जीवन जो है वह सदा विपरीत को पैदा कर लेता है, सुखी और दुखी होना पुण्य और पाप से संबंधित नहीं है, सुखी और दुखी होना हमारी आकांक्षाओं के आरोपण से संबंधित है

ओशो- जिंदगी में सुख और दुख घूम रहे हैं, सब घूम रहा है। आप उसमें जब चुनाव करने लगते हैं कि हम यह चुन कर रहेंगे तब आपने दुख शुरू कर दिया, वह दुख का रास्ता हो गया। जब दुखी हो गए तब और जोर से सुख खोजेंगे और जितने जोर से सुख खोजेंगे उतने जोर से दुखी होंगे। तब एक विसियस सर्किल है जिससे बचाव मुश्किल हो जाएगा, इसको देखना पड़ेगा और हमारी क्या तकलीफ है कि अगर हम पूछते भी हैं कि हम दुखी क्यों हैं तो हम कुछ कारण खोज लेना चाहते हैं दुख के। हमने कोई बुरा काम किया होगा इसलिए दुखी हैं, कि हमने कुछ पाप किया होगा इसलिए दुखी हैं। दूसरा आदमी सुखी है, उसने कोई पुण्य किया होगा।सुखी और दुखी होना, न तो पुण्य और पाप से संबंधित है, सुखी और दुखी होना हमारी आकांक्षाओं के आरोपण से संबंधित है, कितने जोर से आरोपित करने की आकांक्षा में रहे! लेकिन किसी दिन डिसइलुजनमेंट आता है। पता चलता है कि कुछ आरोपण से नहीं होता है–सुबह आती है और आती है, सांझ आती है और आती है। तब भी सुबह आएगी, कुछ ऐसा नहीं है कि नहीं आएगी, तब भी सांझ आएगी लेकिन दंश चला जाएगा, पीड़ा चली जाएगी और तब जितनी सुबह ठीक से जी ली है, कोई कारण नहीं कि सांझ ठीक से क्यों न जी लें! मामला यह है कि ठीक से जिसने सुबह को पूरी तरह जी लिया है, वह तो खुद ही दोपहर होते-होते कहेंगे कि अब सांझ हो जाए। जो आदमी ठीक से जवान रह लिया है, उसके भीतर बुढ़ापे की आकांक्षा आ जाएगी। जो आदमी ठीक से जवान रह लिया है, उसके भीतर बुढ़ापे की आकांक्षा आ जाएगी। जो आदमी ठीक से जी लिया है वह मरना भी चाहता है।नीत्शे ने बहुत अच्छी बात कही है। उसने कहा है कि जब फल पक जाता है तो गिरना चाहता है। एक दफे पक भर जाए और जब फल पक जाता है तो गिरना ही चाहता है। सिर्फ कच्चे फल घबड़ाते हैं कि कहीं गिर न जाएं और चूंकि हम जिंदगी भर कच्चे रह जाते हैं इसलिए मरने से डरते हैं। अब इस तरह चक्कर पर चक्कर पैदा होते चले जाते हैं। मरने से डरते हैं तो उस सिद्धांत को पकड़ते हैं जो कह दे कि मरोगे नहीं। मैं नहीं कह रहा हूं कि मर जाएंगे आप। मैं यह कह रहा हूं कि हम अपनी आकांक्षाएं आरोपित न करके, जो है उसे जानने की फिक्र कर लें तो बात पूरी हो जाएगी, नहीं तो नहीं पूरी होगी।

