सूचनाएं, इनफर्मेशन तो कॉलेज और विश्वविद्यालय दे देते हैं युवकों को, और दे-दे कर जवानी में ही उनको बूढ़ा कर देते हैं क्योंकि ज्ञान विकसित हो जाना एक बात है और बुद्धिमत्ता विकसित होनी बिलकुल दूसरी बात

ओशो- क्या आप युवक हैं? अगर युवक हैं तो जीवन में अकेले खड़े होने की हिम्मत जुटानी पड़ती है और ध्यान रहे, अकेले खड़े होने का अर्थ होता है, विवेक को जगाना। क्योंकि जो विवेक को न जगा सके वह अकेला खड़ा नहीं हो सकता है। इसलिए तीसरी बात युवक क्रांति दल चाहता है इस देश में, व्यक्ति-व्यक्ति के भीतर विवेक, बोध, समझ, अंडरस्टैंडिंग को जगाने की कोशिश। क्योंकि अकेला आदमी तभी अकेला हो सकता है, चाहे दुनिया उसके साथ न हो, उसके पास विवेक साथ है। उसकी आंख में स्पष्ट दिखाई पड़ रहा है कि जो वह कर रहा है, वह ठीक है। उसका तर्क उसके प्राण उससे कह रहे हैं कि वह जो कर रहा है, वह ठीक है, चाहे सारी दुनिया विपरीत हो।
जीसस को जिस दिन सूली पर लटकाया होगा, जीसस जवान आदमी रहा होगा। ऐसे उम्र से भी वह जवान ही थे, तैंतीस वर्ष ही उम्र थी लेकिन वे सत्तर वर्ष के भी होते तो कोई फर्क नहीं पड़ता था। जीसस युवा आदमी था। सारी दुनिया उसके विपरीत थी। एक लाख आदमी इकट्ठे थे उसे सूली पर लटकाने को। वह चाहता तो माफी मांग सकता था, माफी उसे जरूर मिल जाती। वह चाहता तो कह सकता था कि मुझसे गलती हो गई, यह मैंने क्या पागलपन कर दिया। वह मुक्त हो जाता। एक गांव में बैठ कर बढ़ईगिरी का काम करता, उसकी शादी होती, बच्चे पैदा होते और मजे से मर जाता। लेकिन नहीं, उस आदमी ने अकेले खड़े होने की हिम्मत की, सूली पर भी।
लेकिन वह अकेला खड़ा होकर किसी को नरक नहीं भेज रहा है, अकेला खड़ा होकर किसी के सड़ाने का आयोजन नहीं कर रहा है। किसी के प्रति क्रोध नहीं है उसके मन में। अकेला खड़ा है अपने विवेक के कारण, किसी के प्रति क्रोध के कारण नहीं। सूली पर लटकते हुए उसने अंतिम प्रार्थना की और कहा, हे परमात्मा! इन सब लोगों को माफ कर देना क्योंकि इन्हें पता नहीं कि ये क्या कर रहे हैं। लेकिन उसे पता है कि वह क्या कर रहा है। उसे दिखाई पड़ रहा है कि वह क्या कर रहा है, उसे ज्ञात है कि वह जो कर रहा है, ठीक है। क्योंकि पूरे प्राणों से सोच कर, विचार कर, अनुभव से, उसकी पूरी बुद्धि की सलाह से, उसने यह किया है, वह जानता है!
