तीसरा महायुद्ध होगा अंतिम, इसलिए नहीं कि फिर मनुष्य युद्ध नहीं करेगा, वरन इसलिए कि फिर मनुष्य युद्ध करने को बचेगा ही नहीं “ओशो”
ओशो- विज्ञान के लिए मनुष्य ने कितना श्रम नहीं किया है? अथक खोज से विज्ञान खड़ा हुआ है। लेकिन आग जहां थी, वहीं है, उसकी लपटें जरूर उसी मात्रा में विशाल हो गई हैं जिस मात्रा में विज्ञान ने मनुष्य के हाथों में शक्ति दे दी है। यह शक्ति उस अग्नि का ईंधन बन गई है।
अज्ञान के हाथों में शक्ति आत्मघाती हो उठे तो इसमें आश्चर्य ही क्या है? मुझे तो पिछले दो महायुद्ध मनुष्यता द्वारा सार्वलौकिक आत्मघात की पूर्ण तैयारियां ही मालूम पड़ते हैं। दो महायुद्धों में शायद दस करोड़ लोगों की हत्या हुई है और तैयारी आगे भी जारी है। तीसरा महायुद्ध होगा अंतिम।
इसलिए नहीं कि फिर मनुष्य युद्ध नहीं करेगा, वरन इसलिए कि फिर मनुष्य युद्ध करने को बचेगा ही नहीं।
स्वयं को नष्ट करने की मनुष्यता की आतुरता अकारण भी नहीं है। शायद बाह्य की एकांगी खोज से जो विफलता हाथ आई है, उसके विवाद में ही आत्मघात का यह विराट आयोजन चल रहा है। मनुष्य के हाथ सारी दौड़-धूप के बाद भी खाली के खाली हैं। जीवन ही रिक्त, अर्थहीन और खाली है। सिकंदर ने मरते समय ही जाना कि उसके हाथ खाली हैं, इसलिए मरने की जिम्मेवारी उसने स्वयं अपने ऊपर नहीं ली। शायद अब मनुष्य ने जीते-जी जो यह जान लिया है, इसलिए वह स्वयं ही अपने को मारने को तैयार है। वह मृत्यु के लिए परमात्मा को भी कष्ट नहीं देना चाहता है। जब हाथ खाली हैं, और आत्मा ही खाली है तो जीने का प्रयोजन ही क्या है…अर्थ ही क्या है…अभिप्राय ही क्या है?
जीवन है अर्थहीन, क्योंकि जीवन से मनुष्य परिचित ही नहीं है। और जिसे उसने जीवन जाना है वह निश्चित ही अर्थहीन है, क्योंकि वह जीवन ही नहीं है। जीवन आंतरिक को खोकर बाह्य की ही दौड़ हो तो निश्चित ही अर्थहीन हो जाता है। क्योंकि तब बच जाती है वस्तुएं और वस्तुएं। आत्मा को बेच कर जो इन वस्तुओं को इकट्ठा कर लेता है, वह अपने ही हाथों अपनी मृत्यु जुटा लेता है।
और बाह्य के विरोध और शत्रुता में जो आंतरिक की ओर चलता है, वह पंगु हो जाता है। क्योंकि उसका जीवन भी अंतर्द्वंद्व में शांति और संगीत को खो देता है।
और आत्मा तो केवल उन्हें ही मिलती है जो संगीत में और सौंदर्य में जीते हैं। बाह्य की शत्रुता एक भांति की कुरूपता पैदा करती है। और बाह्य का विरोध एक भांति की जड़ता ले आता है। अंतर्द्वंद्व अहंकार को तो पुष्ट करता है लेकिन इससे आत्मा उपलब्ध नहीं होती है।
जीवन है, बाह्य और अंतर के मिलने में। जीवन है बाह्य और अंतर के संगीत में। जीवन है बाह्य और अंतर के मध्य में। विरोध से, तनाव से, द्वंद्व और दमन से वह उपलब्ध नहीं होता है। वह तो उपलब्ध होता है शांति से, सरलता से, सहजता से। और शांति, सरलता और सहजता आती है सजगता से—सजगता, जीवन के प्रति सजगता,—जो है ‘उसके प्रति सजगता’—सजगता यानी अमूर्च्छा, सजगता यानी जाग्रतचित्तता। सजगता के आलोक में क्रमशः बाह्य से अंतर की ओर गति होती है। और फिर अंतर से उसकी ओर गति होती है जो न बाह्य है, न अंतर है, जो कि बस है।
इसलिए मैं कहता हूं कि निद्रा ही, मूर्च्छा ही, तंद्रा ही वह अग्नि है, जिसमें जीवन जलता और पीड़ित होता है। और सजगता, और अमूर्च्छा, होश ही वह आलोक है, जिसमें जीवन परम जीवन में परिवर्तित होता है। वह शक्ति ही जो कि निद्रा में जलाने वाली अग्नि है, जागरण में जीवनदायी आलोक बन जाती है।
मनुष्य सजग हो तो उसके हाथों में सारी शक्तियां ही मंगलदायी हैं। क्योंकि मूर्च्छा और बेहोशी के अतिरिक्त और कोई अमंगल नहीं है। शक्तियां तो सदा ही तटस्थ हैं, और निष्पक्ष हैं। उनसे क्या होगा यह उन पर नहीं, उनके उपयोग करनेवाले मनुष्य पर ही पूर्णतः निर्भर है।
धर्म में प्रतिष्ठित मानवीय चेतना के लिए विज्ञान की अग्नि भी आत्मविनाशी नरक नहीं, वरन आत्म-सृजन, स्वर्ग बन सकती है। धर्म से संयुक्त होकर विज्ञान एक बिलकुल ही अभिनव मनुष्यता का जन्म बन सकता है।
