क्या आपको पता है कि महत्वाकांक्षा से बड़ा जहर, पायज़न अब तक नहीं खोजा जा सका है? प्रथम आने की दौड़ मनुष्य को विक्षिप्त करती रही है, यह हमें खयाल भी नहीं है

ओशो– एक छोटी सी कहानी से मैं अपनी इस चर्चा को शुरू करना चाहूंगा।
एक सम्राट के द्वार पर बहुत भीड़ लगी हुई थी। और भीड़ सुबह से लगनी शुरू हुई और बढ़ती ही चली गई थी। दोपहर आ गई थी और करीब-करीब सारा नगर वहां इकट्ठा हो गया था। जो आदमी भी आकर खड़ा हो गया, उसने हटने का नाम नहीं लिया। उस सम्राट के द्वार पर कोई बड़ी अनहोनी घटना घट गई थी। सांझ होते-होते तो दूर-दूर के गांव से भी लोग आ गए थे। क्या हो गया था वहां!—और सभी मंत्रमुग्ध खड़े थे!
सुबह ही सुबह एक भिखारी ने आकर भिक्षा मांगी थी सम्राट से। और कहा था, कि मैं एक ही शर्त पर भिक्षा लेना स्वीकार करता हूं—मेरा जो भिक्षापात्र है, उसे पूरा भर दोगे न! अधूरा भिक्षापात्र लेकर मैं किसी द्वार से जाता नहीं हूं। सम्राट हंस पड़ा था। शायद इस भिखारी को पता नहीं कि वह किस शक्तिशाली सम्राट के सामने खड़ा है। इस पागल को यह शर्त रखने की जरूरत नहीं है कि मैं इसके भिक्षापात्र को भर दूंगा या नहीं भर दूंगा। उसने अपने वजीरों को कहा कि अन्न से नहीं, स्वर्ण-अशर्फियों से इसके भिक्षापात्र को भर दो। उस भिखारी ने दुबारा कहा, लेकिन मेरी शर्त सुन ली है आपने? मैं अधूरा भिक्षापात्र लेकर हटूंगा नहीं। मेरा भिक्षापात्र पूरा ही भर सकते हों तो भिक्षा दें, अन्यथा मैं कोई दूसरा द्वार खोज लूं। सम्राट के अहंकार को बड़ी चुनौती थी। उसने अपने वजीरों को कहा, जाओ, और हीरे-जवाहरातों से इसके भिक्षापात्र को भर दो। और जब तक हीरे-जवाहरात पात्र के बाहर न गिरने लगें, तब तक रुकना मत।
वे वजीर गए। उस सम्राट के पास संपदा की कोई कमी न थी। उसके पास अटूट खजाने थे। एक भिक्षापात्र…हीरे-जवाहरातों से कुछ कम हो जाने को नहीं था। उसने सारी पृथ्वी को लूटा था और अपने खजानों में भर लिया था। लेकिन भिक्षापात्र जैसे ही भरा गया, वैसे ही राजा को भूल पता चल गई थी, वह गलत दांव में पड़ गया था। यह लड़ाई दो सम्राटों के बीच होती तो वह जीत जाता। एक भिखारी से लड़ाई हो गई थी और बड़ी कठिनाई में पड़ गया। जैसे ही उसके वजीरों ने लाकर हीरे-जवाहरातों से उस भिक्षापात्र को भरा, वे हैरान रह गए! हीरे-जवाहरात गिरते ही पात्र में कहीं विलीन हो गए, पात्र खाली का खाली ही रहा। तब एक दौड़ शुरू हुई, वजीर दौड़-दौड़ कर लाने लगे खजानों से हीरे-जवाहरात, और उस भिक्षापात्र में वे सब विलीन होने लगे। इसीलिए भीड़ इकट्ठी हो गई थी और बढ़ती चली गई थी। कोई भी हट न रहा था कि क्या होगा! क्या आज सम्राट एक भिखारी के सामने हार जाएगा?