व्यक्ति के तल पर तो यह ठीक है कि हम स्वीकार कर लें, लेकिन समाज के तल पर कैसे स्वीकार लें?गरीबी है, बीमारी है, दुख है, शोषण है, उस सबमें भी स्वीकार कर लें। यह बहुत बढ़िया बात है, और मैं इधर जितना सोचता हूं, बहुत अजीब अनुभव करता हूं। पहली बात तो यह है कि यह कंट्राडिक्ट्री दिखाई पड़ेगा, लेकिन ऐसा है! जो व्यक्ति स्वयं के तल पर सुख-दुख को स्वीकार नहीं करता वह समाज के तल पर सब बीमारियों को स्वीकार करने वाला होता है। जैसे हमारा मुल्क है। हमने व्यक्ति के तल पर सुख-दुख कभी स्वीकार नहीं किया है। हम मोक्ष की खोज निरंतर कर रहे हैं, जहां सुख-दुख से छुटकारा हो जाए। लेकिन समाज के तल पर हमने सब स्वीकार कर लिया है। अगर यह बात दिखाई पड़े तो इससे उलटा भी सत्य है कि जो व्यक्ति स्वयं के तल पर सब स्वीकार कर लेगा वह समाज के तल पर तो कुछ स्वीकार नहीं करेगा। जो स्वयं के तल पर सब स्वीकार कर लेगा वही क्रांतिकारी हो सकता है, क्योंकि क्रांतिकारी होने में भी दुख झेलने की संभावना है निरंतर, क्योंकि क्रांति का सुख तो किसी और को मिलेगा। क्रांति का सुख क्रांतिकारी को तो मिलता नहीं। तो क्रांति सिर्फ वही कर सकता है जो दुख को स्वीकार कर सकता है।

जब एक व्यक्ति सब तरह के सुख-दुख में जैसा है वैसा स्वीकार कर लेता है तो चेष्टा नहीं करनी पड़ती है उसे कि वह समाज के तल पर अस्वीकार करे। न, उस व्यक्ति का सहज वर्तन यह हो जाता है कि समाज के तल पर यह स्वीकार नहीं कर सकता है। यानी मैं यह नहीं कह रहा हूं कि वह स्वीकार नहीं करेगा या नहीं करना चाहिए। न, ऐसा वर्तन हो जाता है।जो व्यक्ति स्वयं के तल पर टोटल एक्सेप्टेबिलिटी में जीता है वह समाज के तल पर टोटल रिजेक्शन में जीता है। और जो व्यक्ति समाज के तल पर स्वीकार में जीता है वह अपने तल पर रिजेक्शन में जीता है, और अपने तल पर कहता है, मैं यह दुख में हूं, यह नहीं सुनूंगा, यह नहीं करूंगा, वह समाज के तल पर सब स्वीकार कर लेता है। उसका कारण है कि जो व्यक्ति, व्यक्ति के लिए सब कुछ करने की चिंता में रत है उसके लिए समाज का बोध ही पैदा नहीं होता है–यानी समाज की जो धारणा है, कांशसनेस जो है वह उसको पैदा होती है जो व्यक्ति के तल पर निपट गया–यानी अब इधर कुछ करने का मामला बचा नहीं, इधर बात खत्म हो गई, इधर मैंने मान लिया है कि जो है, है! तब मैं क्या करूंगा, आखिर मैं कुछ तो करूंगा। व्यक्ति के तल पर तो करने से मुक्त हो गए। तो वह जो सृजन की, निर्माण की, विध्वंस की ऊर्जा जो भी है मेरे पास वह जाएगी कहां! वह कहीं सक्रिय हो जाएगी।

व्यक्ति के केंद्र पर जहां ऊर्जा का काम समाप्त हो गया है वहां वह समाज के चारों तरफ फैल कर काम में लग जाती है। ऐसा नहीं है कि वह लगता है, वह मैं नहीं कह रहा हूं। हां, इट हैपंस! और अगर सारी ऊर्जा इसी में लगी हुई हो कि मेरा अगला जन्म कैसे शुद्ध रहे और मैं स्वर्ग कैसे जाऊं, मैं पुण्य कैसे करूं और मैं पाप से कैसे बचूं और यह खाऊं कि न खाऊं, यह पीऊं कि न पीऊं। अगर सारी चेतना यहां उलझी है तो समाज की तो धारणा ही पैदा नहीं होगी। तो हमें पता भी नहीं चलता है कि हमारे अलावा भी कोई है।

