैदा नहीं हुए। राम को हुए कितने दिन हो गए, क्राइस्ट को हुए कितना समय बीत गया, बुद्ध को मरे हुए कितना समय हुआ? कितने लोगों ने कोशिश की है कि हम बन जाएं राम जैसे, बुद्ध जैसे, क्राइस्ट जैसे—कोई दूसरा आदमी बन सका है? रामलीला के राम को खयाल में मत ले लेना आप। रामलीला के राम बन सकते हैं आप, लेकिन राम नहीं। और रामलीला का राम एक कुरूपता है, एक अग्लीनेस है। क्योंकि रामलीला का राम झूठा आदमी है। वह अभिनय है, वह आत्मा नहीं है। तो अगर कोशिश करें आप, तो ज्यादा से ज्यादा सफलता इतनी मिल सकती है कि रामलीला के राम बन जाएं। लेकिन तब एक पाखंड में आप गिरेंगे। अपनी आत्मा को खो देंगे, आत्मच्युत हो जाएंगे। क्रमशः…….
ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-३



