जितने बम हमारे पास हैं, इक्कीस अरब आदमियों को मारने के लिए काफी हैं

ओशो– गुलाब गुलाब है, चमेली चमेली है। एक दरख्त ऊंचा हो जाता है, एक दरख्त छोटा है। एक घास का पौधा है जिसमें घास का छोटा सा फूल खिलता है, लेकिन उसकी भी अपनी गरिमा है, अपना गौरव है, अपना आनंद है। रहस्यपूर्ण और महत्वपूर्ण यह है कि घास का पूरा फूल खिल जाए, अधखिला न रह जाए। यह सवाल नहीं है कि गुलाब के फूल से उसकी तुलना की जाए। गुलाब के फूल का अपना आनंद है खिलने में, घास के फूल का अपना आनंद है खिलने में। एक छोटा सा पक्षी अपना गीत गाता है, एक बड़ा पक्षी अपना गीत गाता है। सवाल यह नहीं है कि कौन ने बेहतर गीत गाया। सवाल यह है कि अपने प्राणों को भर गीत कोई गा सका या नहीं गा सका। किसी से किसी दूसरे की कोई तुलना नहीं है।प्रत्येक व्यक्ति अनूठी कृति है परमात्मा की, और उसकी हमें स्वीकृति होनी चाहिए। और यह ध्यान होना चाहिए कि हमारी पूरी शिक्षा, हमारी पूरी संस्कृति और सभ्यता उसके भीतर जो भी छिपा है, उसे निकाल कर बाहर ले आए, उसके भीतर कुछ छिपा न रह जाए। और यह ज्वर के द्वारा नहीं, बीमारी के द्वारा नहीं, प्रतिस्पर्धा के द्वारा नहीं, बल्कि सहज प्रेम और आनंद के द्वारा उसके भीतर के सारे फूल खिल जाएं।जब व्यक्ति की पूरी क्षमताएं विकसित होकर खिलती हैं तो वह आनंद से भर जाता है। तब उसमें फूल आ जाते हैं, तब उसमें सुगंध निकलती है, तब उसमें शांति उत्पन्न होती है। और ऐसा व्यक्ति ही फिर परमात्मा को, सत्य को खोज सकता है, जान सकता है। ऐसा मन ही फिर सत्य की कोई अनुभूति को उपलब्ध हो सकता है। इस जीवन में जो शांत है वही, और प्रगाढ़तर गहरे जीवन में प्रविष्ट हो सकता है। इस जीवन में जो अशांत है और जो प्रतिस्पर्धा में है, वह अशांत होगा ही। जो इस जीवन में शांत है, जिसका मन अपने को स्वीकार करता है, जिसका मन अपने फूलों को खिला कर आनंद और सुगंध से भर रहा है, धीरे-धीरे उसे परमात्मा की खबर खुद ही आने लगेगी, उसके आस-पास सब तरफ परमात्मा का दिग्दर्शन होने लगेगा। दुखी मनुष्य कभी भी परमात्मा को नहीं जान सकता। जब भीतर सारे…सारे आनंद के द्वार खिलते हैं, तभी व्यक्ति को चारों तरफ परमात्मा की अनुभूति होनी शुरू होती है।शिक्षा का अंतिम आधार तो यही होना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी आत्मा की पूर्णता तक, अपनी आत्मा की अनुभूति तक पहुंच जाए। लेकिन अभी तो हालत यह है कि वह संसार में शांति और सुख भी अनुभव नहीं कर पाता। परमात्मा तो बहुत दूर की मंजिल और यात्रा हो जाती है। फिर अशांति के कारण, परेशान होने के कारण मंदिरों में जाता है, भगवान को पैसे चढ़ाता है, पुजारियों के पैर पड़ता है। यह सब व्यर्थ है, यह सब कोई मतलब नहीं है। अशांति से बचने के लिए भगवान का सहारा लेता है। इलेक्शन में हार जाता है तो फिर भगवान का सहारा लेता है। सफलता नहीं मिलती है तो फिर ताबीज बनवाता है। फिर रेसकोर्स की फिकर करता है, साधु-संन्यासियों के पैर पड़ता है।