एक बादशाह ने किसी वृद्ध फकीर से पूछा था, मैं सुनता हूं कि बहुत सोना बुरा है लेकिन मुझे नींद बहुत आती है। आपकी राय क्या है? वह वृद्ध फकीर बोला था, अच्छे लोगों का सोना बुरा होता है लेकिन बुरे लोगों का सोना ही अच्छा होता है। क्योंकि वे जितनी देर जागते हैं, संसार को उतना नरक बनाने के लिए श्रमरत रहते हैं।
शांति के केंद्र पर शक्ति की परिधि शुभ होती है। किंतु अशांति के केंद्र पर तो अशक्ति ही शुभ है। धर्म के हाथों में विज्ञान शुभ है। किंतु अधर्म के हाथों में उसे कैसे शुभ माना जा सकता है? ज्ञान के साथ शक्ति शुभ है। लेकिन अज्ञान और शक्ति का मिलन तो दुर्घटना बनेगी ही! मनुष्य ऐसी ही दुर्घटना में फंस गया है। विज्ञान ने दी है शक्ति, लेकिन वह शांति कहां है, जो उसका सम्यक उपयोग कर सके? शांति नहीं होगी तो होगा विनाश। और शांति होगी तो जीवन के और सृजन के अभूतपूर्व मार्ग प्रशस्त हो सकते हैं? मनुष्य के बाहर है शक्ति और भीतर है अशांति। गणित बिलकुल सीधा और साफ है? यह संयोग ही संकट है।
अशांत और दुखी चित्त दूसरों को भी दुखी और अशांत करने में सुख का अनुभव करता है। दुखी चित्त के लिए इसके अतिरिक्त और कोई सुख होता ही नहीं है। वस्तुतः जो हमारे पास होता है उसे ही तो हम दूसरों को दे सकते हैं?
जो दुखी है, वह दूसरों को सुख में देख कर और दुख में पड़ जाता है। उसका सुख तो यही होता है कि कोई सुख में न हो। यही हो रहा है, यही होता रहा है। और दुखी, अशांत और अंधकार से भरे मनुष्य के हाथों में विज्ञान ने ऐसी शक्ति रख दी है, जो कि समग्र जीवन का विनाश भी बन सकती है।
मनुष्यता को आत्मघात के लिए पूर्ण उपकरण उपलब्ध हो गए हैं। और अब जो महामृत्यु के लिए समारोहपूर्वक तैयारी चल रही है, उसे आकस्मिक नहीं कहा जा सकता है। हम सब किस कार्य में संलग्न हैं? यह विराट श्रम किस दिशा में हो रहा है? हम किसलिए जी रहे हैं और मर रहे हैं? मृत्यु को लाने के लिए! महामृत्यु को लाने के लिए!
पहले तथाकथित धार्मिक लोग जीवन से छुटकारे के लिए व्यक्तिगत रूप से श्रम और साधना करते थे। अब विज्ञान ने सामूहिक और सार्वजनिक रूप से जीवन से छुटकारे के लिए द्वार खोल दिए हैं। इस बहती गंगा में कौन हाथ न धो लेना चाहेगा? मृत्यु के इस अदभुत समारोह में हम सभी एक-दूसरे के लिए सहयोगी और साथी हैं। जीवन के लिए जो साथी और सहयोगी नहीं हैं, वे भी एक-दूसरे को मृत्यु में भेजने के लिए स्वयं को मिटाने के लिए भी सहर्ष तैयार हैं। अदभुत है बलिदान की यह भावना, त्याग की यह वृत्ति! जीवन में जो शत्रु हैं, मृत्यु के महायज्ञ में वे सब संगी-साथी हो गए हैं।
क्या मैं कहूं कि मनुष्य विक्षिप्त हो गया है? शायद यह कहना ठीक नहीं है। क्योंकि इससे यह भ्रम पैदा होता है कि जैसे वह पहले स्वस्थ था! मनुष्य तो वैसा ही है, जैसा सदा से था। सिर्फ वे शक्तियां जो पहले उसके हाथ में नहीं थीं अब उसके हाथ में आ गई हैं, और उसने ही उसकी छिपी विक्षिप्तता प्रकट कर दी है। शक्ति और सामर्थ्य पाकर कोई पागल नहीं होता है। बस शक्ति की सुविधा पाकर जो पागलपन अप्रकट होता है वही प्रकट हो जाता है।
मनुष्य की विक्षिप्तता पूरी तरह प्रकट हो गई है। ऐसे इस उदघाटन के लिए विज्ञान के प्रति कृतज्ञ होना अत्यंत आवश्यक है। मनुष्य के सारे वस्त्र छिन गए हैं और वह बिलकुल नग्न खड़ा है। इस नग्नता में वह नष्ट भी हो सकता है और एक बिलकुल नये रूप में जन्म भी पा सकता है। स्वयं के समक्ष इस भांति नग्न खड़ा होना चेतना के नये आरोहण के लिए बिलकुल अपरिहार्य जो है! मनुष्य के ऊपर झूठे वस्त्र खतरनाक थे। झूठे वस्त्रों से तो सच्ची नग्नता बेहतर है। क्योंकि झूठे वस्त्र दूसरों को धोका देते ही हैं, स्वयं को भी धोका देते हैं।
इस आत्मवंचना के कारण ही तो आज तक मनुष्य में कोई मौलिक क्रांति नहीं हो पाई है। लेकिन अब वह क्षण आ गया है कि हम मनुष्य की विक्षिप्तता को उसके प्रकट रूप में देख सकते हैं। और जो रुग्णता प्रकट हो, निश्चय ही उससे मुक्त होने के लिए कुछ किया जा सकता है। क्रमशः….
ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-३



