“ओशो: पीढ़ियों के बीच दूरी नहीं, संवाद का सेतु बनना जरूरी है”
ओशो- एक अमरीकी बूढ़ी औरत ने सत्तर साल की बूढ़ी औरत, उसने एक छोटा सा प्रयोग किया है, वह मैं आपसे कहना चाहता हूं। उसने एक चार साल के बच्चे से दोस्ती की। और उस चार साल के बच्चे के साथ दोस्त की तरह व्यवहार करने का तीन साल तक प्रयोग किया है। उसने अपने तीन साल के संस्मरण लिखे हैं वे बड़े अदभुत हैं। वह बच्चों को भी पढ़ाए जाने चाहिए और बूढ़ों को भी पढ़ाए जाने चाहिए। एक सत्तर साल की बूढ़ी औरत जब चार या पांच साल के बच्चे से दोस्ती करती है तो उसे पांच साल के बच्चे को समझना शुरू करना पड़ता है।
पांच साल का बच्चा दो बजे रात उसको उठा लेता है और कहता है, चांद बाहर बहुत अच्छा है, बाहर चलें। दोस्त है, यह बूढ़ी उसकी मां नहीं है कि इनकार कर दे। दोस्त की बात माननी पड़ती है। वह बच्चा उसे दो बजे रात बाहर रोशनी में ले गया है। वह बच्चा उसे तितलियां पकड़ने के लिए दौड़वाता है। वह दोस्त है, उसकी मां नहीं है। वह बच्चा उसे नदी में तैरने के लिए ले जाता है, वह बच्चा उसे पक्षियों के गीत भी सुनने के लिए आतुर करता है। वह उस बच्चे के साथ नाचती भी है, कंकड़-पत्थर भी बीनती है, जाकर शंख-सीपी भी बीनती है।
और तीन साल के अनुभव में उसने लिखा कि तीन साल उस बच्चे की दोस्ती ने उस बच्चे को क्या दिया वह मुझे पता नहीं, वह तो जब बच्चा लिखेगा अपने संस्मरण कभी तब पता चले, लेकिन मुझे जिंदगी दुबारा मिल गई, मैं फिर से जवान हो गई हूं, मैं फिर से बच्चा हो गई हूं। मैं अब फिर तितली में रंग देख पाती हूं। और अब मैं फिर नदी के किनारे पड़े कंकड़-पत्थरों में हीरे-मोती देख पाती हूं। और अब मैं फिर रात झींगुर की आवाज सुनने के लिए वृक्ष के पास रुक कर बैठ पाती हूं। उस बूढ़ी औरत ने लिखा है कि उस बच्चे ने जितना मुझे दिया उतना सत्तर साल की जिंदगी ने मुझे नहीं दिया था। उसके साथ दोस्ती बड़ी कीमती सिद्ध हुई।
ऐसा नहीं है कि बच्चे को सिद्ध न होगी। क्योंकि जब बूढ़ी को बच्चे से मिलेगा तो बच्चे को बूढ़ी से भी मिलने वाला है।
हम पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के कम से कम बुद्धिमान वर्ग को निकट लाने का उपाय करें। उनकी समझ एक-दूसरे के बाबत बढ़े। तो अंडरस्टैंडिंग जितनी बढ़े, अगर हम वृद्ध पीढ़ी की कठिनाई समझ सकें, उनकी कठिनाइयां हैं, उनकी कठिनाइयों का अंत नहीं हैं। ऐसा नहीं है कि वे सिर्फ जिद की वजह से अपनी पुरानी बातें बदलने को राजी नहीं हैं। अगर कोई ऐसा कहता है तो जरा जल्दी में कहता है। उनकी अपनी कठिनाइयां हैं। और पुरानी बातों पर रुकने के उनके अपने कारण हैं। उनके हजार अनुभव उन्हें कहते हैं कि जो बार-बार परीक्षित किया गया है उसी से चलना उचित है। उनका अगर हम पूरा भाव समझें, उनके अनुभव समझें, उनकी स्थिति, उनका आउट लुक समझें, तो नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी के प्रति रिबेलियस नहीं रह जाएगी, सिम्पैथिटिक हो जाएगी।