और जिस दिन मेरा विवेक मेरे साथ होता है, तुम्हारा विवेक तुम्हारे साथ होता है, उस दिन सारी दुनिया दो कौड़ी की हो जाती है, उस दिन तुम अकेले खड़े हो सकते हो। विवेक की शक्ति इतनी बड़ी है कि सारी दुनिया की शक्ति क्षीण हो जाती है। इसलिए तीसरी बात युवक क्रांति दल चाहता है, विवेक कैसे विकसित हो, बुद्धिमत्ता कैसे विकसित हो।
ज्ञान विकसित हो जाना एक बात है और बुद्धिमत्ता विकसित होनी बिलकुल दूसरी बात है। नॉलेज आना एक बात है व़िजडम आना बिलकुल दूसरी बात है। नॉलेज और ज्ञान तो स्कूल, कॉलेज और विद्यालय दे देते हैं लेकिन विज़डम कौन देगा? सूचनाएं, इनफर्मेशन तो कॉलेज और विश्वविद्यालय दे देते हैं युवकों को, और उनको दे-दे कर जवानी में ही उनको बूढ़ा कर देते हैं। क्योंकि जितना उनको भ्रम पैदा हो जाता है कि हम जानते हैं, उतने ही जानने की जिज्ञासा कम हो जाती है। विश्वविद्यालय के मंदिर से निकलते वक्त युवक को ऐसा नहीं लगता कि वह जानने की एक नई यात्रा पर जा रहा है। अब उसे ऐसा लगता है, अब जानने का काम हुआ बंद, यह सर्टिफिकेट मिल गया, अब बात हो गई समाप्त, अब मुझे जानना नहीं है।
ठीक विश्वविद्यालय तो तब होगा जब विश्वविद्यालय हमें विद्या का मंदिर नहीं मालूम पड़ेगा, विद्या के मंदिर की सिर्फ सीढ़ियां मालूम पड़ेगा। विश्वविद्यालय वहां छोड़ता है, जहां सीढ़ियां समाप्त होती हैं और असली ज्ञान का मंदिर शुरू होता है। लेकिन उस ज्ञान का नाम नॉलेज नहीं है। उस ज्ञान का नाम विज़डम है, उसका नाम है समझ, उसका नाम है बुद्धिमत्ता।
युवक क्रांति दल, चौथी बात: बुद्धिमत्ता, विज़डम पैदा करने के प्रयोग करना चाहता है। और इसलिए भी कि सारे जगत में ही…हिंदुस्तान में तो, क्योंकि अभी तो काम यहां है, युवक के पास, सारी बुद्धिमत्ता ऐसा लगता है, पैदा ही नहीं हो पा रही है। वह जो भी कर रहा है, बुद्धिहीन है। उसका सारा उपक्रम बुद्धिहीन है, उसका विद्रोह बुद्धिहीन है, उसकी बगावत बुद्धिहीन है। मैं बगावत का विरोधी नहीं हूं। मुझसे ज्यादा बगावत का प्रेमी खोजना मुश्किल है। मैं विद्रोह का विरोधी नहीं हूं। मैं तो विद्रोह को धार्मिक कृत्य मानता हूं। रिबेलियन को मनुष्य का अधिकार मानता हूं। लेकिन जब विद्रोह बुद्धिहीन हो जाता है तो विद्रोह से किसी का कोई हित नहीं होता है सिवाय अहित के। और जब विद्रोह अर्थहीन होता है और जब विद्रोह एक विवेकपूर्ण कृत्य नहीं होता, तो वह दूसरे को तो नुकसान कम पहुंचाता है, विद्रोही को ही नष्ट कर डालता है।
हिंदुस्तान का युवक एक विद्रोह की गति पर जा रहा है, एक दिशा पर जहां बुद्धिमत्ता बिलकुल नहीं है। युवक क्रांति दल एक बुद्धिमत्ता जगाने की चेष्टा करना चाहता है। बुद्धिमत्ता जगाने के उपाय हैं। बुद्धिमत्ता जगाने की विधियां हैं। जिस तरह ज्ञान पैदा होता है—सूचनाएं इकट्ठी करने से, जिस तरह ज्ञान इकट्ठा होता है—अध्ययन से, मनन से, चिंतन से। उसी तरह बुद्धिमत्ता उत्पन्न होती है; ध्यान से, मेडिटेशन से। युवक क्रांति दल ध्यान का एक आंदोलन चलाना चाहता है पूरे भारत में। एक-एक युवक के पास ध्यान की क्षमता होनी चाहिए। एक-एक युवक के पास मेडिटेशन की विधि होनी चाहिए। वह जब चाहे तब अपने गहरे से गहरे प्राणों में प्रवेश कर सके। वह जब चाहे तब अंतर के द्वार खोल सके और अंतर के मंदिर में प्रविष्ट हो सके। जिस दिन कोई व्यक्ति अपनी आत्मा के जितने निकट पहुंच जाता है उतना ही बुद्धिमान हो जाता है। बुद्धिमत्ता का संबंध, बुद्धिमत्ता का संबंध है: कौन व्यक्ति अपनी आत्मा के कितने निकट है उतना ही वाइज, उतना ही विज़डम उसके पास होती है। जो आदमी अपनी आत्मा से जितना दूर है, उतना ही कम बुद्धिमान होता है। बुद्धिमत्ता आती है ध्यान से।
