छोटा सा बच्चा, के.जी. में पढ़ने जाता है, उसे भी, एक छोटे से बच्चे को भी हम एंग्जाइटी पैदा कर देते हैं–प्रथम होने की एंग्जाइटी! इससे बड़ी कोई एंग्जाइटी नहीं है, इससे बड़ी कोई चिंता नहीं है दुनिया में

ओशो- यह हमारी पूरी की पूरी शिक्षा किस केंद्र पर घूमती है, वह केंद्र ही गलत है। उस केंद्र के कारण सारी तकलीफ पैदा होती है। वह केंद्र है, एंबीशन। हमारी यह सारी शिक्षा एम्बिशन के केंद्र पर घूमती है, महत्वाकांक्षा के केंद्र पर घूमती है।

आपको क्या सिखाया जाता है? हमको क्या सिखाया जाता है? हमें सिखाई जाती है महत्वाकांक्षा। हमें सिखाई जाती है एक दौड़, कि आगे हो जाओ; दूसरों से आगे हो जाओ। छोटा सा बच्चा, के.जी. में पढ़ने जाता है, उसे भी, एक छोटे से बच्चे को भी हम एंग्जाइटी पैदा कर देते हैं–प्रथम होने की एंग्जाइटी! इससे बड़ी कोई एंग्जाइटी नहीं है, इससे बड़ी कोई चिंता नहीं है दुनिया में। दुनिया में एक ही चिंता है कि मैं दूसरे से आगे कैसे हो जाऊं, दूसरों को कैसे पीछे छोड़ दूं!छोटा सा बच्चा है, छोटे से स्कूल में पढ़ने जाता है। उसके मन में भी हम चिंता का भूत सवार कर देते हैं, उसे भी आगे होना है। वह भी पुरस्कृत होगा, अगर आगे आएगा। अपमानित होगा अगर द्वितीय आएगा। अपमानित होगा, अगर असफल होगा। सफल होगा तो सम्मानित होगा। शिक्षक आदर करेंगे, घर में आदर मिलेगा। हम उसके भीतर प्रतियोगिता पैदा कर रहे हैं। और प्रतियोगिता एक तरह का ज्वर है, एक तरह का बुखार है। जरूर ज्वर में ताकत आ जाती है। अगर आप बुखार में हैं तो आप ज्यादा तेजी से दौड़ सकते हैं। अगर आप बुखार में हैं तो आप ज्यादा तेजी से गालियां बक सकते हैं। अगर आप बुखार में हैं तो आप ऐसी बातें कर सकते हैं जो कि आप सामान्यतया नहीं कर सकते। बुखार में, एक ज्वर में त्वरा आ जाती है, एक शक्ति आ जाती है।

इस सारी शिक्षा की दौड़ को हमने बुखार पर आधारित किया है। हम कहते हैं कि दूसरे से आगे निकलो। अहंकार को चोट लगती है बच्चों के। वे दूसरों से आगे होने के लिए उत्सुक हो जाते हैं। जब वे दूसरों से आगे होना चाहते हैं तो श्रम करते हैं, मेहनत करते हैं, अपनी सारी शक्ति लगा देते हैं, अपने पूरे प्राण जुटा देते हैं।लेकिन किसलिए? इसलिए कि उन्हें दूसरों से आगे होना है। एक प्रतिस्पर्धा है, एक काम्पिटीशन है। फिर यह काम्पिटीशन का ज्वर उनको पकड़ जाता है। जब वे शिक्षा के जगत से बाहर आते हैं, पढ़-लिख कर बाहर निकलते हैं तब भी ये ज्वर उन्हें पकड़े रहता है। उन्हें दूसरे से बड़ा मकान बनाना है, उन्हें दूसरे से बड़ी दुकान खोलनी है, उन्हें दूसरे से बड़े पद पर पहुंचना है, छोटे क्लर्क को बड़ा क्लर्क होना है, अध्यापक को प्रधान अध्यापक होना है, डिप्टी मिनिस्टर को मिनिस्टर होना है, किसी को राष्ट्रपति होना है, किसी को कुछ होना है। एक पागलपन की दौड़ पकड़ती है। फिर जिंदगी भर प्रत्येक को कुछ न कुछ होने का पागलपन सवार रहता है। और इस पागलपन की दौड़ में उनके जीवन की सारी शांति, सारी शक्ति, सारा सामथ्र्य नष्ट हो जाता है।

