बचपन में हम कहीं स्वर्ग में होते हैं और बूढ़े होते-होते नरक तक पहुंच जाते हैं! यह कैसे हो सकता है कि मनुष्य परमात्मा के मंदिर में प्रविष्ट हो जाए? “ओशो”
सम्भोग से समाधि की ओर (जीवन ऊर्जा रूपांतरण का विज्ञान)
ओशो- क्या हम अपने भीतर परमात्मा को उघाड़ पाने में सफल हो सकते हैं? क्या हम वह प्रतिमा बनेंगे जहां परमात्मा की झलक मिले? यह कैसे हो सकता है–इस प्रश्न के साथ ही आज की दूसरी चर्चा मैं शुरू करना चाहता हूं। यह कैसे हो सकता है कि आदमी परमात्मा की प्रतिमा बने? यह कैसे हो सकता है कि आदमी का जीवन एक स्वर्ग बने–एक सुवास, एक सुगंध, एक सौंदर्य? यह कैसे हो सकता है कि मनुष्य उसे जान ले जिसकी कोई मृत्यु नहीं? यह कैसे हो सकता है कि मनुष्य परमात्मा के मंदिर में प्रविष्ट हो जाए?
होता तो उलटा है। बचपन में हम कहीं स्वर्ग में होते हैं और बूढ़े होते-होते नरक तक पहुंच जाते हैं! होता उलटा है। होता यह है कि बचपन के बाद जैसे रोज हमारा पतन होता है। बचपन में तो किसी इनोसेंस, किसी निर्दोष संसार का हम अनुभव करते हैं; और फिर धीरे-धीरे एक कपट से भरा हुआ, पाखंड से भरा हुआ मार्ग हम तय करते हैं। और बूढ़े होते-होते न केवल हम शरीर से बूढ़े हो जाते हैं, बल्कि हम आत्मा से भी बूढ़े हो जाते हैं। न केवल शरीर दीन-हीन, जीर्ण-जर्जर हो जाता है, बल्कि आत्मा भी पतित, जीर्ण-जर्जर हो जाती है। और इसे ही हम जीवन मान लेते हैं और समाप्त हो जाते हैं!
धर्म इस संबंध में संदेह उठाना चाहता है। धर्म एक बड़ा संदेह है इस संबंध में–कि यह आदमी की जीवन की यात्रा गलत है कि स्वर्ग से हम नरक तक पहुंच जाएं। होना तो उलटा चाहिए। जीवन की यात्रा उपलब्धि की यात्रा होनी चाहिए–कि हम दुख से आनंद तक पहुंचें, हम अंधकार से प्रकाश तक पहुंचें, हम मृत्यु से अमृत तक पहुंच जाएं। प्राणों के प्राण की अभिलाषा और प्यास भी वही है। प्राणों में एक ही आकांक्षा है कि मृत्यु से अमृत तक कैसे पहुंचें? प्राणों में एक ही प्यास है कि हम अंधकार से आलोक को कैसे उपलब्ध हों? प्राणों की एक ही मांग है कि हम असत्य से सत्य तक कैसे जा सकते हैं?
निश्चित ही सत्य की यात्रा के लिए, निश्चित ही स्वयं के भीतर परमात्मा की खोज के लिए, व्यक्ति को ऊर्जा का एक संग्रह चाहिए, कंजरवेशन चाहिए, व्यक्ति को शक्ति का एक संवर्धन चाहिए, उसके भीतर शक्ति इकट्ठी हो कि वह शक्ति का एक स्रोत बन जाए, तभी व्यक्तित्व को स्वर्ग तक ले जाया जा सकता है। स्वर्ग निर्बलों के लिए नहीं है। जीवन के सत्य उनके लिए नहीं हैं जो दीन-हीन हो जाते हैं शक्ति को खोकर। जो जीवन की सारी शक्ति को खो देते हैं और भीतर दुर्बल और दीन हो जाते हैं, वे यात्रा नहीं कर सकते। उस यात्रा पर चढ़ने के लिए, उन पहाड़ों पर चढ़ने के लिए शक्ति चाहिए। और शक्ति का संवर्धन धर्म का सूत्र है–शक्ति का संवर्धन, कंजरवेशन ऑफ एनर्जी। कैसे शक्ति इकट्ठी हो कि हम शक्ति के उबलते हुए भंडार हो जाएं?
लेकिन हम तो दीन-हीन जन हैं। सारी शक्ति खोकर हम धीरे-धीरे निर्बल होते चले जाते हैं। सब खो जाता है भीतर, रिक्तता रह जाती है एक खाली। भीतर एक खालीपन के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं छूटता। हम शक्ति को कैसे खो देते हैं?
मनुष्य का शक्ति को खोने का सबसे बड़ा द्वार सेक्स है। काम मनुष्य की शक्ति के खोने का सबसे बड़ा द्वार है, जहां से वह शक्ति को खोता है। और जैसा मैंने कल आपसे कहा, कोई कारण है जिसकी वजह से वह शक्ति को खोता है। शक्ति को कोई भी खोना नहीं चाहता है। कौन शक्ति को खोना चाहता है? लेकिन कुछ झलक है उपलब्धि की, उस झलक के लिए आदमी शक्ति को खोने को राजी हो जाता है। काम के क्षणों में कुछ अनुभव है, उस अनुभव के लिए आदमी सब कुछ खोने को तैयार हो जाता है। अगर वह अनुभव किसी और मार्ग से उपलब्ध हो सके तो मनुष्य सेक्स के माध्यम से शक्ति को खोने को कभी भी तैयार नहीं हो सकता।
क्या और कोई द्वार है उस अनुभव को पाने का? क्या और कोई मार्ग है उस अनुभूति को उपलब्ध करने का–जहां हम अपने प्राणों की गहरी से गहरी गहराई में उतर जाते हैं, जहां हम जीवन का ऊंचा से ऊंचा शिखर छूते हैं, जहां हम जीवन की शांति और आनंद की एक झलक पाते हैं? क्या कोई और मार्ग है? क्या कोई और मार्ग है अपने भीतर पहुंच जाने का? क्या स्वयं की शांति और आनंद के स्रोत तक पहुंच जाने की और कोई सीढ़ी है?
अगर वह सीढ़ी हमें दिखाई पड़ जाए तो जीवन में एक क्रांति घटित हो जाती है, आदमी काम के प्रति विमुख और राम के प्रति सन्मुख हो जाता है। एक क्रांति घटित हो जाती है, एक नया द्वार खुल जाता है।…. 20 क्रमशः
ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-३



