दूसरों के दोष ओशो- जो दूसरों के #दोष पर ध्यान देता है वह अपने दोषों के प्रति #अंधा हो जाता है। ध्यान तुम या तो अपने दोषों की तरफ दे सकते हो, या दूसरों के दोषों की तरफ दे सकते हो, दोनों एक साथ न चलेगा। क्योंकि जिसकी नजर दूसरों के दोष देखने लगती है, […]Read More
बीमारियां मारती हैं आपको हम विपरीत को मिटा नहीं सकते; एक को बढ़ा कर हम उसके विपरीत को मिटा नहीं सकते, सिर्फ बढ़ा सकते हैं। ओशो– आज जमीन पर जितनी दवाएं हैं, कभी भी नहीं थीं। लेकिन बीमारियां कम नहीं हुईं। बीमारियां बढ़ गई हैं। सच तो यह है कि नई-नई मौलिक बीमारियां पैदा हो […]Read More
प्रश्न: ओशो, संन्यास जीवन का त्याग है या कि जीवन जीने की कला? ओशो- सदियों से संन्यास जीवन का त्याग रहा है और वही भ्रांति थी, जिसके कारण संन्यास सर्वव्यापी नहीं हो सका। उसी चट्टान से टकरा कर संन्यास के फूल की पंखुरियां बिखर गईं। संन्यास कोमल फूल है और त्याग की कठोर धारणा स्वभावतः […]Read More
ओशो– नारद कहते हैं: कांताभक्ति। भक्त को अगर परमात्मा से भक्ति करनी है तो स्त्री से प्रेम सीखना पड़ेगा। फिर एक पर ही प्रतिबद्ध होना पड़ेगा। तुम्हारा प्रेम बंटा हुआ है; थोड़ा इस दिशा में, थोड़ा उस दिशा में; थोड़ी राजनीति भी कर लो, थोड़ा धन कमा लो; थोड़ा धर्म भी कर लो; थोड़ी प्रतिष्ठा […]Read More
तुम्हारा तनाव क्या है? – ओशो– सभी प्रकार के विचारों, भय, मृत्यु, दिवालियापन, डॉलर के नीचे जाने के साथ आपका तादात्म्य! तरह-तरह के डर हैं। ये आपकी टेंशन हैं। ये आपके शरीर को भी प्रभावित करते हैं। आपका शरीर भी तनावग्रस्त हो जाता है, क्योंकि शरीर और मन दो अलग-अलग अस्तित्व नहीं हैं। शरीर-मन एक […]Read More
ओश– प्रश्न है भी, प्रश्न नहीं भी है। कुछ पूछा भी है, कुछ कहा भी है। राधा मोहम्मद का प्रश्न है।‘न सोचा न समझा न सीखा न जाना मुझे आ गया खुद-ब-खुद दिल लगाना’ इस जगत में जो भी महत्वपूर्ण है वह खुद-ब-खुद आता है। इस जगत में जो व्यर्थ है वही सीखना पड़ता है। […]Read More
प्रश्न– एक और छोटा सा प्रश्न है और बहुत बढ़िया हैः एक उलझन है कि मेरे मन में चोरी करने का भाव हो उठता है, खर्च की कमी रहती है इसलिए मुझसे चोरी हो जाती है। इस बात का कृपया उपाय बतलाएं कि इस चोरी से कैसे मुक्त हुआ जाए? ओशो– बड़ी ईमानदारी की बात […]Read More
प्रश्न: भगवान श्री, कल की चर्चा पर दो छोटे प्रश्न हैं। एक मित्र पूछते हैं कि आपने वर्ण व्यवस्था के बारे में जो कहा, क्या आज वह व्यवस्था आज की स्थिति में उचित है उसे लाना? और दूसरा प्रश्न है कि आश्रमों की चर्चा आपने की और उम्र का भी विभाजन किया। संन्यास चौथी अवस्था […]Read More
ओशो- मति एक बड़ी पारिभाषिक धारणा है। तुमने सुनी कहावत कि जब परमात्मा किसी को मिटाना चाहता तो उसकी मति भ्रष्ट कर देता। मति क्या है? तुम्हारे सोचने पर निर्भर नहीं है मति। तुम तो सोच—सोच कर जो भी करोगे वह मन का ही खेल होगा। मति है मन के पार जो समझ है, उसका […]Read More
ओशो- भारत अकेला देश है जो गौ भक्त है | भारत भी पूरा नहीं सिर्फ हिंदू, ना सिख, ना इसाई, ना जैन, ना मुसलमान, ना पारसी इन सबको छोड़ दो | सिर्फ हिंदू और हिंदू ही सिर्फ भारत नहीं है | हिंदुओं की संख्या तो 20 करोड़ है बाकी 50 करोड़ लोग और भी इस […]Read More