और सांझ होते-होते सम्राट को समझ में आ गया कि हारने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं है। सूरज के डूबने के साथ सम्राट उस भिखारी के पैरों पर गिर पड़ा और कहा, मुझे क्षमा कर दो, भूल हो गई। मैं भूल ही गया इस बात को कि भिखारियों के पात्र को कौन सम्राट कब भर सका है? भूल हो गई! क्षमा कर दो मुझे, मैं हार गया और पराजित तुम्हारे चरणों में पड़ा हूं। लेकिन जाने के पहले एक बात बताते जाना, यह पात्र किन मंत्रों से सिद्ध है? इस पात्र में पड़ी हुई संपत्ति खो कैसे गई? यह पात्र भरता क्यों नहीं है? यह छोटा सा दिखने वाला पात्र, सारी पृथ्वी की संपदा को पी जाएगा क्या? उस भिखारी ने कहा: न तो कोई मंत्रों से सिद्ध है, न कोई रहस्य है इस पात्र का। एक छोटा सा सूत्र है—इस पात्र को मैंने मनुष्य के हृदय से बनाया है। न मनुष्य का हृदय कभी भरता है, न यह पात्र कभी भर सकता है। यह पता नहीं, कहानी कहां तक सच है और सच होने से कोई वास्ता भी नहीं है।
मैं उस शिक्षा को वास्तविक शिक्षा कहता हूं, जो मनुष्य के हृदय के पात्र को भरने की कला में दीक्षित कर दे। बाकी सब शिक्षा अधूरी और भ्रांत और खतरनाक है। आज तक शिक्षा इस कसौटी पर पूरी उतर नहीं सकी है। बल्कि शिक्षित व्यक्ति का पात्र और बड़ा हो जाता है, अशिक्षित से। उसे भरना और कठिन हो जाता है, और मुश्किल हो जाता है। जितनी शिक्षा बढ़ती है दुनिया में, उतने भिखारी बढ़ते जाते हैं। जितनी शिक्षा बढ़ती है दुनिया में, उतनी महत्वाकांक्षा का, एंबीशन का पात्र बड़ा होता जाता है। वह सारी पृथ्वी की संपदा से भी भरा नहीं जा सकता है। तो शिक्षा मनुष्य को आनंद दे रही है या पीड़ा, तनाव? शांति दे रही है या अशांति? यह आज की शिक्षा का सवाल नहीं है, आज तक की शिक्षा का सवाल है।यह कोई पुरानी और नई शिक्षा का भेद नहीं है—शिक्षा मात्र पृथ्वी के किसी भी कोने पर और किसी भी युग में मनुष्य को महत्वाकांक्षा सिखाने का ही मार्ग रही है। अब तक शिक्षा ने नॉन-एंबीशस माइंड, महत्वाकांक्षा से शून्य मन पैदा नहीं किया है। महत्वाकांक्षा का ज्वर, फीवर कितना हम भर दें, उतना ही हम व्यक्ति को शिक्षित मान लेते हैं। पहली कक्षा से इस बीमारी की शिक्षा शुरू होती है और अंतिम विश्वविद्यालय की कक्षाओं तक चलती है। पहली ही कक्षा से एक ही पाठ में दीक्षा दी जाती है—महत्वाकांक्षा के पाठ में।
और क्या आपको पता है, मनुष्य के मन को जो बीमारियां घेर सकती हैं, महत्वाकांक्षा उनमें सबसे बड़ी है? और क्या आपको पता है, जो आदमी महत्वाकांक्षा के घेरे में घिर जाता है और जिसके प्राणों में महत्वाकांक्षा का ज्वर समाविष्ट हो जाता है, उस जगत में पूरे जीवन दौड़ कर भी कभी शांति और आनंद को उपलब्ध नहीं होता है? क्या आपको पता है कि महत्वाकांक्षा से बड़ा जहर, पायज़न अब तक नहीं खोजा जा सका है?
