बार—बार लड़के ने यह सुनकर कि मुझे पता नहीं, मुझे पता नहीं, लड़का उदास हो गया। उसके उदास चेहरे को देखकर मुल्ला ने पूछा, बेटा पूछ। दिल खोलकर पूछ। पूछेगा नहीं, तो सीखेगा कैसे? कुछ भी पता नहीं है, फिर भी पूछेगा नहीं तो सीखेगा कैसे! हम सब सिखा रहे हैं, बिना इसकी फिक्र किए कि हमें पता है या नहीं है। धार्मिक व्यक्ति इस बात से शुरुआत करता है कि मुझे पता नहीं है और अब मैं सीखने निकलता हूं। फिर वह विनम्र होगा, फिर वह झुका हुआ होगा। फिर जहं। से भी सीखने को मिल जाए, वह सीखेगा।
सीखने वालों की कमी है, इसलिए कबीर, दादू असफल चले जाते हैं। और जो हम उनसे सीखते हैं, वह शब्द हैं, ज्ञान नहीं सीखते; उनके शब्द सीख लेते हैं।
एक मित्र ने पूछा है कि मनुष्य तो अपने भाग्य को लेकर जन्मता है, तो अगर खोज भाग्य में होगी भगवान की, तो हो जाएगी। नहीं होगी, तो नहीं होगी!
सिर्फ भगवान के संबंध में यह बात और धन के संबंध में खोज जारी रखें, तो फिर बेईमानी है। धन के संबंध में खोज जारी रखें, और उसमें तो कहें कि पुरुषार्थ के बिना क्या होगा! और खोजेंगे नहीं तो मिलेगा कैसे! और जो लोग खोज रहे हैं, उनको मिल रहा है। तो ऐसे हाथ पर हाथ रखे बैठे रहे, तो गंवा देंगे। तो धन की तो खोज जारी रखें, क्योंकि धन पुरुषार्थ के बिना कैसे होगा! और जब भगवान को खोजने का सवाल आए, तब कहें कि सब भाग्य की बात है। होगा, तो हो जाएगा। नहीं होगा, तो नहीं होगा। तो फिर धोखा है, आत्मवचना है।
तो मैं मानता हूं कि अगर भाग्य को कोई पूरी तरह स्वीकार कर ले, तो उसे भगवान को खोजने की जरूरत नहीं है। भगवान ही उसे खोजेगा। लेकिन भाग्य को पूरा स्वीकार करने का अर्थ समझ लेना। फिर कुछ भी मत खोजना। फिर खोजना ही मत। फिर यह बात ही छोड़ देना कि मेरे हाथ में करने का कुछ भी है। फिर तो जो भी हो, होने देना। जो भी हो, होने देना। अपनी तरफ से कुछ करना ही मत।