क्या कारण है कि जनता के सेवक, जनता की सेवा करने जाते हैं, थोड़े दिन में पता चलता है कि वे जनता के जेब काटने वाले सिद्ध होते हैं

ओशो- धर्मों ने शराब का विरोध सिर्फ इसलिए किया है कि जो आदमी शराब पीता है, वह अपने को भुलाने का उपाय कर रहा है और जो आदमी अपने को भुलाने का उपाय कर रहा है, वह अपनी आत्मा से कभी भी परिचित नहीं हो सकता। क्योंकि आत्मा से परिचित होने के लिए तो अपने को जानने का उपाय करना है। इसलिए शराब और समाधि दो विरोधी चीजें बन गईं। उनका इससे कोई मतलब नहीं है, क्योंकि सच तो यह है…और यह बात बहुत समझ लेने जैसी है: आमतौर से लोग समझते हैं कि शराबी आदमी बुरा होता है। मैं शराबियों को भी जानता हूं और उनको भी जो शराब नहीं पीते हैं! मैंने आज तक हजारों अनुभव में यह पाया है कि शराब पीने वाला न पीने वाले से कई अर्थों में अच्छा होता है। मैंने शराब पीने वालों में जितनी दया और करुणा देखी, उतनी मैंने शराब न पीने वालों में नहीं देखी। मैंने शराब पीने वालों में जितनी विनम्रता देखी—जितनी ह्युमिलिटी, उतनी मैंने शराब नहीं पीने वालों में नहीं देखी। जितनी अकड़ मैंने देखी शराब न पीने वालों में उतनी अकड़ शराब पीने वालों में दिखाई नहीं पड़ी। लेकिन इन सारी बातों से नहीं किया है विरोध धर्म ने और यह जो सारे नेतागण समझाते फिरते हैं कि इसलिए विरोध किया है—इसलिए विरोध नहीं किया है, विरोध किया है इसलिए कि जो आदमी अपने को भुलाने का उपाय करता है वह अपने साहस को छोड़ रहा है, याद करने के, रिमेंबरिंग के, स्मृति के!
और जो आदमी इसी जन्म को भुलाने की फिकर में लगा है वह पिछले जन्मों को याद कैसे कर सकेगा। और जो पिछले जन्मों को याद नहीं कर सकता वह इस जन्म को बदलेगा कैसे! फिर एक अंधा रिपिटिशन चलता रहेगा। जो हमने बार-बार किया है, वही हम बार-बार करते चले जाएंगे। अंतहीन है यह प्रक्रिया और जब तक हमें स्मरण नहीं होगा, हम बार-बार जन्मेंगे और उन्हीं बेवकूफियों को बार-बार करेंगे जिन्हें हमने बार-बार किया है…और इसका कोई अंत नहीं! इस बोर्डम का, इस श्रृंखला का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि बार-बार हम फिर मर जाएंगे, फिर भूल जाएंगे, फिर वही शुरू हो जाएगा। एक सर्किल की तरह, कोल्हू के बैल की तरह हम घूमते रहेंगे। जिन लोगों ने इस जीवन को संसार कहा—संसार का आप मतलब समझते हैं? संसार का मतलब: व्हील, एक घूमता हुआ चाक, जिसमें स्पोक जो हैं वे फिर ऊपर चले जाते हैं, फिर नीचे, फिर ऊपर चले जाते हैं, फिर नीचे चले आते हैं।
वह जो हिंदुस्तान के राष्ट्रीय ध्वज पर व्हील बना हुआ है, वह पता नहीं हिंदुस्तान के सोचने-समझने वालों ने किस वजह से वहां रख दिया। शायद उन को पता नहीं, वे न मालूम क्या सोचते होंगे! अशोक ने उस चक्र को इसीलिए खुदवाया था अपने स्तूपों पर ताकि आदमी को पता रहे कि जिंदगी एक घूमता हुआ चाक है, कोल्हू का बैल है। उसमें हर चीज घूमकर फिर वहीं आ जाती है। फिर घूमनी शुरू हो जाती है। वह जो व्हील है, संसार का प्रतीक है। वह व्हील किसी विजय यात्रा का प्रतीक नहीं है। वह जिंदगी के रोज हार जाने का प्रतीक है। वह इस बात का प्रतीक है कि जिंदगी जो है वह एक रिपीटीटिव बोर्डम है, वह बार-बार दोहराया जाने वाला चाक है। लेकिन हर बार हम भूल जाते हैं, इसलिए दुबारा फिर बड़े रसलीन होकर दोहराने लगते हैं।