जैसे ज्ञान नालेज आता है अध्ययन से, मनन से, शिक्षण से; उसी तरह बुद्धिमत्ता आती है ध्यान से। इस देश के युवक को ध्यान की प्रक्रिया में ले जाने का एक बड़ा मूवमेंट, ‘मूवमेंट फॉर मेडिटेशन’…सारे देश के कोने-कोने में बच्चे-बच्चे तक ध्यान की खबर पहुंचानी है और ध्यान की प्रक्रिया पहुंचानी है। वह युवक क्रांति दल करना चाहता है।
ध्यान व्यक्ति को उपलब्ध हो तो व्यक्ति शांत हो जाता है और जितना शांत व्यक्ति होगा उतने सुंदर समाज के सृजन का घटक बन जाता है। जितना शांत व्यक्ति होगा, उतने सत्य, उतने साहस, उतने अकेले होने की हिम्मत, उतने अज्ञात की तरफ जाने की कामना और उतना जोखिम उठाने की व्यक्तित्व में मजबूती आ जाती है। जितना शांत व्यक्ति होगा उतना कम भयभीत होता है। जितना शांत व्यक्ति होगा उतना स्वस्थ होता है। जितना शांत व्यक्ति होगा उतना जीवन को झेलने और जीवन का सामना करने की शक्ति उसके पास होती है।
हमारा युवक जीवन के सामने बैंकरप्ट, दिवालिया की तरह खड़ा हो जाता है। उसके पास कुछ भी नहीं है। कुछ सर्टिफिकेट हैं, कागज के कुछ ढेर हैं। उनका वह पुलिंदा बांध कर जिंदगी के सामने खड़ा हो जाता है। उसके पास भीतर और कुछ भी नहीं है। यह बड़ी दयनीय अवस्था है। यह बहुत दुखद है और फिर इस स्थिति में फ्रस्ट्रेशन पैदा होता है, विषाद पैदा होता है, तनाव पैदा होता है, क्रोध पैदा होता है। और इस क्रोध में वह समाज को तोड़ने में लग जाता है, चीजें नष्ट करने में लग जाता है।
आज सारे मुल्क का बच्चा-बच्चा क्रोध से भरा हुआ है। क्रोध में वह कुर्सियां तोड़ रहा है, फर्नीचर तोड़ रहा है, बस जला रहा है। नेता हैं मुल्क के, वे कहते हैं कुर्सियां मत तोड़ो, बस मत जलाओ, मकान मत मिटाओ, खिड़कियां मत तोड़ो। लेकिन नेता भी जानते हैं कि वे भी नेता कुर्सियां तोड़ कर, बसें जला कर और कांच फोड़ कर हो गए हैं। उनको पक्का पता है, उनकी सारी नेतागिरी इसी तरह की तोड़-फोड़ पर निर्भर, खड़ी हो गई है। यह बच्चे भी जानते हैं कि नेता होने की तरकीब यही है कि कुर्सियां तोड़ो, मकान तोड़ो, आग लगाओ।
इसलिए वे पुराने नेता जो कल यही करते रहे थे, आज ये ही दूसरे को समझाएंगे। वह समझ में आने वाली बात नहीं है। फिर उन नेताओं को यह भी पता नहीं है कि कुर्सियां तोड़ी जा रही हैं। यह सिर्फ सिंबालिक है। कुर्सियों से बच्चों को क्या मतलब हो सकता है? किस आदमी को कुर्सी तोड़ने से मतलब हो सकता है! बस जलाने से किसको मतलब हो सकता है?बस से किसकी दुश्मनी है? ऐसा पागल आदमी खोजना मुश्किल है जिसकी बस से और दुश्मनी हो, कि कांच तोड़ने में कुछ रस आता हो। नहीं, यह सवाल नहीं है। यह सवाल ही नहीं है। यह बिलकुल असंगत है। इससे कोई संबंध नहीं है। युवक है भीतर अशांत, पीड़ित और परेशान। और परेशान आदमी कुछ भी चीज तोड़ लेता है तो थोड़ी सी राहत मिलती है। थोड़ा रिलैक्सेशन मिलता है। कुछ भी तोड़ ले।
