“भारत का मन लोकतांत्रिक नहीं, इसलिए राजनीति बीमार है” — ओशो

 “भारत का मन लोकतांत्रिक नहीं, इसलिए राजनीति बीमार है” — ओशो

ओशो – अगर भारत के लिए कभी भी एक स्वस्थ राजनीति को जन्म देना हो, तो भारत की इस पुरानी धारणा को बिलकुल मिट्टी में फेंक देना, आग में डाल देना, पानी में डुबा देना। यह धारणा नहीं मिटेगी, तो भारत के लिए सौभाग्य का उदय नहीं हो सकता है–एक बात।
दूसरी बात आपसे कहना चाहता हूं, कि भारत का पूरा का पूरा अतीत नाॅन-डेमोक्रेटिक है। भारत का दिमाग लोकतांत्रिक नहीं है। भारत का दिमाग अत्यधिक अलोकतांत्रिक है। भारत की पूरी की पूरी परंपरा मनुष्य को समान स्वीकार नहीं करती है। नहीं तो शूद्र और ब्राह्मण असंभव हो जाते। भारत की पूरी धारणा आदमी-आदमी के बीच वर्गों, वर्णों को स्वीकार करती है। एक आदमी जन्म से ही नीचा है और एक आदमी जन्म से ही ऊंचा है, ऐसी हमारी मान्यता है। यह मान्यता बड़ी खतरनाक है। यह कुछ लोगों को पैदायशी गुलाम बना देती है। और कुछ लोगों को पैदाइशी मालिक होने का भ्रम दे देती है। लोकतंत्र की जो हम नई रचना करने में लगे हैं, उसके विपरीत है यह सारी धारणा। लोकतंत्र प्रत्येक व्यक्ति को बराबर मूल्य देता है। जन्म से नहीं तय करता है कि कौन छोटा है, कौन बड़ा है! धन से तय नहीं करता, कौन छोटा है, कौन बड़ा! पद से तय नहीं करता है, कौन छोटा है, कौन बड़ा है!
प्रत्येक व्यक्ति बराबर है। ऐसे लोकतंत्र की संरचना में हम लगे हों और हमारे पूरे माइंड की, हमारी पूरी की पूरी संस्कृति, हमारे मन की पूरी आधारशिलाएं एंटी-डेमोक्रेटिक हों, लोकतंत्र विरोधी हों तो बड़ी अड़चन हो जाएगी। मन तो हमारे पास लोकतंत्र विरोधी है, लोकतंत्र का हम निर्माण कर रहे हैं। तो लोकतंत्र की बातें करते हैं, भीतर हमारे मन में लोकतंत्र कहीं भी नहीं है। इसलिए जो आदमी भी सत्ता पर बैठ जाता है वही पागल हो जाता है, वही तानाशाह होने की कोशिश में संलग्न हो जाता है। वही डिक्टेटोरियल हो जाने की कोशिश में संलग्न हो जाता है।
गद्दी पर बैठते ही इस मुल्क में कोई आदमी लोकतांत्रिक नहीं रह जाता। लोकतांत्रिक आदमी ही नहीं है। जब तक ताकत नहीं है, तब तक वह हाथ जोड़ कर आपके द्वार पर खड़ा होता है। जैसे ही ताकत आती है, वह आपको पहचानना बंद कर देता है। यह बड़ी अजीब बात है। और अगर यह बात जारी रहती है, तो भारत आज नहीं कल, किसी न किसी तरह की ताना शाही में फंस जाने को आबद्ध होगा।
आज जो दिल्ली में हो रहा है, वह किसी आने वाली तानाशाही की सूचनाएं हैं। वह आज नहीं कल, इस वर्ष नहीं अगले वर्ष, हम उसी गड्ढे में गिरेंगे, जहां दुनिया के सभी लोकतंत्रों के गिरने का डर होता है। हमारा डर सबसे ज्यादा है। हमारा डर सबसे ज्यादा इसलिए है कि हमने स्वीकार ही यह किया है कि राजा को हम मानते थे भगवान! जो देश राजा को भगवान मानता रहा हो–अब भी उसके मन में वही भाव है। भाव कहीं खो नहीं गया है, और आदमी आदमी के बीच समानता की हमारी कोई दृष्टि नहीं है।
तो बहुत खतरा है इस बात का–कि आज नहीं कल, लोकतंत्र की हत्या हो जाए। और शक्ति के पीछे अंधे लोग किसी भी क्षण हत्या कर सकते हैं। वे लोकतांत्रिक तभी तक हैं, जब तक लोकतंत्र उन्हे सत्ता तक पहुंचाए। सत्ता में पहुंचते ही उनका लोकतंत्र विदा हो जाता है। किसी ने कहा–मुझे लगता है, भारत में सही हो जाएगा। शायद किसी ने कहा है–लोकतंत्र तानाशाहों को चुनने की एक प्रक्रिया है! लोकतंत्र भी तानाशाहों को चुनने की एक प्रक्रिया है? तानाशाह भी आपकी मर्जी से चुने जाएं ऐसी प्रक्रिया है! अगर लोकतंत्र का यही मतलब हो, तो भारत में वह दिखाई पड़ता है। और जो संघर्ष हमें दिखाई पड़ रहा है सब तरफ, वह हमारे भीतर मनों में जो उपद्रव है, कांफ्लिक्ट है–मन है एंटी-डेमोक्रेटिक! और व्यक्तित्व हम देश का बनाना चाहते हैं–लोकतांत्रिक!
नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। लोकतांत्रिक व्यक्तित्व तभी बन सकता है जब भीतर मन भी लोकतांत्रिक हो! भारत का पूरा मन बदल जाए, तो भारत की राजनीति स्वस्थ, सुंदर, सुखद हो सकती है। और वह तब सत्ता का आग्रह और दौड़ ही नहीं रह जाएगी। भारत सदा व्यक्ति का पूजक है और जो कौमें भी व्यक्ति की पूजा करती है, वह लोकतांत्रिक नहीं हो सकतीं। व्यक्ति की पूजा का मतलब ही यह है, कि एक व्यक्ति महान है और दूसरे लोग हीन हैं। एक व्यक्ति महात्मा है, दूसरे लोग हीन-आत्मा हैं। एक भगवान है, दूसरे लोग साधारण हैं। व्यक्ति की पूजा करने वाली कोई कौम, कभी लोकतांत्रिक नहीं हो सकती क्योंकि लोकतंत्र की घोषणा यही है कि कोई महान नहीं है, कोई छोटा नहीं है, सब समान हैं।
समानता का यह भाव हमारे भीतर बिलकुल नहीं है। हम सदा से पैर छूते रहे हैं, हम सदा से सिर झुकाते रहे हैं, हम सदा से किसी को बड़ा और किसी को छोटा मानते रहे हैं। यह छोटा और बड़ा मानने की, हमारी जो अब तब की पूरी-पूरी कल्पना और धारणा रही है, वही धारणा आज भी काम कर रही है। इसीलिए तो एक आदमी राजनैतिक पद पर खड़ा हो जाए, तो भगवान हो जाता है। सारे अखबार उसकी खबरों से भर जाते हैं, सारी खुशियां उसको मिल जाती हैं। फिर मुल्क में कोई नहीं रहता, वही रह जाता है। पद से वह आदमी नीचे उतरा और वह बिलकुल भूल जाता है; उसका कोई पता नहीं चलता। राधाकृष्णन कहां खो गए? पता लगाना मुश्किल है। कहां रहते हैं? यह भी पता लगाना मुश्किल है। एक आदमी सत्ता से नीचे उतरा, कि गया; वह हमारे लिए फिर भगवान नहीं रह गया। सत्ता पर पहुंचा कि एकदम भगवान हो जाता है।
यह जो हमारी स्थिति रही और हम व्यक्ति को इस भांति सत्ता पर बल देते रहे, और पद को इतना मूल्य देते रहे; तो फिर इस मुल्क में स्वस्थ वातावरण निर्मित होना मुश्किल हो जाएगा। मुझे लगता है, कि हम शायद सर्वाधिक रूप से पद-पीड़ित समाज हैं। पद सब कुछ है। पद से हीन व्यक्ति की कोई हमें चिंता और विचार नहीं है। अगर ऐसा होगा, तो सभी एंबीशियस और महत्वाकांक्षी लोग पदों की तरफ दौड़ने लगेंगे।
आज कोई आदमी अच्छा शिक्षक नहीं होना चाहता। क्यों हो? शिक्षकों के दिवस पर मैं दिल्ली बोलने गया था। तो मैंने शिक्षकों से कहा कि मैं बहुत हैरान हूं। राधाकृष्णन शिक्षक थे और राष्ट्रपति हो गए; इसीलिए तुम शिक्षक-दिवस मना रहे हो? मुझे तो समझ नहीं आता कि इसमें क्या फर्क है? मैंने उनसे प्रार्थना की, जब कोई राष्ट्रपति शिक्षक हो जाए तब तुम शिक्षक-दिवस मनाना। अभी तो शिक्षक-दिवस मनाने जैसा कुछ भी नहीं लगता है।
एक शिक्षक राजनीतिज्ञ हो जाए, तो यह शिक्षक का अपमान हुआ कि सम्मान? एक राजनीतिज्ञ शिक्षक हो जाए और कहे, कि अब दिल्ली छोड़ता हूं और जाकर बड़ौदा के पास एक गांव में शिक्षक हो जाऊंगा; तो तुम शिक्षक-दिवस मनाना। लेकिन शिक्षक राजनीतिज्ञ हो जाए तो शिक्षक-दिवस शुरू हो जाता है। और इसका परिणाम यह होता है कि सब शिक्षक थोड़ी-बहुत कोशिश करके कुछ न कुछ होने की दौड़ में लग जाते हैं। हिंदुस्तान का एक भी शिक्षक अब शिक्षा में उत्सुक नहीं है। कम से कम उप-शिक्षामंत्री हो जाए, शिक्षामंत्री हो जाए, इंस्पेक्टर ही हो जाए कम से कम! दौड़ जारी है।
कोई शिक्षक शिक्षा में उत्सुक नहीं है; क्योंकि शिक्षा का कोई सम्मान नहीं है। जर्मनी में कोई किसी शिक्षक को कहे कि चलो, मंत्री बना देते हैं; तो वह कहेगा, ‘पता नहीं, मैं प्रोफेसर हूं।’ वह इस तरह से कहेगा, ‘क्या मुझे अपदस्थ करना चाहते हो? नीचे उतारना चाहते हो? मैं प्रोफेसर हूं विश्वविद्यालय का! मंत्री होने का क्या सवाल है?’
कब ऐसा दिन इस मुल्क में होगा? उस दिन राजनीति स्वस्थ हो सकेगी। जब यह सारा का सारा मुल्क एक ही महत्वाकांक्षा से भर जाए पद की; तो एक बहुत ही उपद्रवपूर्ण कलह शुरू हो जाएगी। हमें बहुत दिशाओं में सम्मान बांटना चाहिए। शिक्षक का अपना सम्मान है, संगीतज्ञ का अपना है, चित्रकार का अपना है, अभिनेता का अपना है, संन्यासी का अपना है। लेकिन सब विलीन हो गया, अब किसी का सम्मान नहीं है। पद पर जो खड़ा हो, उसका ही सम्मान है। क्रमशः…….