सभ्यताएं भी बचपन में होती हैं, जवान होती हैं, बूढ़ी होती हैं और मरती हैं “ओशो”
ओशो– उन्नीस सौ चौबीस में एक घटना घटी। उन्नीस सौ चौबीस में जर्मनी में अणुविज्ञान के संबंध में शोध का पहला संस्थान निर्मित हुआ। अचानक एक दिन सुबह एक आदमी, जिसने अपना नाम फल्कानेली बताया, एक कागज में लिखकर कुछ दे गया। उस कागज में एक छोटी—सी सूचना थी कि मुझे कुछ बातें ज्ञात हैं, कुछ और लोगों को भी ज्ञात है, जिनके आधार पर मैं यह खबर देता हूं कि अणु के साथ खोज में मत पड़ना। क्योंकि हमारी सभ्यता के पहले और भी सभ्यताएं इस खोज में पड़कर नष्ट हो चुकी हैं, इस खोज को बन्द ही कर दें। बहुत खोज—बीन की गई उस आदमी की, कुछ पता नहीं चला।
उन्नीस सौ चालीस में हैसिनबर्ग, एक बहुत बड़ा वैज्ञानिक था जर्मनी का, जिसने बड़े से बड़ा काम अणु की खोज में किया। उस आदमी के घर फिर एक आदमी उपस्थित हुआ, जिसने फिर उसको एक चिट्ठी दी, उसमें भी फल्कानेली के ही दस्तखत थे। वह नौकर को चिट्ठी देकर बाहर ही चला गया। उस चिट्ठी में उसने हैसिनबर्ग को सूचना दी कि तुम पापी होने का जिम्मा मत लो, क्योंकि यह सभ्यता पहली नहीं है जो अणु—उपद्रव में पड़ी है। इसके पहले सभ्यताएं बहुत बार अणु के खेल में पड़ी और नष्ट हो गईं। मगर उस आदमी का पता नहीं चला
उन्नीस सौ पैंतालिस में जब पहली दफा हिरोशिमा पर एटम गिरा तो दुनिया के बाहर बड़े वैज्ञानिकों को, जिनका कि हाथ था एटम के बनाने में, फल्कानेली के दस्तखत के पत्र मिले जिसमें उसने कहा था कि देखो अभी भी रुक जाओ। हालांकि तुमने पहला कदम उठा लिया है, और पहला कदम उठाने के बाद आखिरी कदम बहुत दूर नहीं रहता। ओपिनहिमर जो अमरीका का सबसे बड़ा अणुशास्त्री था, जिसने कि अणु बनाने में बड़े से बड़ा भाग बंटाया है, उसने तत्काल उस पत्र के मिलते ही अणु आयोग से इस्तीफा दिया और उसने एक वक्तव्य दिया कि ‘we have sinned ’, हमने पाप किया है। और यह आदमी हर वक्त खबर देता रहा पर यह आदमी कौन है, इसका कोई पता नहीं है। यह आदमी कौन है? इस बात की पूरी सम्भावना है कि वह जो कह रहा है, ठीक कह रहा है। अणु के साथ खिलवाड़ सभ्यताएं पहले भी कर चुकी हैं।
हमने भी महाभारत में अणु के साथ खिलवाड़ कर लिया। उसके साथ हम बर्बाद हुए। असल में करीब—करीब ऐसा है, जैसे कि व्यक्ति बच्चा होता है, जवान होता है, और जवानी में वही भूलें करता है जो उसके बाप ने की थीं। हालांकि बाप का होकर उसको समझाता है कि इन भूलों में मत पड़ना, ये सब गड़बड़ हैं, लेकिन उसके बाप ने भी इस बूढ़े को समझायी थी यही बात। और ऐसा नहीं है कि उस बूढ़े के बूढ़े बाप को समझानेवाला बाप नहीं था, उसने भी समझाया था। पर जवानी में वही भूलें होती हैं, फिर बुढ़ापे में वही समझाहट होती है। बच्चा होता है, जवान होता है, बूढ़ा होता है, मरता है—जैसे व्यक्ति एक चक्र में दौड़कर आदी हो जाता है, ऐसे ही हर सभ्यता भी करीब—करीब एक से स्टेप उठाकर नष्ट होती है। सभ्यताएं भी बचपन में होती हैं, जवान होती हैं, बूढ़ी होती हैं और मरती हैं।
ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-३



