हर दिन 30 बेटियां गायब: छत्तीसगढ़ में गुमशुदगी नहीं, सिस्टम की नाकामी की कहानी

रायपुर/ छत्तीसगढ़ में महिलाएं और मासूम बच्चियां सिर्फ लापता नहीं हो रहीं, बल्कि एक खामोश संकट का शिकार बन रही हैं। आंकड़े डराते हैं—राज्य में हर दिन औसतन 30 महिलाएं और लड़कियां गायब हो रही हैं, जिनमें 10 से 12 नाबालिग शामिल हैं। सवाल सीधा है—आखिर ये बेटियां जा कहां रही हैं?

चौंकाने वाले आंकड़े:
▪️ 3 साल में 36,662 महिलाएं और बच्चियां लापता
▪️ 7,188 आज भी बिना सुराग
▪️ 10,753 नाबालिग बालिकाएं गायब
▪️ 11,825 मामलों में बहला-फुसलाकर ले जाने की पुष्टि

सीमावर्ती जिले बने तस्करों का आसान निशाना

सरगुजा, जशपुर, बस्तर, कोरबा और बलरामपुर—ये सिर्फ जिले नहीं, बल्कि तस्करी के हॉटस्पॉट बनते जा रहे हैं। गरीबी, बेरोजगारी और पलायन ने इन इलाकों को तस्करों के लिए आसान शिकार बना दिया है।

यहां से लड़कियों को नौकरी, शादी या बेहतर जिंदगी का सपना दिखाकर बाहर ले जाया जाता है, जहां उनका इंतजार करता है शोषण, बंधुआ मजदूरी और देह व्यापार का अंधेरा।

8637 पद खाली, सुरक्षा भगवान भरोसे

जब पुलिस बल ही अधूरा हो, तो सुरक्षा कैसी? राज्य में 8,637 पद खाली पड़े हैं। गांवों में पुलिस की मौजूदगी कमजोर है और अपराधी इसका फायदा उठा रहे हैं।

“ऑपरेशन मुस्कान” जैसे अभियान चल जरूर रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि ये केवल गुमशुदा लोगों को ढूंढने तक सीमित हैं—उन्हें गायब होने से रोकने की ठोस रणनीति नदारद है।

शादी और नौकरी का जाल, हकीकत में तस्करी

आदिवासी इलाकों की लड़कियां सबसे ज्यादा निशाने पर हैं। उन्हें शादी या नौकरी का लालच देकर दूसरे राज्यों में भेजा जाता है, जहां उनकी जिंदगी एक सौदे में बदल जाती है।

बरामदगी के दावों के बीच सबसे बड़ा सवाल अब भी खड़ा है—आखिर ये सिलसिला रुकेगा कैसे?

बच्चों की गुमशुदगी में छठे नंबर पर राज्य

छत्तीसगढ़ बच्चों की गुमशुदगी के मामलों में देश में छठे स्थान पर पहुंच चुका है। एक साल में 982 बच्चे गायब, जिनमें 400 का आज तक कोई सुराग नहीं।

सबसे ज्यादा शिकार 14-17 साल की बच्चियां

किशोरियां इस नेटवर्क का सबसे आसान निशाना बन रही हैं। सोशल मीडिया, झूठे रिश्ते और प्यार के जाल के जरिए उन्हें फंसाया जा रहा है और फिर धकेल दिया जाता है एक अंधेरी दुनिया में।

अब अपहरण नहीं, भरोसे का जाल

तस्करी का तरीका बदल चुका है। अब जबरदस्ती नहीं, बल्कि भरोसा जीतकर जाल बुना जा रहा है। सुनहरे सपने दिखाकर परिवारों को ठगा जा रहा है और बच्चों का भविष्य छीना जा रहा है।

विशेषज्ञों की चेतावनी: यह आधुनिक गुलामी है

सामाजिक कार्यकर्ताओं के मुताबिक मानव तस्करी आज के दौर की “आधुनिक गुलामी” है, जिसका स्वरूप और खतरनाक हो चुका है। अब यह केवल गरीबी नहीं, बल्कि लालच और दिखावे की दुनिया से भी जुड़ गया है।

जशपुर और सरगुजा से लेकर दिल्ली-मुंबई तक फैला दलालों का नेटवर्क इस संकट को और गहरा बना रहा है।

जागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार

विशेषज्ञ साफ कहते हैं—जब तक पुलिस मजबूत नहीं होगी, गांवों तक खुफिया तंत्र नहीं पहुंचेगा और समाज जागरूक नहीं होगा, तब तक यह सिलसिला थमने वाला नहीं है।

जहां जागरूकता बढ़ी, वहां बदलाव दिखा—यही उम्मीद की एकमात्र किरण है।