एक मनोवैज्ञानिक के पास एक बीमार को लाया गया था। वह एक दफ्तर में नौकर था। उस दफ्तर में उसका मालिक उसे कभी बुरा शब्द बोलता, कभी अपमानित कर देता। मालिक के खिलाफ वह कुछ कर नहीं सकता था। लेकिन भीतर क्रोध तो आता था। क्रोध आता था तो घर जाकर पत्नी पर टूट पड़ता था। क्रोध आता था तो कभी गुस्से में अपनी ही चीजें तोड़ लेता था। लेकिन फिर खयाल में आता था, यह क्या पागलपन है! फिर क्रोध बढ़ता चला गया। फिर उसके मन में ऐसा होने लगा कि होगा, जो कुछ होगा, एक दिन जूता निकाल कर मालिक की सेवा कर दी जाए। हाथ उसके जूते पर जाने लगे तो वह बहुत घबड़ाया कि यह तो बहुत खतरनाक बात हुई जा रही है। अगर जूता मैंने मार दिया तो मुश्किल में पड़ जाऊंगा। फिर वह
जूता घर छोड़ कर आने लगा। क्योंकि किसी भी दिन खतरा हो सकता था। लेकिन जूता घर छोड़ कर आने से क्या संबंध था! वह जूता तो केवल प्रतीक था। बात और तरह होने लगी। वह टेबल से डंडे उठाने लगा, वह स्याही की दवात उठा कर फेंकने का खयाल करने लगा। तब उसे घबड़ाहट आई और उसने घर जाकर अपने मित्रों को कहा कि मैं बड़ी मुश्किल में पड़ गया हूं। बस कुछ भी मिल जाए, तो मैं मालिक को मारना चाहता हूं।
वह एक मनोवैज्ञानिक के पास उसे ले गया। मनोवैज्ञानिक ने कहा: कुछ मत करो। मालिक की एक तस्वीर घर में बना लो और रोज सुबह पांच जूते बिलकुल रिलिजइसली तस्वीर को मारो। बिलकुल इसमें भूल-चूक न हो। जैसे कि पुजारी पूजा करता है और माला फेरने वाले माला फेरते हैं, ऐसा रिलिजइसली। इसको बिलकुल पांच जूते मारो फिर दफ्तर जाओ। दफ्तर से लौट कर पहला काम, इसको पांच जूते मारो फिर दूसरा काम करो।
वह आदमी हंसा। उसने कहा: इससे क्या होगा। लेकिन यह सुन कर भी उसके चेहरे पर जो भाव आया वह एक रिलैक्सेशन का था, एक शांति का था। उस मनोवैज्ञानिक ने कहा: होगा। तुम फिकर मत करो। कल से यह कार्य शुरू करो। उसने पांच जूते सुबह ही उठ कर मारे। बड़ी जल्दी रही। रात में कई दफा नींद खुली कि जल्दी सुबह हो जाए। सुबह हुई। उसने पांच जूते मारे। पांच जूते मार कर वह बड़ा हैरान हुआ। मन उसका बड़ा हलका सा लगा, और मालिक जो कि जूता खाए हुए सामने पड़े थे उन बड़ी पर दया मालूम हुई।
वह दफ्तर गया। उस दिन तो उसका व्यवहार भिन्न था। पंद्रह दिन रोज जूते मारता रहा और दफ्तर में वह दूसरा आदमी हो गया। उसका मालिक उससे पूछने लगा, क्या हो गया तुम्हें। तुम बिलकुल बदल गए। तुम इतने शांत हो गए हो, तुम इतनी कुशलता से काम कर रहे हो। उसने कहा: मालिक वह पूछें ही मत कि क्या तरकीब से काम कर रहे हैं। उसमें नौकरी जाने का खतरा है।
इस आदमी को क्या हुआ? इसके भीतर तोड़ने-फोड़ने की, मिटाने की, किसी को नीचा दिखाने की तीव्र भावना काम कर रही थी। वह भावना किसी भी रूप में निकल सकती थी। वह टेबल तोड़ सकती थी, कांच फोड़ सकती थी। घर में पत्नियां जानती हैं भलीभांति कि पति से झगड़ा होता है, बर्तन बेचारे टूट जाते हैं। माताएं जानती हैं भलीभांति, पति से झगड़ा होता है, बच्चे पिट जाते हैं। क्रोध यहां-वहां से निकलना शुरू होता है।
युवक के पास क्रोध तो बहुत है, शांति बिलकुल नहीं है। इसलिए सारा उपद्रव हो रहा है। उपद्रव बढ़ेगा, उपद्रव गहरा होगा। अभी वे मकान तोड़ रहे हैं, कल वह मकान जलाएंगे। अभी वह बसें जला रहे हैं, कल वह आदमियों को जलाएंगे। पचास साल के भीतर, आदमी जलाए जाएंगे, अगर युवक का क्रोध इसी तरह गति करता रहा, और उसे शांति की दिशा में ले जाने का कोई उपाय नहीं मिल सका। क्रमशः…..

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-३