छोटा सा बच्चा है, छोटे से स्कूल में पढ़ने जाता है। उसके मन में भी हम चिंता का भूत सवार कर देते हैं, उसे भी आगे होना है। वह भी पुरस्कृत होगा, अगर आगे आएगा। अपमानित होगा अगर द्वितीय आएगा। अपमानित होगा, अगर असफल होगा। सफल होगा तो सम्मानित होगा। शिक्षक आदर करेंगे, घर में आदर मिलेगा। हम उसके भीतर प्रतियोगिता पैदा कर रहे हैं। और प्रतियोगिता एक तरह का ज्वर है, एक तरह का बुखार है। जरूर ज्वर में ताकत आ जाती है। अगर आप बुखार में हैं तो आप ज्यादा तेजी से दौड़ सकते हैं। अगर आप बुखार में हैं तो आप ज्यादा तेजी से गालियां बक सकते हैं। अगर आप बुखार में हैं तो आप ऐसी बातें कर सकते हैं जो कि आप सामान्यतया नहीं कर सकते। बुखार में, एक ज्वर में त्वरा आ जाती है, एक शक्ति आ जाती है।
लेकिन किसलिए? इसलिए कि उन्हें दूसरों से आगे होना है। एक प्रतिस्पर्धा है, एक काम्पिटीशन है। फिर यह काम्पिटीशन का ज्वर उनको पकड़ जाता है। जब वे शिक्षा के जगत से बाहर आते हैं, पढ़-लिख कर बाहर निकलते हैं तब भी ये ज्वर उन्हें पकड़े रहता है। उन्हें दूसरे से बड़ा मकान बनाना है, उन्हें दूसरे से बड़ी दुकान खोलनी है, उन्हें दूसरे से बड़े पद पर पहुंचना है, छोटे क्लर्क को बड़ा क्लर्क होना है, अध्यापक को प्रधान अध्यापक होना है, डिप्टी मिनिस्टर को मिनिस्टर होना है, किसी को राष्ट्रपति होना है, किसी को कुछ होना है। एक पागलपन की दौड़ पकड़ती है। फिर जिंदगी भर प्रत्येक को कुछ न कुछ होने का पागलपन सवार रहता है। और इस पागलपन की दौड़ में उनके जीवन की सारी शांति, सारी शक्ति, सारा सामथ्र्य नष्ट हो जाता है।
हम उसके भीतर क्या पैदा कर रहे हैं? हम जहर डाल रहे हैं उसके भीतर ईष्र्या का। जब भी हम किसी बच्चे से कहते हैं, दूसरे बच्चों से आगे हो जाओ तो हम जहर डाल रहे हैं; तो हम उस बच्चे को प्रेम नहीं करते। यह जहर जीवन भर उसकी नसों में घूमता रहेगा, उसके मन में घूमता रहेगा। यह हमेशा आगे होना चाहेगा। हमेशा एक आगे होने की दौड़ उसको पकड़े रहेगी। लेकिन बड़ा मजा यह है कि कभी कोई आगे हुआ है? और क्या किसी दूसरे से आगे होने में कोई आनंद मिल सकता है? आनंद से किसी के आगे खड़े होने का कौन सा वास्ता है? शांति का किसी के आगे खड़े होने से कौन सा संबंध है? नहीं, यह बुनियादी रूप से गलत बात है।
सीखने का सूत्र है, विनम्रता, ह्युमिलिटी। सीखने का सूत्र है, निर-अहंकारिता। लेकिन इन सबके अहंकार तो उकसाए जा रहे हैं। इनके तो अहंकार को आग लगाई जा रही है कि तुम आगे निकलो, तुम्हें विश्वविद्यालय में स्वर्ण-पदक लाने हैं। तुम्हें भारतरत्न बनना है, किसी को राष्ट्रपति बनना है, किसी को कुछ बनना है। सारे लोगों के मन में ईष्र्या की आग को जलाया जा रहा है, अहंकार को उत्तेजित किया जा रहा है। संगीत कैसे ये सीखेंगे, गणित कैसे ये सीखेंगे क्योंकि कुछ भी सीखने के लिए…जीवन का तत्व ये कैसे सीखेंगे? कुछ भी सीखने के लिए विनम्रता चाहिए। कुछ भी सीखने के लिए अप्रतियोगी, नाॅन-एंबीशस माइंड चाहिए।
और इसलिए अक्सर यह होता है कि हमारी सारी शिक्षा प्रतिभा को नष्ट कर देती है। इमर्सन ने एक युवक की तारीफ में एक बात कही थी। वह गांव का पहला ग्रेजुएट था। इमर्सन से लोगों ने कहा कि आप भी उसके सम्मान में दो शब्द कहें। उन्होंने कहाः मैं महीने भर उस युवक को जांचूं, परखूं, फिर कुछ कह सकता हूं। महीने भर बाद वे उस समारोह में सम्मिलित हुए और उन्होंने कहाः मुझे यह युवक बहुत पसंद आया। और मैं इसकी तारीफ करता हूं। यह अदभुत है। और क्यों तारीफ करता हूं? उन्होंने कहाः इसलिए तारीफ करता हूं कि यह विश्वविद्यालय की शिक्षा के बावजूद भी यह अपनी प्रतिभा को बचाने में समर्थ हो सका है–इसलिए मैं इसकी तारीफ करता हूं। और हालत ऐसी ही है।