सम्यक संदेह सत्य की खोज में सिखाई जाने वाली पहली सीढ़ी है, धर्म की शिक्षा का शुभारंभ इससे ही होना चाहिए “ओशो”

विचार मार्ग है। विश्वास भटकाव है।

ओशो- इसीलिए मैं कहता हूं, जो कहीं भी विश्वास से बंधा है वह सोच नहीं सकता है। जो हिंदू है, वह नहीं सोच सकता है। जो जैन है, वह नहीं सोच सकता है। जो कम्युनिस्ट है, वह नहीं सोच सकता है। उसका विश्वास ही उसका बंधन है। चूंकि सोचने में विश्वास टूट भी सकता है इसलिए विश्वासी न सोचने को ही वरण कर लेता है। वह उसका सुरक्षा-कवच बन जाता है, लेकिन वह सुरक्षा-कवच वस्तुतः तो आत्महत्या ही है।
क्या विश्वास, विचार की हत्या नहीं है?
लेकिन यह हत्या जाने-अनजाने की जाती रही है। हिंदू बाप अपने बच्चे को हिंदू बनाना चाहता है, मुसलमान बाप मुसलमान। और यह भी तब जब कि बच्चा छोटा है और स्वयं सोचने-समझने में असहाय है। यह दुष्कार्य इसी समय ही किया भी जा सकता है, बाद में फिर यह करना अति कठिन है। जहां विचार और तर्क का जन्म हो चुका फिर आंखों में धूल नहीं झोंकी जा सकती है। तर्क की शक्ति व्यक्ति की आत्मरक्षा बन जाती है। इसलिए तथाकथित धार्मिक व्यक्ति तर्क के विरोध में हो तो कोई आश्चर्य नहीं है! वस्तुतः तो वे बुद्धि मात्र के विरोध में हैं।
क्योंकि जहां बुद्धि है, विचार है, तर्क है, वहां विद्रोह है—विद्रोह यानी जीवन के नये रास्तों की खोज; विद्रोह यानी ज्ञात से अज्ञात की यात्रा; विद्रोह यानी उन सीमा-रेखाओं का अतिक्रमण जहां कि प्रत्येक पुरानी पीढ़ी नई को छोड़ जाती है।
मेरे देखे तो विद्रोह की क्षमता धार्मिक चित्त की आत्मा है। क्योंकि धर्म से बड़ी कोई और क्रांति नहीं है। धर्म तो जीवन का आमूल परिवर्तन है। वह तो जड़-मूल से रूपांतरण है। इसलिए धर्म की शिक्षा अबुद्धि और अंधेपन की शिक्षा नहीं हो सकती है। वह तो गहरे से गहरी विचारणा की शिक्षा है। वह तो तीव्रतम तर्क है। वह तो ज्वलंत बुद्धिमत्ता है। और इसलिए अबोध बच्चों को बुद्धि-विरोधी मान्यताओं और धारणाओं से नहीं बांधना है। बल्कि उनकी बुद्धि को इतनी तीव्रता और गहराई देनी है कि वे सदा अपने विचार को जाग्रत और स्वतंत्र रख सकें और किसी भी मूल्य पर कभी उसे बेचने और बांधने को राजी न हों। ऐसी स्वतंत्र चेतनाएं ही उस द्वार को खोल पाती हैं जो कि सत्य का है।
स्वतंत्रता ही तो वस्तुतः सत्य का द्वार है।
इसलिए बच्चों को स्वतंत्रता दें, स्वतंत्रता का सम्मान उनके मन में जगाएं और परतंत्रता के प्रति—मन और चेतना की सभी प्रकार की दासताओं के प्रति उन्हें सचेत और सावधान करें। धर्म की शिक्षा, वास्तविक धर्म की शिक्षा यही हो सकती है।
लेकिन धर्मों की शिक्षा ऐसी नहीं है। वह तो ठीक इसके विपरीत है। वह तो दासता का ही प्रशिक्षण है। क्योंकि वह विचार की नहीं, विश्वास की पोषक है। वह आंखों की नहीं, अंधेपन की ही समर्थक है। क्योंकि वह आत्मचेतना पर नहीं, वरन परानुगमन पर ही आधृत है।
धर्मों को विचार से इतना भय क्यों है? निश्चय ही वह भय अकारण नहीं है। उसके लिए बहुत ठोस कारण हैं। सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण तो यही है कि यदि विचार जाग्रत और सक्रिय हों तो बहुत दिनों तक बहुत धर्म नहीं रह सकते हैं। धर्म तो बचेगा लेकिन धर्मों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाना सुनिश्चित है। क्योंकि विचार भी सहज प्रवृत्ति सार्वलौकिक, यूनिवर्सल सत्य की ओर है। जैसे नदियां सागर की ओर बहती हैं ऐसे ही विचार भी सार्वलौकिकता की ओर प्रवाहित होता है। विचार के निष्पक्ष अन्वेषण में जो सत्य है अंततः वही शेष रह जाता है। और सत्य अनेक नहीं हो सकते हैं, सत्य तो सदा एक है।