एक युवक एक युवती की तरफ बढ़ रहा हो प्रेम करने को, उसे पता नहीं कि वह कितनी बार बढ़ चुका है, कितनी युवतियों के पीछे दौड़ चुका है, लेकिन अब फिर बढ़ रहा है और सोचता है कि जिंदगी में पहली दफा यह घटना घट रही है। यह अदभुत घटना है, यह अदभुत घटना बहुत दफे घट चुकी है। और अगर उसे ही पता चल जाए तो उसकी हालत वैसी हो जाएगी, जैसे किसी आदमी की एक फिल्म को दस-पच्चीस दफा देख कर हो जाती है। अगर आप आज फिल्म देखने गए हैं तो बात और है, कल भी आपको ले जाया जाए तो आप बरदाश्त कर लेंगे। तीसरे दिन आप कहने लगेंगे, क्षमा करिए, अब मैं नहीं जाना चाहता हूं। लेकिन आपको मजबूर किया जाए, कोई पुलिसवाले पीछे लगे हैं, ये आपको ले ही जाएंगे और पंद्रह दिन वही फिल्म, तो सोलहवें दिन आप गर्दन दबा कर मरने की कोशिश करेंगे कि अब इस फिल्म को मैं नहीं देखना चाहता हूं…यह हद हो गई! पंद्रह दिन देख चुका हूं और अब कब तक देखता रहूंगा लेकिन वह पुलिस वाला पीछे लगना चाहता है कि नहीं, यह तो देखनी ही पड़ेगी। लेकिन अगर रोज फिल्म देखने के बाद अफीम खिला दी जाए और भूल जाएं आप कि मैंने फिल्म देखी थी तो दूसरे दिन फिर आप टिकट लेकर उसी फिल्म में मौजूद हो सकते हैं और बड़े मजे से देख सकते हैं।
आदमी हर बार जब शरीर को बदलता है तब उस शरीर में संजोई गई स्मृतियों का द्वार क्लोज हो जाता है, बंद हो जाता है। फिर नया खेल शुरू हो जाता है, फिर वही खेल, फिर वही बात, फिर सब वही जो बहुत बार हो चुका है। जाति स्मरण से यह स्मरण आता है कि यह तो बहुत बार हो चुका है। यह कहानी तो बहुत बार देखी जा चुकी है। यह गीत तो बहुत बार गाए जा चुके हैं। यह तो बरदाश्त के बाहर हो गई है बात। जाति-स्मरण से पैदा होती है विरक्ति, जाति-स्मरण से पैदा होता है वैराग्य, और किसी तरह वैराग्य उत्पन्न नहीं होता। वैराग्य उत्पन्न होता है जाति स्मरण से, रिमेंबरिंग ऑफ दि पास्ट, वह जो बीत गए जन्म हैं उनकी स्मृति से। और इसलिए दुनिया में वैराग्य कम हो गया है क्योंकि पिछले जन्मों का कोई स्मरण नहीं, कोई उपाय नहीं।
जिन मित्रों ने कहा है, उन्हें मैं कहूंगा कि मेरी तैयारी पूरी है। मैं जो भी कह रहा हूं उसे सिर्फ इसलिए नहीं कह रहा हूं कि मेरे लिए वह कोई सिद्धांत है। मैं जो भी कह रहा हूं एक-एक शब्द पर जिद्द के साथ प्रयोग करने की मेरी तैयारी है। और कोई भी आदमी की तैयारी हो तो मुझे बहुत खुशी होगी। कल मैंने आमंत्रण दिया था कि जो लोग संकल्प करने की हिम्मत रखते हैं, दो-चार मित्रों के पत्र आए और मुझे बहुत खुशी हुई। उन्होंने खबर दी है कि हम बहुत उत्सुक हैं और हम प्रतीक्षा में थे कि कोई हमें बुलाए और आपने पुकार दी तो हम राजी हैं। वे राजी हैं तो मुझे बहुत खुशी है। और मेरा द्वार उनके लिए खुला है, मैं उन्हें जितनी दूर ले चलना चाहूं, वे जितना चलना चाहें, उतनी दूर उन्हें ले जाया जा सकता है। इस बार जरूरत पड़ गई दुनिया को कि कम से कम थोड़े से लोग प्रबुद्ध हो सकें, अगर थोड़े से लोग भी प्रबुद्ध हो सके, तो हम मनुष्य-जाति के सारे के सारे अंधकार को तोड़ सकते हैं।