आखिर में वे क्या पाते हैं? आखिर में वे कहीं भी नहीं पहुंचते। क्योंकि वे कहीं भी पहुंच जाएं, जहां भी पहुंच जाएंगे, हमेशा उनसे आगे उन्हें दिखाई पड़ेंगे। और जब तक उनके कोई भी आगे है तब तक उन्हें शांति नहीं मिल सकती। और इस दुनिया में अब तक कोई ऐसा आदमी नहीं हुआ जिसे ऐसा अनुभव हुआ हो कि मैं सबके आगे आ गया हूं, क्योंकि कुछ लोग हमेशा उससे आगे हैं। यह दुनिया बड़ी है और हम सब एक गोल घेरे में खड़े हैं। अगर हम एक गोल वृत्त में खड़े हो जाएं, तो कौन आगे है, कौन पीछे है? हरेक के हर कोई आगे है। और तब दौड़ चलती चली जाती है, दौड़ चलती चली जाती है। कभी कोई आदमी सबसे आगे आया है अब तक? आज तक कोई न कोई आगे आ जाता। हम जरूर चक्कर में खड़े हैं। एक सर्किल में घूम रहे हैं। उसमें कोई न कोई हमारे आगे है हमेशा। दुनिया में अब तक कोई आदमी आगे नहीं आ सका। लेकिन फिर भी हम बच्चों को सिखा रहे हैं कि तुम आगे आ जाओ। हम उनको पागलपन सिखा रहे हैं। हम एक ऐसी गलत बात सिखा रहे हैं कि उस दौड़ में वे पड़ जाएंगे। उस दौड़ में वे अपना जीवन नष्ट कर देंगे।
सारी शिक्षा ईष्र्या पर खड़ी हुई है। हम लोगों से कहते हैं, ईष्र्या मत करो, हिंसा मत करो, जलन मत करो, लेकिन हमारी पूरी शिक्षा ईष्र्या पर खड़ी है। एक बच्चे को दिखा कर हम दूसरे बच्चे से कहते हैं देखो, यह कितना बुद्धिमान है और तुम कितने बुद्धिहीन हो। इस जैसे बनो। हम ईष्र्या जगा रहे हैं, हम उसके भीतर जलन पैदा कर रहे हैं। उसे भी उसके जैसा होना है। उसे भी इसके आगे निकलना है।हम उसके भीतर क्या पैदा कर रहे हैं? हम जहर डाल रहे हैं उसके भीतर ईष्र्या का। जब भी हम किसी बच्चे से कहते हैं, दूसरे बच्चों से आगे हो जाओ तो हम जहर डाल रहे हैं; तो हम उस बच्चे को प्रेम नहीं करते। यह जहर जीवन भर उसकी नसों में घूमता रहेगा, उसके मन में घूमता रहेगा। यह हमेशा आगे होना चाहेगा। हमेशा एक आगे होने की दौड़ उसको पकड़े रहेगी। लेकिन बड़ा मजा यह है कि कभी कोई आगे हुआ है? और क्या किसी दूसरे से आगे होने में कोई आनंद मिल सकता है? आनंद से किसी के आगे खड़े होने का कौन सा वास्ता है? शांति का किसी के आगे खड़े होने से कौन सा संबंध है? नहीं, यह बुनियादी रूप से गलत बात है।

यह एंबीशन और उसके केंद्र पर घूमती हुई शिक्षा गलत है और अगर हमें एक नई दुनिया बनानी हो तो हमें इस केंद्र को बदलना होगा और कोई नया केंद्र पैदा करना होगा।

कौन सा नया केंद्र इसकी जगह हो सकता है? मैं आपसे कहना चाहता हूं, प्रतिस्पर्धा शिक्षा का केंद्र नहीं हो सकता; न होना चाहिए। शिक्षा का केंद्र प्रेम होना चाहिए।