जो कौम, जो व्यक्ति, जो समाज ऐसा व्यक्तिवादी होगा, वह तो यहां तक कहेगा कि न तो तुम्हारी कोई पत्नी है, न तुम्हारी कोई मां है, न तुम्हारा कोई पिता है, न कोई भाई है, न कोई बेटा है, यह सब भ्रम है। हो तो तुम्हीं सब सत्य, बाकी सब भ्रम है, सब माया है। इससे तुम बचो, इसके तुम चक्कर में मत पड़ जाना। न कोई मौत में साथ देंगे, न कोई पुण्य में साथ देंगे, न पाप में साथ देंगे। तुम अकेले हो निपट, अपनी फिक्र करो। इसकी भी फिक्र मत करना कि औरत अगर भूखी मर रही हो तो मर रही है, वह अपने पिछले जन्म का पाप का फल भोग रही है। तुम्हारा क्या लेना-देना है। तुम्हारा बच्चा अगर सड़क पर भीख मांग रहा हो तो मांग रहा होगा क्योंकि उसको मांगनी पड़ेगी, उसके अपने कर्म फल हैं, तुम अपनी फिक्र करो।

यह जो व्यक्तिवादी दृष्टि थी, अगर कोई सब स्वीकार कर ले तो व्यक्ति रह ही नहीं जाता। अगर गौर करें, वह जो ईगो है व्यक्ति की, वह पैदा होती है रेजिस्टेंस से। वह जितना ‘मैं’ लड़ता है, यह नहीं चाहिए और यह चाहिए–इसी के संघर्ष में मेरा ‘मैं’ पैदा होता है कि ‘मैं हूं।’ च्वाइस ‘मैं’ पैदा करती है, च्वाइसलेस ईगो नहीं हो सकती है। फिर वह बचने का उपाय नहीं रह जाती है। ‘मैं हूं’, इसका क्या मतलब है? सुबह सूरज निकलता है, सांझ ढलता है–मैं कहां हूं? यानी मैं कहता हूं, सुबह ही होनी चाहिए और सांझ नहीं! आठ-दस घंटे तो सूरज को ढलने में लगेंगे। आठ-दस घंटे मैं अपने मैं को मजबूत करूंगा कि अभी तक नहीं ढलने दिया, अभी तक सूरज को रोके हुए हूं, अभी तक सुबह है। जब ढल जाएगा तब मैं सोचूंगा जरूर कि पिछले जन्मों का कर्मों का फल बाधा डाल रहा है–और सूरज अपने आप ढल रहा है और अपने आप उग रहा है। उससे कुछ लेना-देना नहीं है। इधर मेरी ईगो मजबूत होती चली जाएगी, लेकिन जब मैंने मान लिया कि ऐसा हो रहा है, तब अचानक मेरी सारी ऊर्जा और सारी शक्ति चारों तरफ फैल कर काम करने में लग जाती है।

यानी मेरी दृष्टि में क्रांतिकारी पैदा होता है सर्व स्वीकार से। उल्टा लगता है क्योंकि क्रांतिकारी निषेध करता है। और जिंदगी के दो हिस्से जिसको हम विधायक और निषेध, निगेटिव और पाजिटिव कहें–अगर मैं अपने तईं पाजिटिव हूं तो समाज की तरफ निगेटिव रहूंगा क्योंकि वह दूसरा हिस्सा है–क्योंकि अगर मैं अपनी तरफ निगेटिव हो गया तो समाज की तरफ पाजिटिव हो जाऊंगा। वह मेरा दूसरा हिस्सा है, मैं कहीं एक हिस्सा रहूंगा। अगर समाज को अच्छा करना हो तो व्यक्ति के तल पर स्वीकृति होनी चाहिए और समाज को अगर सड़ाना हो तो व्यक्ति के तल पर अस्वीकृति होनी चाहिए। इसलिए मेरी बात में निरंतर विरोध रहता है।

