सुबह ही सुबह एक भिखारी ने आकर भिक्षा मांगी थी सम्राट से। और कहा था, कि मैं एक ही शर्त पर भिक्षा लेना स्वीकार करता हूं—मेरा जो भिक्षापात्र है, उसे पूरा भर दोगे न! अधूरा भिक्षापात्र लेकर मैं किसी द्वार से जाता नहीं हूं। सम्राट हंस पड़ा था। शायद इस भिखारी को पता नहीं कि वह किस शक्तिशाली सम्राट के सामने खड़ा है। इस पागल को यह शर्त रखने की जरूरत नहीं है कि मैं इसके भिक्षापात्र को भर दूंगा या नहीं भर दूंगा। उसने अपने वजीरों को कहा कि अन्न से नहीं, स्वर्ण-अशर्फियों से इसके भिक्षापात्र को भर दो। उस भिखारी ने दुबारा कहा, लेकिन मेरी शर्त सुन ली है आपने? मैं अधूरा भिक्षापात्र लेकर हटूंगा नहीं। मेरा भिक्षापात्र पूरा ही भर सकते हों तो भिक्षा दें, अन्यथा मैं कोई दूसरा द्वार खोज लूं। सम्राट के अहंकार को बड़ी चुनौती थी। उसने अपने वजीरों को कहा, जाओ, और हीरे-जवाहरातों से इसके भिक्षापात्र को भर दो। और जब तक हीरे-जवाहरात पात्र के बाहर न गिरने लगें, तब तक रुकना मत।
वे वजीर गए। उस सम्राट के पास संपदा की कोई कमी न थी। उसके पास अटूट खजाने थे। एक भिक्षापात्र…हीरे-जवाहरातों से कुछ कम हो जाने को नहीं था। उसने सारी पृथ्वी को लूटा था और अपने खजानों में भर लिया था। लेकिन भिक्षापात्र जैसे ही भरा गया, वैसे ही राजा को भूल पता चल गई थी, वह गलत दांव में पड़ गया था। यह लड़ाई दो सम्राटों के बीच होती तो वह जीत जाता। एक भिखारी से लड़ाई हो गई थी और बड़ी कठिनाई में पड़ गया। जैसे ही उसके वजीरों ने लाकर हीरे-जवाहरातों से उस भिक्षापात्र को भरा, वे हैरान रह गए! हीरे-जवाहरात गिरते ही पात्र में कहीं विलीन हो गए, पात्र खाली का खाली ही रहा। तब एक दौड़ शुरू हुई, वजीर दौड़-दौड़ कर लाने लगे खजानों से हीरे-जवाहरात, और उस भिक्षापात्र में वे सब विलीन होने लगे। इसीलिए भीड़ इकट्ठी हो गई थी और बढ़ती चली गई थी। कोई भी हट न रहा था कि क्या होगा! क्या आज सम्राट एक भिखारी के सामने हार जाएगा?
यह कोई पुरानी और नई शिक्षा का भेद नहीं है—शिक्षा मात्र पृथ्वी के किसी भी कोने पर और किसी भी युग में मनुष्य को महत्वाकांक्षा सिखाने का ही मार्ग रही है। अब तक शिक्षा ने नॉन-एंबीशस माइंड, महत्वाकांक्षा से शून्य मन पैदा नहीं किया है। महत्वाकांक्षा का ज्वर, फीवर कितना हम भर दें, उतना ही हम व्यक्ति को शिक्षित मान लेते हैं। पहली कक्षा से इस बीमारी की शिक्षा शुरू होती है और अंतिम विश्वविद्यालय की कक्षाओं तक चलती है। पहली ही कक्षा से एक ही पाठ में दीक्षा दी जाती है—महत्वाकांक्षा के पाठ में।
जीसस क्राइस्ट ने एक अदभुत बात कही है। बहुत सोचने जैसी बात कही है। शायद बहुत कम लोगों के खयाल में यह बात कभी आई होगी। और जीसस के अनुयायियों के खयाल में भी यह बात नहीं आई। क्योंकि जो भी महत्वपूर्ण है, अनुयायी उसे छोड़ देने में, आंख से अलग कर देने में बड़े होशियार होते हैं। जीसस क्राइस्ट ने कहा है, धन्य हैं वे लोग, जो अंतिम खड़े होने में समर्थ हैं। यह सूत्र बड़ा अदभुत है। हम तो उस आदमी को धन्य कहते हैं, जो प्रथम खड़े होने में सफल हो जाता है। हम तो उस आदमी को धन्य कहते हैं, जो सबके आगे पहुंचने में उत्तीर्ण हो जाता है। लेकिन जीसस क्राइस्ट कहते हैं, धन्य हैं वे लोग जो अंतिम खड़े होने में समर्थ हैं। क्योंकि प्रभू का राज्य उन्हीं का होगा। क्या मतलब है अंतिम खड़े होने की सामर्थ्य का? कौन खड़ा होता है अंतिम? और प्रथम खड़े होने की दौड़ का क्या अर्थ होता है? प्रथम खड़े होने की दौड़ ही महत्वाकांक्षा है। छोटी कुर्सियों से बड़ी कुर्सियों पर, बड़ी कुर्सियों से और बड़ी कुर्सियों पर। बड़ौदा से अहमदाबाद, अहमदाबाद से दिल्ली। सारे जगत को एक ही ज्वर में, एक ही बुखार में प्रवेश दिलवाते हैं हम—दौड़ो और आगे निकल जाओ।
राधाकृष्णन शिक्षक से राष्ट्रपति हो गए थे तो सारे हिंदुस्तान के शिक्षकों ने कहा, यह बहुत महान घटना घट गई। शिक्षक-दिवस मनाना शुरू किया। शिक्षकों का बड़ा सम्मान हो गया है। भूल से मुझे भी दिल्ली में एक शिक्षक सम्मेलन में बुला लिया किन्हीं लोगों ने। मैंने उनसे कहा, जिस दिन कोई राष्ट्रपति शिक्षक हो जाए, उस दिन शिक्षक-दिवस मनाना। एक शिक्षक के राष्ट्रपति हो जाने से शिक्षक-दिवस मनाने का कोई भी कारण नहीं है। यह शिक्षक का सम्मान नहीं है, राजनीतिज्ञ का सम्मान है। यह शिक्षक का सम्मान नहीं है, यह पदों की ही महिमा है। तो किसी दिन कोई राष्ट्रपति छोड़ दे अपना पद और कहे, बड़ौदा के न्यू एरा हाई स्कूल में चलो हम शिक्षक हुए जाते हैं। तो उस दिन मना लेना शिक्षक-दिवस। लेकिन उसके पहले रोने के दिन हैं, ऐसे दिन उत्साह एवं उत्सव मनाने के नहीं। क्यों शिक्षक सम्मानित हो गया किसी के राष्ट्रपति हो जाने से। राष्ट्रपति होना कोई मूल्य है?