प्रेम से मेरा क्या अर्थ है? हम यहां इतने लोग बैठे हैं, अगर हम सारे लोग संगीत सीखना चाहें, तो एक तो सीखने का रास्ता यह है कि हम दूसरों से आगे निकलने की कोशिश में, त्वरा में पड़ जाएं, तो हम संगीत सीख सकेंगे उस ज्वर में? दूसरे हमें पीछे न छोड़ दें, अपमानित न कर दें, हम कहीं बेइज्जत न हो जाएं, हमारा कहीं असम्मान न हो जाए, हम कहीं असफल सिद्ध न हो जाएं, कहीं हम दुनिया में नो-बडी सिद्ध न हो जाएं–समबडी हमें होना है, आगे होना है, किसी से कुछ होकर दिखलाना है–हम इस दौड़ में संगीत सीखेंगे! लेकिन क्या वह संगीत का प्रेम होगा, या कि अहंकार का प्रेम होगा? और जब अहंकार का प्रेम होगा तो संगीत कैसे सीखा जा सकता है? जहां अहंकार का प्रेम होगा वहां संगीत कैसे सीखा जा सकता है?

सीखने के लिए तो विनम्रता चाहिए। और यह शिक्षा पूरी की पूरी अहंकार सिखाती है, विनम्रता सिखाती नहीं। हालांकि शिक्षक नाराज है, वह कहता है विद्यार्थियों में विनम्रता नहीं है। विनम्रता उसमें कैसे हो सकती है? जब हम विद्यार्थियों को यह सिखाते हैं कि तुम दूसरों से आगे हो जाओ तो हम उसे अहंकार सिखाते हैं, इगो सिखाते हैं। तो उसमें विनम्रता कैसे हो सकती है? झूठी बात है। उसमें विनम्रता कभी नहीं हो सकती है, न होनी चाहिए। क्योंकि हम सिखा रहे हैं उसको अहंकार–दूसरों से आगे हो जाओ। जब वह दूसरों से आगे होता है तभी उसकी विनम्रता नष्ट हो जाती है और वह अहंकार से पीड़ित हो जाता है। फिर जब सारे लोग अहंकार से पीड़ित होकर लगेंगे, संगीत नहीं सीख सकते, दुनिया में कुछ भी नहीं सीख सकते।सीखने का सूत्र है, विनम्रता, ह्युमिलिटी। सीखने का सूत्र है, निर-अहंकारिता। लेकिन इन सबके अहंकार तो उकसाए जा रहे हैं। इनके तो अहंकार को आग लगाई जा रही है कि तुम आगे निकलो, तुम्हें विश्वविद्यालय में स्वर्ण-पदक लाने हैं। तुम्हें भारतरत्न बनना है, किसी को राष्ट्रपति बनना है, किसी को कुछ बनना है। सारे लोगों के मन में ईष्र्या की आग को जलाया जा रहा है, अहंकार को उत्तेजित किया जा रहा है। संगीत कैसे ये सीखेंगे, गणित कैसे ये सीखेंगे क्योंकि कुछ भी सीखने के लिए…जीवन का तत्व ये कैसे सीखेंगे? कुछ भी सीखने के लिए विनम्रता चाहिए। कुछ भी सीखने के लिए अप्रतियोगी, नाॅन-एंबीशस माइंड चाहिए।

हां, सीखने का दूसरा सूत्र भी हो सकता है और वह सूत्र है, संगीत से प्रेम। संगीतज्ञ से प्रतिस्पर्धा नहीं, संगीत से प्रेम। निकट के विद्यार्थी से प्रतियोगिता नहीं, बल्कि जिस विषय को हम सीखना चाहते हैं उसके प्रति तल्लीनता, उसके प्रति आनंद, उसके प्रति प्रेम। उचित है कि हम गणित के प्रति प्रेम सिखाएं, दूसरे गणित सीखने वाले के प्रति प्रतियोगिता न सिखाएं। उचित है, हम संगीत के प्रति प्रेम को जन्माएं, दूसरे संगीत सीखने वाले के प्रति प्रतिस्पर्धा को न जन्माएं। जरूर संगीत सीखा जा सकता है संगीत के प्रेम के कारण। और तभी संगीत सीखा जा सकता है। और तभी सब कुछ सीखा जा सकता है, जब हम किसी चीज को प्रेम करते हैं, तभी सीखना संभव है। सब सीखना प्रेम का अनुसरण करना है। लेकिन प्रेम तो हमारे भीतर सिखाया नहीं जाता। हमारी शिक्षा का प्रेम से कोई संबंध नहीं है।

