“डिग्रियों की भीड़, भविष्य शून्य: भारतीय शिक्षा व्यवस्था से युवा, शिक्षा और भविष्य के संकट _ओशो

ओशो- रूस में पिछले…स्टैलिन के मरने के बाद पूरी शिथिलता आ गई है और रूस का लड़का इनकार करता है। वह कहता है, पंचवर्षीय योजना, इसमें क्या है! और कब तक हम इस बकवास में पड़े रहेंगे। कुछ और करने को है? प्रावदा के सारे एडिटोरियल पिछले दस वर्षों से एक ही बात समझा रहे हैं कि काम करो, काम करो, ज्यादा अन्न पैदा करो। वह यह जो खबर दे रहे हैं, कुछ मामला भीतर गड़बड़ हो गया है, या तो चाबुक के बल पर उससे काम ले लिया गया है, स्टैलिन के वक्त कि उसके पीछे बंदूक लगी है। खुद स्टैलिन उन्नीस सौ अट्ठाइस के बाद कभी किसी गांव में नहीं गया। लेकिन उसकी खेतों और ट्रैक्टर के साथ फोटो और बड़े पोस्टर लगाए गए। वह कभी नहीं गया उन्नीस सौ अट्ठाइस के बाद। और लड़के को बस यही लगाए हुए हैं कि यह करो, यह करो, और लड़का ऊब गया है। सारा साहित्य रूस का बोर्डम पैदा करने वाला है। खेती और अनाज और ट्रैक्टर और बस वही, तो सारा सपना चाहिए उन पर।

हमारे साथ यह मुश्किल है, हमारे पास कोड़ा भी नहीं है और उनके पास कोड़ा भी था। वह स्टैलिन, काम न हो तो आदमी को मिटा भी सकता था। हम वह भी नहीं कर सकते हैं कि हम आदमी को मरने को मजबूर कर दें ताकि कुछ करने को मजबूर होना पड़े, वह भी हम नहीं कर सकते। हम ऐसा सपना भी नहीं देख सकते कि वह स्वेच्छा से मरने की आकांक्षा से भर जाए, और अपने को जूझा दे और कहीं लगा दे। इतना भी नहीं कर सकते, भीतर से धक्का भी नहीं दे सकते। तो हम, एक जिच पैदा हो गई है जिसमें हम खड़े हो गए हैं। इस जिच को बहुत साधारण उपायों से नहीं तोड़ा जा सकता।

इस जिच को तोड़ने के लिए हमें पूरी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में कुछ बुनियादी मुद्दे तोड़ने पड़ेंगे और हमें भारत के लिए नये इमेज देना पड़ें, नई प्रतिमाएं देना पड़ें। बुद्ध और महावीर की प्रतिमाएं इस मामले में काम नहीं देंगी। शिवाजी और प्रताप भी इस मामले में अति साधारण हैं। इस मामले में हम उनको भी बहुत ज्यादा देर तक खींच कर काम में नहीं ला सकते हैं। क्योंकि जिन मुद्दे से वे लड़े थे, वे मुद्दे बहुत बचकाने और साधारण थे। आज मामला बहुत दूसरा है, और ऐसे मामले के लिए भारत की पूरी संस्कृति को सोचकर हमें फिर से निर्धारित करने का खयाल देना पड़ेगा और जहां-जहां संस्कृति में बुनियादी भूलें हैं और जिनकी वजह से सारे उपद्रव पैदा हुए, वे हमें काट कर फेंक देने पड़ें। अनुशासन लाना हो तो भारत के चित्त को विस्तार के काम देने पड़ें। उसके साथ ही अनुशासन अपने आप शुरू होता है।

अनुशासन का मतलब, बड़ा सपना, जो युवक के मन को भा जाए और वह उससे जूझ सके। अब हम देखते हैं कि लड़के को आप भेज देते हैं पढ़ने। जैसा आप कहते हैं, ठीक कहते हैं कि वह अपने बाप के प्रति जिम्मेवारी नहीं ले रहा है, और बाप मेहनत करके पढ़ा रहा है। कांट्रैक्ट वह पूरा नहीं कर रहा है। लेकिन मजा यह है कि उस लड़के को दिखाई पड़ रहा है कि वह एम.ए. के बाद फलाॅप होने वाला है। आप यह नहीं देख रहे कि उसकी आगे है क्या, भविष्य क्या है उसके लिए? ज्यादा मौके इसी बात के हैं कि वह एम.ए. फस्र्ट क्लास लेकर दफ्तरों के सामने क्यू लगा कर खड़ा रहे और नौकरी न मिले। आगे पूरा क्या होने वाला है जिसके लिए वह युनिवर्सिटी में मेहनत करे।