मुझसे कोई कल कह रहा था कि आप भी घोड़ों के नंबर बताते हैं कि नहीं? हमारे मुल्क में सभी साधु-संन्यासी बताते हैं। तो मैंने कहाः मैं बड़ा ही कमजोर आदमी हूं और मैं न साधु हूं और न संन्यासी हूं। कैसे घोड़ों के नंबर बताते हैं? साधु-संन्यासी हैं, जो बड़े-बड़े असली महात्मा हैं, जो घोड़ों के नंबर बताते हैं। और अगर परमात्मा से आपकी मुलाकात हो जाए तो वह भी कोई पक्का नंबर घोड़ों का आपको बता दें! मेरी मजबूरी है, मैं तो न ही साधु-संन्यासी हूं, कोई महात्मा नहीं हूं इसलिए कैसे घोड़ों का नंबर बताऊं? लेकिन यह सब दौड़ चलती है। फिर घोड़ों के नंबर हैं और इलेक्शन में जीतने की तरकीबें हैं। वे सब साधु और महात्मा दिल्ली के आस-पास घूमते हैं क्योंकि वहां सब हारे हुए, जीते हुए सब उनके चरण छूते हैं, उपाय पूछते हैं, आगे फिर…?अशांत, दुखी, प्रतिस्पर्धा में हारे-जीते, भयग्रस्त लोग, ये सारे के सारे लोग फिर धर्म की शरण में जाते हैं। वह धर्म झूठा हो जाता है। इन सबके वहां पहुंचने का कारण ही अधार्मिक है। धर्म के निकट वही पहुंच सकता है जिसने मन को सब भांति शांत किया हो, जिसका मन सब भांति द्वंद्व-शून्य हो, जिसके मन में कोई संघर्ष न हो, जिसके मन में सबके प्रति समादर और प्रेम हो, जिसके मन में सबके प्रति करुणा हो, ईष्र्या नहीं। ऐसा व्यक्ति धीरे-धीरे ही अपने आप धर्म के करीब पहुंचने लगता है, उसे किसी मंदिर में जाने की जरूरत नहीं होती। एक दिन परमात्मा खुद उसके मकान पर आ जाता है। एक दिन परमात्मा उसके कंधे पर हाथ रखता है। उसे खोजने की परमात्मा की कोई भी जरूरत नहीं होती। वास्तविक शिक्षा धार्मिक शिक्षा है। लेकिन धार्मिक शिक्षा का यह मतलब नहीं है कि आपको गीता रटवाई जाए और कुरान रटवाई जाए। इन सबसे तो खूब अधर्म दुनिया में फैला। अब इन सब को रटवाने से कुछ भी होने को नहीं है।

अब धार्मिक शिक्षा का मतलब है ऐसा मन, ऐसा माइंड पैदा करना जो नाॅन-काम्पिटिटिव हो, नाॅन-जेलेस हो, नाॅन-वायलेंट हो, हिंसक न हो, ईष्र्यालु न हो, प्रतियोगी न हो, प्रेमपूर्ण हो, करुणा से भरा हो। ऐसे मन की व्यवस्था देना धार्मिक शिक्षा का अर्थ है। ऐसी धार्मिक शिक्षा फिर आपको हिंदू नहीं बनाएगी, मुसलमान नहीं बनाएगी, जैन नहीं बनाएगी। ये सब तो पागलपन हैं, ये सब तो बीमारियां हैं। कोई स्वस्थ व्यक्ति न हिंदू होता है, न जैन होता है, न मुसलमान होता है–धार्मिक होता है। अगर आप ठीक-ठीक सच में युवा होना चाहते हैं, जिस भांति आपका मन शांत होगा, युवा होगा। ज्ञान को उपलब्ध करना चाहते हैं, इस भांति आपके जीवन में शांति आएगी, ज्ञान आएगा।

ये थोड़ी सी बातें मैंने कहीं, और अगर इनकी भूमिका पर थोड़ा विचार करेंगे, थोड़ा स्वयं व्यक्तित्व को समझेंगे और खुद ही अपने भीतर कि क्या सच में मैं काम्पिटीशन में पडूं, ईष्र्या में पडूं, या कि शांति के, आनंद के किसी मार्ग को खोजूं, अपने भीतर कोई संभावनाएं जगाऊं, जहां से आनंद की सुगंध फैले? तो आप ठीक-ठीक अर्थों में विद्यार्थी हो सकेंगे। विद्यापीठ तो गलत है, शिक्षा की व्यवस्था गलत है। अब किस पर हम आशा रखें? शिक्षक गलत हैं, शिक्षा की व्यवस्था गलत है–हम किसकी तरफ आंखें उठाएं? कौन यह काम करेगा?

