सम्मान तो वहां है जहां पद है, और पद वहां है जहां राज्य है। लेकिन सारा ढांचा हमारे चिंतन का ऐसा है कि सब पीछे है, और सबके ऊपर राज्य है, सबके ऊपर राजनीति है। राजनीतिज्ञ जाने-अनजाने शिक्षक के द्वारा अपनी विचार-स्थिति को, अपनी धारणाओं को बच्चों में प्रवेश करवाता रहता है। धार्मिक भी करता रहा है—यही! धर्म-शिक्षा के नाम पर यही चलता रहा है…कि हर धर्म यह कोशिश करता है, बच्चों के मन में अपनी धारणाओं को प्रवेश करा दे, चाहे वे सत्य हों, चाहे असत्य हों। और उस उम्र में प्रवेश करवा दे जब कि बच्चे में कोई सोच-विचार नहीं होता है। इससे घातक अपराध मनुष्य-जाति में कोई दूसरा नहीं है और न हो सकता है। एक अबोध और अनजान बालक के मन में यह भाव पैदा कर देना कि कुरान में जो है वह सत्य है या गीता में जो है वह सत्य है या भगवान हैं तो मोहम्मद हैं या भगवान हैं तो महावीर हैं या कृष्ण हैं…ये सारी बातें एक अबोध, अनजान, निर्दोष बच्चे के मन में प्रविष्ट करा देना…! इससे बड़ा कोई घातक अपराध नहीं हो सकता। लेकिन इसी भांति राजनीतिज्ञ भी कोशिश करता है।
अभी हिंदुस्तान का मामला था। आजादी की लड़ाई थी तो हिंदुस्तान के राजनीतिज्ञ कहते थे, शिक्षक और विद्यार्थी दोनों राजनीति में भाग लें क्योंकि देश की आजादी का सवाल है। फिर वे ही राजनीतिज्ञ हुकूमत में आ गए, सत्ता में आ गए तो वे कहते हैं, शिक्षक और विद्यार्थी राजनीति से दूर रहें। कम्युनिस्ट हैं, सोशलिस्ट हैं, वे विद्यार्थी और शिक्षक से कहते हैं कि नहीं, दूर रहने की कोई जरूरत नहीं है, तुम्हें राजनीति में भाग लेना चाहिए। शिक्षक और विद्यार्थी राजनीति में भाग लें। कल कम्युनिस्ट आ जाएं हुकूमत में, वे कहेंगे कि अब तुम्हें इस राजनीति में भाग लेने की कोई भी जरूरत नहीं! क्यों! जो जिस राजनीतिज्ञ के हित में है वही सत्य हो जाता है, जब जिस मौके पर…और शिक्षक और विद्यार्थी को वही सत्य है, यह समझाने की कोशिश की जाती है।
जहां प्रतियोगिता है वहां प्रेम कैसे हो सकता है। जहां काम्पिटीशन है, प्रतिस्पर्धा है, वहां प्रेम कैसे हो सकता है। प्रतिस्पर्धा तो ईर्ष्या का रूप है, जलन का रूप है। पूरी व्यवस्था तो जलन सिखाती है। एक बच्चा प्रथम आ जाता है तो दूसरे बच्चों से कहते हैं कि देखो तुम पीछे रह गए और यह पहले आ गया। आप क्या सिखा रहे हैं? आप सिखा रहे हैं कि इससे ईर्ष्या करो, प्रतिस्पर्धा करो, इसको पीछे करो, तुम आगे आओ। आप क्या सिखा रहे हैं? आप अहंकार सिखा रहे हैं कि जो आगे है वह बड़ा है जो पीछे है वह छोटा है। लेकिन किताबों में आप कह रहे हैं कि विनीत बनो और किताबों में आप समझा रहे हैं कि प्रेम करो; और आपकी पूरी व्यवस्था सिखा रही है कि घृणा करो, ईर्ष्या करो, आगे निकलो, दूसरे को पीछे हटाओ और आपकी पूरी व्यवस्था उनको पुरस्कृत कर रही है। जो आगे आ रहे हैं उनको गोल्ड मेडल दे रही है, उनको सर्टिफिकेट दे रही है, उनके गलों में मालाएं पहना रही है, उनके फोटो छाप रही है; और जो पीछे खड़े हैं उनको अपमानित कर रही है।
एक छोटी सी कहानी कहूं, उससे खयाल में आए।
प्रेम तो यही कहता है, लेकिन प्रतियोगिता क्या कहती है? प्रतियोगिता कहती है, मरने वाले के पीछे हो जाना और जीने वाले के आगे हो जाना। और हमारी शिक्षा क्या सिखाती है? प्रेम सिखाती है या प्रतियोगिता सिखाती है? और जब सारी दुनिया में प्रतियोगिता सिखाई जाती हो और बच्चों के दिमाग में काम्पिटीशन और एंबीशन का जहर भरा जाता हो तो क्या दुनिया अच्छी हो सकती है? जब हर बच्चा हर दूसरे बच्चे से आगे निकलने के लिए प्रयत्नशील हो, और जब हर बच्चा हर बच्चे को पीछे छोड़ने के लिए उत्सुक हो, बीस साल की शिक्षा के बाद जिंदगी में वह क्या करेगा? यही करेगा, जो सीखेगा वही करेगा।