मुझे कई लोग आकर कहते हैं कि आप सुबह के ध्यान में सिखाते हैं, सब स्वीकार कर लो और सांझ की सभा में कहते हैं कि सब अस्वीकार कर लो–अब मैं क्या करूं? सुबह सूरज उगता है, सांझ ढलता है, इसमें मैं क्या कर सकता हूं! अब सूरज से हम नहीं कहते कभी जाकर कि सुबह उगते हो, सांझ ही ढलते हो–विरोध है दोनों में। सुबह उगते हो तो सांझ ढलते क्यों हो? नहीं, सुबह मैं यही कहता हूं कि स्वीकार कर लो, सांझ यही कहता हूं कि अस्वीकार कर लो। वह दोनों ही जिंदगी के हिस्से हैं। एक और सवाल किसी ने पूछा है, इसको आखिरी मान लें।

पूछा हैः मानव आज रुग्ण है और मैं यह मानता हूं कि जब मनुष्य पैदा हुआ था करोड़ों वर्ष पहले तब आदमी अवश्य ही स्वस्थ रहा होगा। तब फिर मनुष्य का वह कौन सा अचेतन मन है जिसने बीमारी के जंतुओं को आने दिया और वह जंतु और वह बीज कौन से हैं जिसने मनुष्य को अमानवीयता की शुरुआत होने दी?

ऐसी सब कल्पनाएं हैं। असल में कई करोड़ों वर्ष पहले आदमी सुखी था, ऐसे खयाल में पड़ने की कोई जरूरत नहीं है। और कोई आदमी को दुखी होना अनिवार्य है ऐसी भी कोई बात नहीं है। कुछ लोग समझ लेते हैं, वे सदा सुखी हैं इस अर्थ में कि वे दुख को भी स्वीकार कर लेते हैं। जो नहीं समझते हैं, वे सदा दुखी हैं, इस अर्थ में कि वे दुख के अस्वीकार में ही दुखी होते चले जाते हैं। और ऐसा नहीं है कभी कि सारी मनुष्यता सुखी थी और सारी मनुष्यता कभी दुखी हो गई है। और ऐसा भी नहीं है कि कभी स्वीकार था और अब सब अस्वीकार हो गया है। ऐसा कभी नहीं था। हर युग की अपनी बीमारियां होती हैं, अपने दुख होते हैं–बदल जाते हैं।

नये युग नई बीमारियां पैदा कर लेते हैं, नये दुख पैदा कर लेते हैं लेकिन सदा दुख है, सदा बीमारी है, सदा परेशानी है और सदा रहेगी। हम लड़ते रहेंगे और एक तरफ से बचाएंगे और दूसरी तरफ से पैदा हो जाएगा। अभी लुइचसा व वैज्ञानिकों ने इतनी मेहनत की, अब अगर लुइचसा लौट आए तो शायद घबड़ा जाएगा, क्योंकि उसने आदमी को बचाने की कोशिश की कि बच्चे मर न जाएं। अब बच्चे ज्यादा हो गए हैं, अब उन्हें पैदा न होने दें और पैदा हो जाएं तो उनको मारने का उपाय करें। तो भ्रूण हत्या के लिए और गर्भपात के लिए विचार करना पड़ता है। और कोई आश्चर्य नहीं है कि अगर संख्या बढ़ती चली जाए तो जिस तरह हम जन्म निरोध की बात कर रहे हैं उस तरह हम एक उम्र के बाद बूढ़े आदमी को मारने के लिए मजबूर करेंगे, यह दूसरा हिस्सा है उसका–यह होगा!