हिंदुस्तान में दो प्रयोग चलते थे पिछले पचास सालों में, शायद आपको खयाल में भी नहीं होगा कि हिंदुस्तान में दो विपरीत ढंग के प्रयोग पचास सालों में चले। एक प्रयोग गांधी ने किया, एक प्रयोग श्री अरविंद करते थे। गांधी ने एक-एक मनुष्य के चरित्र को ऊपर उठाने का प्रयोग किया। उसमें गांधी सफल होते हुए दिखाई पड़े। लेकिन बिलकुल असफल हो गए और गांधी के पीछे जिन लोगों को गांधी ने सोचा था कि इनका चरित्र मैंने उठा लिया वे बिलकुल मिट्टी के पुतले साबित हुए। जरा पानी गिरा और सब रंग-रोगन बह गया। बीस साल में रंग-रोगन बह गया, वह हम सब देख रहे थे। दिल्ली में उसके नंगे शरीर खड़े हुए हैं, उनका सब रंग-रोगन बह गया। कहीं कोई रंग-रोगन नहीं है अब। वह जो गांधी ने पोतपात कर तैयार किया था वह वर्षा में बह गया। जब तक पद की वर्षा नहीं हुई थी तब तक उनकी शक्लें बहुत शानदार मालूम पड़ती थीं और उनके खादी के कपड़े बहुत धुले हुए दिखाई पड़ते थे और उनकी टोपियां ऐसी लगती थीं कि मुल्क को ऊपर उठा लेंगी। लेकिन आज वे ही टोपियां इस योग्य हो गई हैं कि गांव-गांव में उनकी होली जलाई जाए क्योंकि वह बुर्जुआ…क्योंकि वह मुल्क के भ्रष्टाचार की प्रतीक बन गई हैं। गांधी ने एक प्रयोग किया था जिसमें मालूम हुआ कि वे सफल हो रहे हैं लेकिन बिलकुल असफल हो गए! गांधी जैसा प्रयोग बहुत बार किया गया और हर बार असफल हो गया।श्री अरविंद एक प्रयोग करते थे जिसमें वे सफल होते हुए नहीं मालूम पड़े, नहीं सफल हो सके। लेकिन उनकी दिशा बिलकुल ठीक थी। वे यह प्रयोग कर रहे थे कि क्या यह संभव है कि थोड़ी सी आत्माएं इतने ऊपर उठ जाएं कि उनकी मौजूदगी, उनकी प्रेजेंस दूसरी आत्माओं को ऊपर उठाने लगे और पुकारने लगे और दूसरी आत्माएं ऊपर उठने लगें? क्या यह संभव है कि एक मनुष्य की आत्मा ऊपर उठे और उसके साथ पूरी मनुष्य की आत्मा का स्तर ऊपर उठ जाए? यह न केवल संभव है बल्कि केवल वही संभव है, दूसरी आज कोई बात सफल नहीं हो सकती।

आज आदमी तो इतने नीचे गिर चुका है कि अगर हमने यह फिकर की कि हम एक-एक आदमी को बदलेंगे तो शायद यह बदलाहट कभी नहीं होगी, बल्कि जो आदमी उनको बदलने जाएगा उनके सत्संग में उसके खुद के बदल जाने की संभावना ज्यादा है। उसके बदल जाने की संभावना है कि वह भी उनके साथ भ्रष्ट हो जाएगा। आप देखते हैं जितने जनता के सेवक, जनता की सेवा करने जाते हैं, थोड़े दिन में पता चलता है कि वे जनता के जेब काटने वाले सिद्ध होते हैं। वे गए थे सेवा करने, वे गए थे लोगों को सुधारने, थोड़े दिन में पता चलता है कि वे जनता के जेब काटने वाले सिद्ध होते हैं। वे गए थे सेवा करने, वे गए थे लोगों को सुधारने, थोड़े दिन में पता चलता है कि लोग उनको सुधारने का विचार करते हैं। नहीं, यह नहीं हो सकता है।