लेकिन महत्वाकांक्षा के सिवाय हम और क्या सिखाते हैं? और जो भी हम सिखाते हैं, वह सब महत्वाकांक्षा के केंद्र पर ही खड़ा होता है। बुनियाद में महत्वाकांक्षा होती है। पहले ही वर्ष से बच्चों को हम क्या सिखाते हैं? हम सिखाते हैं दौड़, हम सिखाते हैं आगे निकलने की होड़, हम सिखाते हैं प्रतिस्पर्धा, काम्पिटीशन। हम सिखाते हैं, तुम पीछे मत रुकना, आगे निकल जाना और सबसे प्रथम खड़े हो जाना। ये उपदेश बड़े मीठे मालूम पड़ते हैं। ये उपदेश बड़े मधुर मालूम पड़ते हैं। बाल-बुद्धि के ऊपर इनका प्रभाव भी गहरा होता है। लेकिन, प्रथम आने की दौड़ मनुष्य को विक्षिप्त करती रही है, यह हमें खयाल भी नहीं है।जीसस क्राइस्ट ने एक अदभुत बात कही है। बहुत सोचने जैसी बात कही है। शायद बहुत कम लोगों के खयाल में यह बात कभी आई होगी। और जीसस के अनुयायियों के खयाल में भी यह बात नहीं आई। क्योंकि जो भी महत्वपूर्ण है, अनुयायी उसे छोड़ देने में, आंख से अलग कर देने में बड़े होशियार होते हैं। जीसस क्राइस्ट ने कहा है, धन्य हैं वे लोग, जो अंतिम खड़े होने में समर्थ हैं। यह सूत्र बड़ा अदभुत है। हम तो उस आदमी को धन्य कहते हैं, जो प्रथम खड़े होने में सफल हो जाता है। हम तो उस आदमी को धन्य कहते हैं, जो सबके आगे पहुंचने में उत्तीर्ण हो जाता है। लेकिन जीसस क्राइस्ट कहते हैं, धन्य हैं वे लोग जो अंतिम खड़े होने में समर्थ हैं। क्योंकि प्रभू का राज्य उन्हीं का होगा। क्या मतलब है अंतिम खड़े होने की सामर्थ्य का? कौन खड़ा होता है अंतिम? और प्रथम खड़े होने की दौड़ का क्या अर्थ होता है? प्रथम खड़े होने की दौड़ ही महत्वाकांक्षा है। छोटी कुर्सियों से बड़ी कुर्सियों पर, बड़ी कुर्सियों से और बड़ी कुर्सियों पर। बड़ौदा से अहमदाबाद, अहमदाबाद से दिल्ली। सारे जगत को एक ही ज्वर में, एक ही बुखार में प्रवेश दिलवाते हैं हम—दौड़ो और आगे निकल जाओ।राधाकृष्णन शिक्षक से राष्ट्रपति हो गए थे तो सारे हिंदुस्तान के शिक्षकों ने कहा, यह बहुत महान घटना घट गई। शिक्षक-दिवस मनाना शुरू किया। शिक्षकों का बड़ा सम्मान हो गया है। भूल से मुझे भी दिल्ली में एक शिक्षक सम्मेलन में बुला लिया किन्हीं लोगों ने। मैंने उनसे कहा, जिस दिन कोई राष्ट्रपति शिक्षक हो जाए, उस दिन शिक्षक-दिवस मनाना। एक शिक्षक के राष्ट्रपति हो जाने से शिक्षक-दिवस मनाने का कोई भी कारण नहीं है। यह शिक्षक का सम्मान नहीं है, राजनीतिज्ञ का सम्मान है। यह शिक्षक का सम्मान नहीं है, यह पदों की ही महिमा है। तो किसी दिन कोई राष्ट्रपति छोड़ दे अपना पद और कहे, बड़ौदा के न्यू एरा हाई स्कूल में चलो हम शिक्षक हुए जाते हैं। तो उस दिन मना लेना शिक्षक-दिवस। लेकिन उसके पहले रोने के दिन हैं, ऐसे दिन उत्साह एवं उत्सव मनाने के नहीं। क्यों शिक्षक सम्मानित हो गया किसी के राष्ट्रपति हो जाने से। राष्ट्रपति होना कोई मूल्य है?

