चूहा मिष्ठान ले भागा। दयानंद के मन में संदेह पैदा हो गया कि जो भगवान अपनी रक्षा चूहे से नहीं कर सकता, वह मेरी रक्षा क्या करेगा? उन्होंने मूर्ति—बूर्ति फेंक दी। उसी दिन से वे अमूर्तिवादी हो गए। उस चूहे के द्वारा मिठाई का ले जाना ही आर्यसमाज का जन्म है, उसी दिन आर्यसमाज पैदा हुआ।
एक चूहा दयानंद की श्रद्धा को तोड़ दिया। श्रद्धा थी? अगर श्रद्धा होती, तो कौन तोड़ सकता है? श्रद्धा थी ही नहीं, पहले स्थान पर। ऐसे ही झूठी पूजा चल रही थी। लेकिन दयानंद को यह दिखाई नहीं पड़ा कि मेरी श्रद्धा झूठी थी। दयानंद को दिखाई पड़ा, मूर्ति व्यर्थ है। इसे थोड़ा सोचने जैसा है।
अगर दयानंद की जगह सच में कोई आस्तिक हुआ होता, तो उसने गणेशजी में तो भगवान देखा ही था, चूहे में भी भगवान देखा होता। श्रद्धा का आकाश बड़ा है। और उसने कहा होता, अरे, चूहा भगवान! तो तुम मिठाई ले चले। तो जिसको चढ़ाई थी, पहुंच गई। हम तो सोचते थे, मूर्ति मुरदा है। लेकिन मूर्ति मुरदा नहीं है। मूर्ति ने चूहे की तरफ से हाथ फैलाया और मिठाई ले ली।
सब संदेह चूहों की तरह तुम्हें कुतर देते हैं, क्योंकि तुम्हारी श्रद्धा कपड़ों जैसी है, वह तुम्हारी आत्मा नहीं है। इसलिए फिर तुम डरते हो कि कहीं कोई ऐसी बात न कह दे, जिससे तुम्हारी श्रद्धा डगमगा जाए।
सोना आग से गुजरता है, तो डरता नहीं; कचरा गुजरता है, तो डरता है। कचरा जलेगा।