इतना ही हो सकता है, अनुगामी अब नहीं हो सकता। अब नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी की अनुगामी कभी नहीं हो सकेगी। वह इंपासिबल आकांक्षा है। सिम्पैथिटिक, सहानुभूति पूर्ण हो जाए इतना जरूरत से काफी है, जरूरत से ज्यादा है। और पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी की तरह चुस्त कपड़े पहन कर सड़क पर चलने लगेगी ऐसा भी मैं नहीं मानता हूं, जरूरत भी नहीं है, उचित भी नहीं है। लेकिन पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी के भविष्य के प्रति रिजिड न रह जाए, सख्त न रह जाए, ढांचे को बुरी तरह थोपने के लिए आतुर न रह जाए, इतनी संवेदना भर आ जाए तो काफी है।
और मैं नहीं मानता कि यह बहुत कठिन है। कोई बाप अपने बेटे को बिगाड़ने को उत्सुक नहीं है। और अगर बिगाड़ता भी है तो बनाने की आकांक्षा में ही बिगाड़ता है। और अगर कभी उसे पता चल जाए कि वह जो ढांचे थोप रहा है वे गलत हो गए हैं, अब वे सार्थक नहीं हैं, तो वह ढांचे थोपने के लिए तैयार नहीं होगा। और कोई बेटा अपने बाप को दुख पहुंचाने के लिए आतुर नहीं होता, लेकिन जो वह करता है उससे जाने-अनजाने दुख पहुंच जाता है। काश उसे पता चल जाए और ये सारी चीजें साफ हो जाएं, तो हमारी सहानुभूति बढ़े, तो हम निकट आ सकते हैं।
पूछा हैः फासला कैसे कम हो? सहानुभूति कैसे बढ़े?
उससे फासला कम होगा। और सहानुभूति बिल्कुल सूखती जा रही है। क्योंकि हम एक-दूसरे को जब तक न जानें, तब तक सहानुभूति हो भी नहीं सकती। तो कभी हमें इन दोनों पीढ़ियों को निकट लाएं और कभी इन दोनों पीढ़ियों को एक-दूसरे की जगह बिठालने की भी कोशिश करें। जैसे बूढ़ी पीढ़ी को यहां बुलाएं और उनसे कहें कि आप बूढ़ी पीढ़ी के खिलाफ बोलें। और नई पीढ़ी को बुलाएं और उससे कहें कि यहां तुम नई पीढ़ी के खिलाफ क्या-क्या बोल सकते हो वह बोलो। एक-दूसरे के जूतों में खड़े करने की भी जरूरत है। तभी हमें पता चलता है कि दूसरे के जूते में कांटा चुभ रहा है।
हमें पता ही नहीं चलता कि दूसरे के जूते में क्या तकलीफ है? उसके जूते में पैर डालना पड़ता है। बच्चों को बूढ़े की जगह थोड़ा खड़ा करना पड़ेगा, बूढ़ों को बच्चों की जगह थोड़ा खड़ा करना पड़ेगा। और शिक्षण संस्थाएं यह प्रयोग कर सकती हैं। और अभी देर नहीं हो गई, अभी सिर्फ शुरुआत है पागलपन की, अगर यह बढ़ता चला गया तो बहुत देर हो जाएगी। और फिर सुधारना रोज कठिन होता चला जाएगा।