विज्ञान ने विचार का अनुसरण किया, इसीलिए हिंदू का और ईसाई का गणित अलग-अलग नहीं है। नहीं तो विश्वास के आधार पर तो उनके एक होने की कोई संभावना ही नहीं थी। विश्वास के डबरे बहना बंद कर देते हैं। वे अपने आप में बंद हो जाते हैं। सागर की ओर उनकी गति न होने से वे कभी एक तक नहीं पहुंच पाते हैं। स्वयं में बंद होने से ही वे अनेक हो जाते हैं।
विचार है प्रवाह। विश्वास है कुंठा।
विचार निरंतर ही स्वयं का अतिक्रमण है। विश्वास है स्वयं में बंद होना। इसलिए विचार कहीं से भी प्रारंभ हो अंततः केंद्रीय और आत्यंतिक सत्य तक ले जाता है। और विश्वास सदा ही वहां तक पहुंचने से रोक लेता है।
मैंने सुना है कि जैन-भूगोल जैसी चीजों का भी अस्तित्व रहा है, और धर्मों में ऐसी हास्यापद बातें रही हैं। क्या भूगोल भी अलग-अलग हो सकते हैं? जी हां, हो सकते हैं, यदि विश्वास उनका आधार हो। विचार जहां नहीं है, वहां है कल्पना, अनुसरण, अंधविश्वास। और ये तो प्रत्येक व्यक्ति के अलग-अलग हो सकते हैं। सत्य तो एक है लेकिन स्वप्न तो प्रत्येक के अलग-अलग ही होते हैं। यदि दो व्यक्ति चाहें भी तो भी एक ही स्वप्न को साथ-साथ नहीं देख सकते हैं।
सत्य सदा ही सार्वजनीन है क्योंकि वह स्वयं में है। वह किसी की कल्पना, स्वप्न या अनुमान नहीं है। उसे पाने के लिए व्यक्ति के पास पात्रता चाहिए। उसे देख पाने के लिए खुली और स्वस्थ आंखें चाहिए। और विचार की पूर्णता पर, विवेक के प्रकाश में ही ऐसी आंखें उपलब्ध होती हैं।
इसलिए मैं बार-बार कह रहा हूं कि बच्चों को सत्य देना है, तो विचार दो। विश्वास से मुक्त करो और विवेक दो। विचार की जाग्रत ऊर्जा ही बनेगी उनकी पात्रता, वही बनेगी उनका दर्शन। वही उन्हें ले जाएगी सत्य के उस सागर तक जो कि एक है और अद्वय है।
क्या आपको ज्ञात है कि अरस्तू जैसे व्यक्ति ने भी लिखा है कि स्त्रियों के दांत पुरुषों से कम होते हैं? यह वह कैसे लिख सका? क्या कोई स्त्री उसे उपलब्ध न थी कि वह उसके दांत गिन सकता? स्त्रियों की क्या कमी है, लेकिन उसने तो बस प्रचलित धारणा पर विश्वास कर लिया और तब खोज का प्रश्न ही न रहा। ऐसे उसकी एक नहीं दो-दो पत्नियां थीं। और नंबर एक या नंबर दो श्रीमती अरस्तू से वह मुंह खोलने को कह सकता था और दांत गिन सकता था। लेकिन नहीं, उसने संदेह ही नहीं किया तो विचार कैसे करता? और पुरुषों की इस अंधी धारणा को चुपचाप मान लिया कि स्त्रियों के दांत पुरुषों से कम होते हैं। असल में पुरुषों का अहंकार यह बात मानने को कभी राजी ही नहीं रहा है कि स्त्रियां किसी भी बात में उसके बराबर हो सकती हैं। फिर चाहे यह सवाल दांतों का ही क्यों न हो! और जब अरस्तू ने ही संदेह न किया तो और कौन संदेह करता? जब कि संदेह समस्त खोज का प्रारंभ है।
सम्यक संदेह सत्य की खोज में सिखाई जाने वाली पहली सीढ़ी है। धर्म की शिक्षा का शुभारंभ इससे ही होना चाहिए। श्रद्धा नहीं, संदेह ही धर्म का वास्तविक आधार है। संदेह आरंभ है, श्रद्धा तो अंत है। संदेह खोज है, श्रद्धा तो प्राप्ति है। इसलिए जो संदेह से प्रारंभ करता है, वह तो कभी न कभी श्रद्धा पर पहुंच ही जाता है। लेकिन जो श्रद्धा से प्रारंभ करता है वह तो कभी भी कहीं नहीं पहुंचता है। उसके पहुंचने का सवाल भी नहीं है क्योंकि उसने तो बैलों के आगे गाड़ी बांध रखी है। प्रारंभ ही से प्रारंभ संभव है। अंत आरंभ कैसे बन सकता है?
जहां संदेह नहीं है, वहां विचार नहीं है। जहां विचार नहीं है, वहां विवेक नहीं है। और जहां विवेक नहीं है, वहां सत्य नहीं है।
धर्मों ने सिखाया है विश्वास करो, संदेह नहीं। खोजो नहीं, मानो। लेकिन धर्म सिखाएगा संदेह करो, विचार करो और खोजो। क्योंकि ऐसी स्वयं की खोज से ही जो पाया जाता है, वही स्वयं को बदलता है और वही सत्य है।

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-३