अगर यह रुकता है मामला, अगर हम बच्चों को नहीं रोक पाते हैं, नहीं रोक पा रहे हैं तो दूसरा उपाय एक ही है कि जैसे हम अट्ठावन में, पचपन की आयु में रिटायर करते हैं, हम सत्तर साल में कहेंगे कि जीवन से सब रिटायर हो जाएं, क्योंकि बच्चे आए चले जा रहे हैं और अब कोई बचाव का उपाय नहीं है। अब वैज्ञानिक, जिसने कि बीमारियां बचाईं और दस बच्चों में से आठ बच्चे मर जाते थे उनको बचा लिया, अब बड़ी झंझट की बात हो गई। अब कौन कहे कि वह ठीक हुआ!–क्योंकि अब हमको आठ मारने पड़ेंगे या रोकने पड़ेंगे या कुछ करना पड़ेगा।इधर से हम इंतजाम करते हैं, उधर से कुछ बिखर जाता है, यानी मेरा मानना यह है कि पूर्ण इंतजाम कभी नहीं हो सकता। क्योंकि पूर्ण इंतजाम का कोई मतलब नहीं हो सकता। हम हमेशा ही एक तरफ इंतजाम करते हैं, दूसरी तरफ ठीक उसके विपरीत चीज खड़ी हो जाती है। क्योंकि जीवन जो है वह सदा विपरीत को पैदा कर लेता है इसलिए संतुलन में, अगर तौल हम कभी खोज सकें तो बराबर इतना ही रहेगी जितनी कभी थी। उसमें कोई फर्क नहीं पड़ेगा। यानी यह हो सकता है कि एक आदमी के पास आज फियेट कार है और आज से हजार साल पहले उसके बाप के पास बैलगाड़ी थी। बगल वाले के पास एक रथ था, अभी बगल वाले के पास एक इम्पाला है। दोनों का फासला उतना ही है जितना बैलगाड़ी और रथ का था, जितना फियेट और इम्पाला का है। वह जो अनुपात है वह उतना का उतना ही खड़ा है। रथ वाले को देख कर जितना बैलगाड़ी वाला दुखी होता था उतना इम्पाला वाले को देख कर फियेट वाला दुखी होता है। इम्पाला आ गई, बैलगाड़ी हट गई है, रथ हट गया है, लेकिन वह जो मामला है वह अपनी जगह खड़ा है।

अनुपात वही है और अनुपात में बड़ी भूल हो जाती है। आपके पास दस रुपये हैं और मेरे पास सौ रुपये हैं तो आप गरीब हैं और मैं अमीर हूं। कल आपके पास सौ हो जाते हैं, मेरे पास हजार हो जाता है, फासला उतना ही होता चला जाता है, उसमें कोई फर्क नहीं पड़ता।

मेरी अपनी समझ यह है कि जिंदगी जैसी सदा थी वैसी ही है, उसके रूप बदलते हैं, आकार बदलते हैं। सब मामला वैसे ही है। उस सारे मामले में इतना फर्क पड़ सकता है कि कोई व्यक्ति इसको स्वीकार करे या अस्वीकार करे–और उस दिन भी वही था और आज भी वही है। उस दिन जो बैलगाड़ी वाला था, अगर उसने स्वीकार कर लिया होता कि अच्छा है कि तुम्हारे पास रथ है, हमारे पास बैलगाड़ी और चल पड़ा होता अपनी बैलगाड़ी में तो जितना सुखी हो जाता, उतना ही आज फियेट वाला इम्पाला वाले को देख कर…कि अच्छा, तुम्हारे पास इम्पाला है, हमारे पास फियेट है, चल पड़ता है, उतना ही वही रस उपलब्ध हो जाएगा जो उसको हुआ था, वह उसको उपलब्ध हो जाएगा।

जिंदगी वैसी ही है, सदा वैसी ही है…रुख क्या हम लेते हैं, इस पर निर्भर करता है और दो तरह के रुख हैं जैसा मैंने कहा–एक तो है कि हम निरंतर आकांक्षाओं को आरोपित करते चले जाएं और एक है कि जो है उसे हम जान लें, उसे हम पहचान लें, हम देख लें। और जैसे ही हम उसको देखते हैं, अनिवार्यरूपेण उसकी स्वीकृति हो जाती है क्योंकि सवाल ही नहीं इसको अस्वीकार करने का।