लेकिन हम प्रथम खड़े होने का अगर मूल्य मानते हैं तो फिर राष्ट्रपति होने में मूल्य है, क्योंकि वह सारे मुल्क में प्रथम खड़ा हो गया है वह आदमी। हम पहले दिन से ही यह दीक्षा दे रहे हैं कि प्रथम खड़े हो जाओ। अगर पहली कक्षा में तीस बच्चे हैं तो जो प्रथम खड़ा हो जाता है, वह धन्यभागी हो जाता है। जो पीछे छूट जाते हैं वे दुखी, विपन्न हो जाते हैं, हीन हो जाते हैं। क्या आपको पता है दुनिया में इतनी इनफिरिआरिटी कांप्लेक्स, इतनी हीनता किसने पैदा की है? आपके प्रथम खड़े होने की शिक्षा ने। जो कि तीस बच्चों में एक बच्चा प्रथम आ सकेगा, उनतीस बच्चे पीछे छूट जाएंगे। एक बच्चे को प्रथम लाने के लिए उनतीस बच्चों की आत्माओं का घात किया जा रहा है। एक बच्चे को सम्मान देने के लिए उनतीस बच्चे विपन्न किए जा रहे हैं, निराश किए जा रहे हैं, उदास किए जा रहे हैं। एक बच्चे को गौरव देने के लिए उनतीस बच्चों की कुर्बानी हो रही है, यह आपको दिखाई पड़ता है, नहीं दिखाई पड़ता है?
ये जो सफल लोग हैं थोड़े से, इनके पीछे कितने असफल लोगों की पंक्तियां खड़ी हो जाती हैं, इसका कोई बोध है? और ये सफल दस-पांच लोग दुनिया नहीं बनाते हैं, दुनिया बनाते हैं वे सब जो पीछे रह गए और असफल हो गए हैं। उन उदास लोगों से यह दुनिया बनेगी तो यह स्वर्ग नहीं बन सकती है, यह नर्क ही बनना निश्चित है। उन हारे हुए लोगों से यह दुनिया बनेगी तो यह दुनिया अच्छी नहीं हो सकती है।
और जो शिक्षा और जो समाज और जो संस्कृति बहुत बड़े वर्ग को हारा हुआ और पराजित सिद्ध कर देती है, वह संस्कृति स्वागत के योग्य नहीं है, वह शिक्षा भी आदर के योग्य नहीं है। लेकिन हम उस एक को देखते हैं जो सफल हो गया, उनतीस को देखता कौन है जो असफल हो गए हैं। वे अंधेरे में खड़े हो जाएं, वे अपने मुंह छुपा लें। उन्हें देखने की जरूरत क्या? उन पर रोशनी डालने का कारण कहां है? भूल है उनकी, हार गए हैं जो।
लेकिन मैं आपसे कहता हूं, वे उनतीस कितनी ही कोशिश करें, उन तीस में एक ही प्रथम हो सकता है। उनतीस तो कभी भी प्रथम नहीं हो सकते हैं। उन तीस में से एक ही जीत सकता है, उनतीस तो हारेंगे ही। चाहे वह एक कोई भी हो, इससे फर्क नहीं पड़ता है। वे उनतीस जो हार गए हैं, आपको पता है, उनके मन को कितने बुनियादी घाव आपने पहुंचा दिए? उनके प्राणों की ऊर्जा को आपने शुरू से ही थका हुआ साबित कर दिया। वे शुरू से ही जिंदगी के प्रति आशा से भरे हुए नहीं हैं। निराशा, अपमान से भरे हुए, हताशा से भरे हुए प्रवेश करेंगे। फिर अगर ये हारे हुए लोग क्रोध से भर जाएं और जिंदगी को तोड़ने लगें, और जगह-जगह तोड़-फोड़ करने लगें, और जगह-जगह इनका क्रोध प्रकट होने लगे तो कौन जिम्मेवार है? कौन इसकी जिम्मेवारी लेगा? शिक्षा और शिक्षा की व्यवस्था। और कौन इसके लिए जिम्मेवार होगा?

क्रमशः………..

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-३