मैं जानता हूं कठिनाइयां बहुत हैं, लेकिन कठिनाइयां प्रोग्रेसिव हैं, यह भी ध्यान में रहे, वे रोज बढ़ रही हैं। इसलिए जितने जल्दी उन पर आक्रमण हो जाए उतना ही आसान पड़ेगा, जितनी बीमारियां बढ़ जाएंगी उतनी ही कठिनाई होती चली जाएगी। बहुत संभव है कि धीरे-धीरे बूढ़े और बेटे एक-दूसरे की भाषा ही समझना बंद कर दें। अभी भी काफी दूर तक भाषा समझाना मुश्किल हो गया है। वह कठिन होता जा रहा है। इस कठिनाई को मिटाने के लिए हम उपयोगी हो सकते हैं। लेकिन हम नहीं हो पाते। हम नहीं हो पाते वह हम इसलिए नहीं हो पाते कि हम में से ऐसे लोग बहुत कम हैं जिनको हम लिंक कह सकें, जिनको हम कह सकें कि जो न तो बूढ़े हैं और न बच्चे हैं।
लेकिन शिक्षक ऐसा काम कर सकता है। वह लिंक जनरेशन उसे मैं मानता हूं। शिक्षक का काम ही यही है कि वह बूढ़े के ज्ञान को बच्चों तक पहुंचा दे और बच्चों की संभावनाओं को बूढ़ों तक पहुंचा दे। शिक्षक का उपयोग ही यही है। अब तक यह नहीं था। अब तक एक काम था शिक्षक के हाथ में कि बूढ़े का जो ज्ञान है वह बच्चों को पहुंचा दे, कनवे कर दे। कहीं ऐसा न हो कि बूढ़ों का ज्ञान बूढ़ों के साथ मर जाए। इसलिए शिक्षक विकसित किया गया था कि वे बूढ़े के अनुभव को वह बच्चों तक पहुंचाने का काम कर दे। पुरानी पीढ़ी ने जो जाना है, खोजा है वह मर न जाए, बच्चों तक पहुंच जाए। यह काम शिक्षक ने अब तक भलीभांति पूरा किया है। अब शिक्षक पर एक नया दायित्व भी आ रहा है। और वह यह है कि वह बच्चों की जो नई संभावनाएं हैं, पोटेंशिएलिटीज हैं उनको भी बूढ़ों तक पहुंचा दे। अब यह बिल्कुल दूसरा काम है जो अब तक शिक्षक के ऊपर नहीं था। अब तक शिक्षक वन-वे ट्रैफिक का काम कर रहा था। वह बूढ़े से बच्चे तक लाने का काम कर रहा था।
बच्चों से बूढ़ों तक ले जाने का काम शिक्षक ने अब तक नहीं किया था। अब शिक्षक वन-वे ट्रैफिक नहीं रहेगा, डबल-वे ट्रैफिक हो जाएगा। और शिक्षक अगर यह काम करे तो मैं नहीं मानता हूं कि दूरी ज्यादा दिन टिक सकती है। दूरी मिटाई जा सकती है। लेकिन शिक्षक यह काम नहीं करता; या तो शिक्षक नई पीढ़ी के साथ हो जाता या शिक्षक पुरानी पीढ़ी के साथ हो जाता है।
शिक्षक को किसी पीढ़ी के साथ होने की जरूरत नहीं है। शिक्षक का मतलब ही यही है कि वह किसी पीढ़ी के साथ नहीं है, वह लिंक जनरेशन है, वह बीच की जोड़ने वाली पीढ़ी है। वह सेतु है, ब्रिज है। और अगर ब्रिज कहे कि मैं इस किनारे के पक्ष में हुआ जाता हूं, तो ब्रिज नहीं रह जाएगा। और अगर ब्रिज कहे कि मैं उस किनारे पर हुआ जाता हूं, तो फिर ब्रिज नहीं रह जाएगा। ब्रिज को दोनों किनारों पर रहना पड़ेगा और दोनों किनारों से मुक्त भी रहना पड़ेगा। तभी ब्रिज दोनों किनारों के बीच आवागमन बन जाता है। इसलिए शिक्षण संस्थाएं जो उन्होंने अतीत में किया है उससे भी बड़ा काम उनके हाथ में भविष्य में है। और शिक्षक जो अब तक किया है उससे भी कीमती काम उसके हाथ में भविष्य में है। लेकिन यह तो मैं फिर कभी आऊं तो इस पर विस्तार से आपसे बात कर सकूं।
क्रमशः…..21
ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-3