दुनिया का, मनुष्य-जाति की चेतना का इतिहास यह कहता है कि दुनिया की चेतना किन्हीं कालों में एकदम ऊपर उठ गई। आपको शायद अंदाज न हो—पच्चीस सौ वर्ष पहले हिंदुस्तान में बुद्ध पैदा हुए, प्रबुद्ध कात्यायन हुआ, मक्खली गोशालक हुआ, संजय वेलट्ठी पुत्त हुआ। यूनान में सुकरात हुआ, प्लेटो हुआ, अरस्तू हुआ, प्लोटिनस हुआ। चीन में लाओत्सु हुआ, कनफ्यूशियस हुआ, च्वांगत्से हुआ। पच्चीस सौ साल पहले सारी दुनिया में कुल दस पंद्रह लोग इतनी कीमत के हुए कि उन एक सौ वर्षों में दुनिया की चेतना एकदम आकाश छूने लगी। सारी दुनिया का स्वर्ण युग आ गया, ऐसा मालूम हुआ। इतनी प्रखर आत्मा मनुष्य की कभी प्रकट नहीं हुई थी।महावीर के साथ पचास हजार लोग दीये की तरह जल गए और गांव-गांव घूमने लगे। बुद्ध के साथ दस हजार भिक्षु खड़े हो गए और उनकी रोशनी और उनकी ज्योति गांव-गांव को जगाने लगी। जिस गांव में बुद्ध अपने दस हजार भिक्षुओं को लेकर पहुंच जाते, तीन दिन के भीतर उस गांव की हवा के अणु बदल जाते। जिस गांव में वे दस हजार भिक्षु बैठ जाते, जिस गांव में वे दस हजार भिक्षु प्रार्थना करने लगते उस गांव से जैसे अंधकार मिट जाता, जैसे उस गांव में रोशनी छा जाती, जैसे उस गांव के हृदय में कुछ फूल खिलने लगते जो कभी नहीं खिले थे।

कुछ थोड़े से लोग उठे ऊपर और उनके साथ ही नीचे के लोगों की आंखें ऊपर उठीं। नीचे के लोगों की आंखें तभी ऊपर उठती हैं जब ऊपर देखने जैसा कुछ हो। ऊपर देखने जैसा कुछ भी नहीं है, नीचे देखने जैसा बहुत कुछ है। जो आदमी जितना नीचे उतर जाता है वह उतनी बड़ी तिजोरी बना लेता है। जो आदमी जितना नीचे उतर जाता है वह उतनी बढ़िया केडिलक खरीद लाता है। तो नीचे देखने जैसा बहुत कुछ है। दिल्ली बिलकुल गड्ढे में बस गई है, बिलकुल नीचे। वहां नीचे देखो, पाताल में दिल्ली है। तो जिसको भी दिल्ली पहुंचना हो उसको पाताल में उतरना चाहिए, नीचे-नीचे उतरते जाना चाहिए। ऊपर देखने जैसा कुछ भी नहीं है। किसकी तरफ देखेंगे, कौन है ऊपर! और इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है कि ऊपर देखने जैसी आत्माएं नहीं हैं जिनकी तरफ देख कर प्राणों में आकर्षण उठता है; जिनकी तरफ देखकर प्राणों में पुकार उठती है, जिनकी तरफ देख कर प्राण धिक्कारने लगते हैं अपने को कि यह दीया तो मैं भी हो सकता था, यह फूल तो मेरे भीतर भी खिल सकते थे, यह गीत तो मैं भी गा सकता था। यह बुद्ध और यह महावीर और यह कृष्ण और क्राइस्ट मैं भी हो सकता था।
एक बार यह खयाल आ जाए कि मैं भी हो सकता था। यहां लेकिन कोई हो तो जिसे देख कर यह खयाल आ जाए तो प्राण ऊपर की यात्रा शुरू कर देते हैं। और स्मरण रहे, प्राण हमेशा यात्रा करते हैं, अगर ऊपर की नहीं करते हैं तो नीचे की करते हैं। प्राण रुकते कभी नहीं हैं, या तो ऊपर जाएंगे या नीचे, रुकने जैसी कोई चीज नहीं है। ठहराव जैसी कोई चीज नहीं है। स्टेशन जैसी कोई जगह नहीं है चेतना के जगत में कि जहां आप रुक जाएं और विश्राम कर लें—या ऊपर या नीचे! जीवन प्रतिक्षण गतिमान है। ऊपर की तरफ चेतनाएं खड़ी करनी हैं। क्रमशः….

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-३