युवक कर सकते हैं। उनमें थोड़ी विद्रोह की अग्नि होती है, थोड़ी चिंगारी होती है–हिंदुस्तान में बहुत बुझी-बुझी है। हजारों साल से यहां युवक पैदा नहीं हुए। यहां विद्रोह की भावना बहुत कम है, यहां रिबेलियन की स्प्रिट नहीं है, राख ही राख है, लेकिन फिर भी युवकों से थोड़ी आशा होती है। कहीं राख में थोड़ी बहुत चिंगारी दबी होगी। उसे थोड़ा झाड़ें, पहचानें, अपने युवक विद्रोह करते हैं, इस सारी व्यवस्था से, इस सारी शिक्षा के सर-अंजाम से, इस सारे ढांचे को तोड़ने के लिए तैयार होते हैं, तो आशा की जा सकती है कि आज नहीं कल हम युद्ध वाली दुनिया को समाप्त कर देंगे, देशों वाली दुनिया को समाप्त कर देंगे। यह सीमाएं, हिंदुस्तान और पाकिस्तान, ये सब मूढ़ताएं हैं, समाप्त कर देंगे। यह हिंदू और जैन की दीवालें गिरा देंगे। एक मनुष्य की संस्कृति का जन्म हो सकता है, लेकिन युवक के ऊपर सवाल है। उसे विद्रोही होना पड़ेगा। उसे बहुत क्रांति का, बहुत बड़ी क्रांति का भार उसके ऊपर है। शायद मनुष्य के इतिहास में इतने महत्वपूर्ण क्षण कभी भी नहीं आए थे जब युवकों के ऊपर इतनी बड़ी जिम्मेवारी रही हो।

सोचें, क्या उस जिम्मेवारी को हम उठा सकते हैं? अगर हम उठा सकते हैं तो मनुष्य को बचाया जा सकता है। अगर नहीं उठा सकते तो बात सड़ गई है, बात खत्म हो गई है। खबर भर देने की है कि आदमी मर गया। कोई ज्यादा देर नहीं है। डुंडी भर पीटने की है कि आदमी मर गया। राम नाम सत होने में ज्यादा देर नहीं है आदमी के। सारा इंतजाम है आदमी की हत्या का। कभी भी हम खत्म हो सकते हैं, सारी तैयारी है। कोई पचास हजार एटम बम सारी दुनिया में, हाइड्रोजन बम तैयार हैं। इस जमीन को मिटाने के लिए बहुत ज्यादा हैं। इस तरह की सात जमीनें हों, उनको मिटाने के लिए काफी है। तीन अरब आदमी बहुत कम हैं, जितने बम हमारे पास हैं। इक्कीस अरब आदमियों को मारने के लिए काफी हैं।क्या होगा? एक-एक आदमी को सात-सात बार मारें तो भी हमारे पास इंतजाम ज्यादा है। यह इंतजाम तैयार है। और एक भी राजनीतिज्ञ का दिमाग बिगड़ जाए और दिमाग उनके पचास प्रतिशत पागल हैं। किसी भी क्षण सारी मनुष्यता को वे अपने साथ लेकर डूब सकते हैं। कौन उसको बचाएगा, किसके ऊपर जिम्मेवारी है?

मैं नहीं जानता, आपने यह अपेक्षा की होगी–आपके मंडल ने, कि मैं ये बातें आपसे कहूंगा। शायद आप सोचते होंगे, आपको परीक्षा में पास होने की तरकीबें बताऊं, आगे कैसे आप जाएं, कैसे बड़े-बड़े पदों पर पहुंचें, कैसे सफल हो जाएं, सक्सेस कैसे मिले, इसकी कोई तरकीबें बताऊंगा। वे मैं नहीं बताऊंगा। वे काफी बताई जा चुकी हैं। उनकी वजह से हम भोग रहे हैं, बहुत कष्ट भोग रहे हैं।

भगवान करे, आप सफल न हों। सच्चे आदमी बनें। सक्सेस कोई मूल्य नहीं है। भगवान करे, आप किसी पद पर न पहुंचें, आप अपने प्राणों में पहुंचें। वहां कुछ है। भगवान करे, आपके जीवन में किसी दूसरे से कोई स्पर्धा न हो। अपने व्यक्तित्व से प्रेम पैदा हो, उसे जगाएं। भगवान करे, एक नई संस्कृति के बनाने में आप भी एक ईंट बन सकें, इसकी कामना करता हूं। क्रमशः……….

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-३