ऐसे स्वीकृति-उपलब्ध व्यक्ति को ही मैं धार्मिक कहता हूं और जब इतनी स्वीकृति होती है तो शांति अपने आप भर जाती है और उस शांति में हम बहुत कुछ देख पाते हैं जो हमने अशांति में कभी भी नहीं देखा था।
और पहली बात आपको दोहरा दूं अंत में कि उस शांति में जो हमें दिखाई पड़ता है वह कम्युनिकेबल नहीं है, उसको कहा नहीं जा सकता। उस शांति में हम कुछ जानते हैं जो कि शब्द में नहीं बंधता है। तो तड़प सकते हैं, परेशान हो सकते हैं, चिल्ला सकते हैं मगर उससे कुछ होता नहीं। हां, इतना ही हो सकता है, शायद हमारी तड़प को, पीड़ा को, समझाने की कोशिश को कोई पकड़ कर सोचे…जरूर इस आदमी ने कुछ देखा है! जैसे एक गूंगा आदमी आ जाए और हमारे में चिल्लाने लगे, जोर से हाथ-पैर पटकने लगे और बताने लगे तो हमें कुछ समझ में तो न आए लेकिन इतना समझ में आ जाए कि इस आदमी को कुछ हुआ है। और अगर हाथ पकड़ कर बताने लगे, बाहर या कहीं ले जाने लगे तो वह नहीं कर पाए, लेकिन इतना कम्युनिकेट कर दे कि कम्युनिकेट नहीं कर पा रहा हूं और कुछ है…बस इतना अगर हो जाए तो शायद हम चले जाएं, इतनी ही मेरी चेष्टा है! उससे ज्यादा मेरा भरोसा नहीं है। यानी मैं शब्द का विश्वासी नहीं हूं, संवाद का विश्वासी हूं, बुद्धि का विश्वासी नहीं हूं।

लेकिन मेरे साथ दिक्कत इसलिए होती है कि मैं दिन-रात तो समझाता हूं कि विचार करो, बिना विचार के मत मानो, विश्वास मत करो और फिर मैं कहता हूं कि मैं बुद्धिवादी नहीं हूं और मैं यह सब इसलिए कहता हूं कि इसको थका डालो बुद्धि को, खूब सोच लो, खूब तर्क कर लो, आग्र्यु कर लो और यह थक जाए! एक दफे यह थक जाए और गिर जाए, तुम इसके बाहर हो जाओ, सांप की केंचुल की तरह पड़ी रह जाए और सांप बाहर निकल जाए। और यह निकलेगी नहीं, अगर विश्वास कर लिया क्योंकि वह फटेगी नहीं। यह निकलेगी नहीं अगर किसी को आस्था कर लें तो। क्योंकि यह थकेगी नहीं, यह निकलेगी नहीं, अगर आस्था कर लिया तो…क्योंकि इसका थकना जरूरी है इसके निकल जाने के लिए।

एक तो वह विश्वास है जो हम बुद्धि का बिना उपयोग किए ही पकड़ लेते हैं। वह बिलो इंटलेक्ट है और एक वह श्रद्धा है जो बुद्धि के थकान पर उपलब्ध होती है, बियांड इंटलेक्ट है और दोनों बिलकुल अलग बातें हैं, मगर दोनों एक सी मालूम पड़ सकती हैं।

इसलिए कभी-कभी महाज्ञानी महामूढ़ मालूम पड़ सकता है, इसमें कोई ऐसी कठिनाई नहीं। क्योंकि वह दोनों छोर हैं, एक बुद्धि के नीचे है, एक बुद्धि के पार है। क्रमशः………..

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-३