इसलिए अक्सर यह होता है कि अगर आपने साहित्य पढ़ा है विश्वविद्यालय में और विश्वविद्यालयों से निकलने के बाद आप फिर कभी साहित्य को उठाकर न देखेंगे, क्योंकि विश्वविद्यालय आपको साहित्य से इतना उबा देंगे, इतना बोर कर देंगे, इतना घबड़ा देंगे कि फिर साहित्य उठाकर देखने वाले नहीं हैं। अगर आपने विश्वविद्यालय में कविताएं पढ़ी हैं तो आपका जीवन भर के लिए कविता का प्रेम और आनंद नष्ट हो जाएगा। इसलिए नष्ट हो जाएगा कि वह अहंकार की दौड़ में पढ़ी गई थीं, परीक्षाएं पास करने के लिए पढ़ी गई थीं, आगे निकलने के लिए पढ़ी गई थीं। काव्य से कोई प्रेम पैदा नहीं हुआ था।और इसलिए अक्सर यह होता है कि हमारी सारी शिक्षा प्रतिभा को नष्ट कर देती है। इमर्सन ने एक युवक की तारीफ में एक बात कही थी। वह गांव का पहला ग्रेजुएट था। इमर्सन से लोगों ने कहा कि आप भी उसके सम्मान में दो शब्द कहें। उन्होंने कहाः मैं महीने भर उस युवक को जांचूं, परखूं, फिर कुछ कह सकता हूं। महीने भर बाद वे उस समारोह में सम्मिलित हुए और उन्होंने कहाः मुझे यह युवक बहुत पसंद आया। और मैं इसकी तारीफ करता हूं। यह अदभुत है। और क्यों तारीफ करता हूं? उन्होंने कहाः इसलिए तारीफ करता हूं कि यह विश्वविद्यालय की शिक्षा के बावजूद भी यह अपनी प्रतिभा को बचाने में समर्थ हो सका है–इसलिए मैं इसकी तारीफ करता हूं। और हालत ऐसी ही है।

अदभुत हैं वे लोग जो विश्वविद्यालय के घनचक्कर से बाहर निकल जाएं और उनकी प्रतिभा शेष रह जाए। वह नष्ट हो जाएगी, वह नष्ट कर दी जाएगी। सारे के सारे आधार शिक्षा के बुनियादी रूप से गलत हैं। और फिर जब इस तरह की शिक्षा होगी, यह प्रतिस्पर्धा की, प्रतियोगिता की, एंबीशन की होगी, लड़ाइयों की, युद्धों की, संघर्षों की होगी। ये बच्चे भी बड़े होंगे कल। ये बड़े होकर लड़ेंगे। समूह की तरह लड़ेंगे, समाज की तरह लड़ेंगे, संप्रदाय की तरह लड़ेंगे, राष्ट्र की तरह लड़ेंगे क्योंकि इनको आगे निकलना है, इनको सबसे आगे निकलना है। मुल्क की तरह लड़ेंगे। दुनिया भर के मुल्क लड़ रहे हैं।

क्यों लड़ रहे हैं? क्योंकि जिन बच्चों को शिक्षा दी गई है उन सबको सिवाय लड़ने को और कुछ भी नहीं सिखाया गया है। उन्हें प्रेम सिखाया नहीं गया, उन्हें ईष्र्या सिखाई गई, जलन सिखाई गई। दो महायुद्ध हुए इन थोड़े से दिनों में–दस करोड़ लोगों की हत्या हुई। यह शिक्षा जरूर गलत होनी चाहिए। ऐसी कैसी शिक्षा है यह कि दुनिया दस-पांच वर्षों में करोड़ों लोगों की हत्या करे! ये विश्वविद्यालय से निकले लड़के किस भांति के हैं, इनका मस्तिष्क कैसा रुग्ण है! यह कैसे संभव है कि रोज दुनिया में लड़ाई चलती रहे और विश्वविद्यालय भी बनते रहें, यह कैसे संभव है? क्रमशः…….

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-३