मैं युनिवर्सिटी में देख कर इस बात से हैरान हुआ कि कितने लड़के हैं जो डरते हैं कि अगर हमारी शिक्षा विश्वविद्यालय की पूरी हो गई तो फिर? इसका भय ही मैंने अनुभव किया। इसके लिए भयभीत हैं लड़के कि अब इस साल एम.ए. पूरा हुआ जा रहा है, तो अगले साल के लिए हमें खड़े होना है, किसी एंप्लायमेंट आॅफिस के सामने, और क्लर्क के सिवाय कुछ भी नहीं है। वह भी मिले, तो मुश्किल है। सौ रुपये की नौकरी मिलना मुश्किल है। वह लड़का डर रहा है, पूरे मन से यह घबड़ाहट है कि दो साल और युनिवर्सिटी में किसी तरह गुजर जाएं तो दो साल मैं और लगा दूं। यानी आप जो देख रहे हैं कि पचास प्रतिशत लड़के फेल हो रहे हैं, इसमें फेल होने में भविष्य की कमी है, भविष्य कोई है नहीं।

पिछला जो आज से चालीस साल पहले लड़का मेहनत कर रहा था विश्वविद्यालय में, उसका भविष्य था। अगर वह मिडिल भी पास हो जाता तो तहसीलदार हो जाता। आज से चालीस साल पहले, तीस साल पहले, पचास साल पहले मिडिल जो था, वह बड़ी भारी पोस्ट थी। पहला लड़का जो इलाहाबाद में मैट्रिक हुआ उसका हाथी पर जुलूस निकाला गया था। सारे इलाहाबाद में मैट्रिक हुआ, उसका हाथी पर जुलूस निकाला गया था। सारे इलाहाबाद में फूल बरसाए गए कि एक लड़का मैट्रिक पास हो गया। उस लड़के को जो मैट्रिक पास होने का मजा आया होगा, वह आज किसी लड़के को पी.एचड़ी. होने में भी मजा नहीं है। और गधे पर भी नहीं बिठाएंगे, हाथी तो बहुत दूर की बात है। बल्कि जो पी.एचड़ी. हो गए हैं, हम उससे पूछेंगे कि किस मतलब से हुए?

आदमी को भविष्य चाहिए। असल में भविष्य रोज खींचता है और ताकत देता है। कल कुछ होना चाहिए जो पूरा होने वाला है और उसको पूरा होने के लिए तैयारी आती है। कल कुछ होने वाला नहीं है, तैयारी किसकी करना है। और यह तैयारी कल जाकर एकदम से बेकार हो जाने वाली है, बेकार हो जाएगी। तब तैयारी करके पता चलेगा कि कुछ नहीं हुआ। यानी तैयारी ऐसी चल रही है लड़के की कि आज शादी-विवाह का भरोसा दिला रहे हैं, और वह जान रहा है कि विवाह हो जाएगा, बैंड बज जाएंगे और दुल्हन नहीं आएगी वक्त पर और हम क्यू में खड़े हो जाने वाले हैं, कुछ हाल में होने वाला है नहीं। तो वह घर में सुस्त घूम रहा है, उसके चेहरे पर खुशी नहीं है।

हम उससे कहते हैं तुम जवान हो, तुम्हारे विवाह का वक्त है, तुम खुश नजर आओ। अब वह कहता है, हम जानते हैं कि घोड़ा तो बन जाएगा और बैंड-बाजे बज जाएंगे, दुल्हन आने वाली नहीं है। तो वह डर रहा है, वह घर के भीतर घूम रहा है कि बाहर मुझे मत निकालो। बैंड-बाजे बज रहे हैं तो कहीं देख लेंगे।

आज के पहले शिक्षा थी कम, काम था ज्यादा। भले आदमियों ने अनिवार्य शिक्षा कर दी। अनिवार्य शिक्षा करके शिक्षित तो ज्यादा पैदा कर रहे हैं और काम हम पैदा नहीं कर पा रहे हैं। शिक्षित बढ़ता जा रहा है, काम बिलकुल नहीं बढ़ रहा है। वह बिलकुल परेशानी में पड़ गया है। उससे जब हम बातें करते हैं अपनी, तो उसको हम पर क्रोध आता है बजाय हमारी बातों को पसंद करने के। और जो हमारा नेता है, उसको समझाने जाता है तो उसका मन होता है कि इसकी गर्दन दबा दूं। और वह दबा रहा है, और दस साल के भीतर हिंदुस्तान में नेता होना अपराधी होने के बराबर हो जाने वाला है। एक चोर का…जुलूस तो निकल सकेगा, नेता का नहीं निकल सकेगा। क्योंकि नेता दुश्मन मालूम पड़ रहा है। खुद तो कब्जा करके बैठ गया है अपनी जगह पर और दूसरों को त्याग का उपदेश दे रहा है। खुद तो मजा कर रहा है, अपनी चीज को बिलकुल सिक्युर्ड कर और दूसरों को कह रहा है, तुम त्याग करो देश के लिए और खुद तो त्याग कर नहीं रहा है! और कठिनाई इसकी भी है, यह जो नेता है इसके साथ हमारी भ्रांति हो गई है। इधर गांधी जी की वजह से बड़ी भ्रांतियां हुई हैं। एक तो गांधी जी ने हिंदुस्तान में जो आजादी का आंदोलन चलता था, उस आंदोलन में ऐसे आदमी पैदा किए कि जिनको त्याग की धारणा थी। क्रमशः…….

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-3