“महत्वाकांक्षा का जाल: भविष्य के पीछे भागते-भागते आज खो जाता है, “सच्ची शिक्षा वही, जो व्यक्ति को रुकना और जीना सिखाए”
ओशो- मैंने तो सुना है, एक आदमी जब मर गया, तब उसे पता चला कि मैं जिंदा था। क्योंकि जिंदगी की दौड़ में पता ही न चला, फुरसत न मिली जानने की कि मैं जिंदा हूं–भागता रहा, भागता रहा, भागता रहा। जब मर गया, तब उसे पता चला कि अरे! जिंदगी हाथ से गई। बहुतों को जिंदगी मरने के बाद ही पता चलती है कि–थी। जब तक हम जिंदा हैं, तब तक हम दौड़ने में गवां देते हैं। मेरी दृष्टि में ठीक शिक्षा उसी दिन पैदा हो पाएगी जिस दिन शिक्षित व्यक्ति गैर-महत्वाकांक्षी होगा, नाॅन-एंबीशस होगा; जिस दिन शिक्षित व्यक्ति पीछे अंतिम खड़े होने में भी राजी होगा। मैं अशिक्षित उसको कहता हूं जो प्रथम होने की दौड़ में है, क्योंकि वह नासमझ है।
मैं शिक्षित उसे कहता हूं जो अंतिम खड़े होने के लिए राजी है। अंतिम खड़े होने के लिए राजी होने का मतलब यह है कि अब दौड़ न रही। जिंदगी अब दौड़ न रही, जिंदगी अब जीना होगी। जिंदगी एक जीना है और जीना अभी होगा, कल नहीं और दौड़ सदा कल के लिए है। दौड़ने वाला हमेशा भविष्य की तरफ देखता रहता है। जब इतना धन मिलेगा तब जीऊंगा। जब इतनी बड़ी गाड़ी होगी तब जीऊंगा। जब इतना बड़ा मकान होगा तब जीऊंगा। अभी कैसे जी सकता हूं? फिर उतना बड़ा मकान बन जाता है। लेकिन जब उतना बड़ा मकान बनता है, तब तक आकांक्षाओं का जाल और आगे चला गया होता है।
अमरीका में एक अरबपति मरा, एण्ड्रू कारनेगी। जब वह मरा तो उसके पास अंदाजन दस अरब रुपयों की संपदा थी। मरने के दो ही दिन पहले एक मित्र ने उससे पूछा कि तुम तो संतुष्ट हो गए होओगे। दस अरब रुपये तुम्हारे पास हैं। उसने कहाः संतुष्ट! मेरी योजना सौ अरब रुपये की थी, मुझसे ज्यादा असंतुष्ट कोई भी नहीं है। मैं एक हारा हुआ आदमी हूं जो अपनी इच्छा पूरी नहीं कर पाया। दस अरब रुपये, उसने कहा, अभी कुछ भी नहीं है मेरे पास। उसने दस अरब रुपये इस भांति कहा, जैसे कोई दस रुपये के लिए कह रहा हो कि सिर्फ दस रुपये!
क्या हम पूछें कि अगर एण्ड्रू कारनेगी के पास सौ अरब रुपये हो जाते तो वह संतुष्ट हो जाता? जो दस अरब से संतुष्ट नहीं हुआ वह सौ अरब से संतुष्ट हो जाता? सौ अरब होते-होते उसका असंतोष हजार अरब पर पहुंच जाता। इसी की संभावना, इसी का गणित ज्यादा साफ मालूम पड़ता है।
भविष्य में जीता है महत्वाकांक्षी, और वर्तमान में है जिंदगी, और वह जीता है कल की आशा में। और जो कल की आशा में जीता है वह आज को खो देता है। और जो कल की आशा में जीता है वह आज क्रोधी रहेगा, दुखी रहेगा, पीड़ित और परेशान रहेगा। सुखी तो कल होना है। लेकिन कल कभी आता नहीं। जब आता है तब आज ही आता है। आज उसके दुखी रहने की आदत बन जाएगी और कल सुखी रहने की आशा की आदत बन जाएगी। अब यह गलत व्यवस्था जिंदगी भर उसे पीड़ित करेगी। इसी गलत व्यवस्था के कारण हमने स्वर्ग में सुख का इंतजाम किया है, मरने से बाद। हम कहते हैं, जब मर जाएंगे तब स्वर्ग में सुख होगा। जब मर जाएंगे तब मोक्ष में सुख होगा। यह महत्वाकांक्षियों की आकांक्षाएं है जिनका लाॅजिकल, तार्किक परिणाम यह हो गया है कि इस पृथ्वी पर सुख हो ही नहीं सकता। सुख तो मरने के बाद होगा। यहां तो हम दुखी ही रहेंगे। आज तो दुखी ही रहेंगे, सुख कल होगा। जिस आदमी के जीवन में इस भांति की भ्रांत धारणा बैठ गई, उस आदमी का जीवन बुनियाद से सड़ जाता है और नष्ट हो जाता है।
सुख आज है और अभी हो सकता है। लेकिन सिर्फ उस व्यक्ति के लिए हो सकता है जो भविष्य की आशा में नहीं, वर्तमान की कला में जीने का रहस्य समझ लेता है। तो मैं शिक्षित व्यक्ति उसको कहता हूं जो आज जीने में समर्थ है–अभी और यहीं। लेकिन इस अर्थ में तो शिक्षित आदमी बहुत कम रह जाएंगे। असल में हम पठित आदमी को शिक्षित कहने की भूल कर लेते हैं। जो पढ़-लिख लेता है, उसे हम शिक्षित कह देते हैं! पढ़ने-लिखने से शिक्षा का कोई संबंध नहीं है।
कबीर जैसे आदमी को भी मैं शिक्षित कहूंगा। यद्यपि वह पढ़-लिख नहीं सकता है। वह कहता है कि मैंने कागज और अक्षर नहीं जाने, लेकिन फिर भी वह आदमी शिक्षित है। क्योंकि वह परम आनंद में जीता है। उसने जीवन की कला सीख ली है। वह जान गया है जीवन की वीणा को कैसे बजाना है। वह शिक्षित है। और यह हो सकता है कि बुद्ध और महावीर अगर हमारे साथ मैट्रिक की परीक्षा में बिठाले जाएं तो पास न हो सकें। कोई पक्का नहीं है। राम ने रावण को जीत लिया, वह ठीक है। लेकिन मैट्रिक की परीक्षा भी जीत पाएं, यह कोई पक्का नहीं है। हमारे अर्थों में वे शिक्षित नहीं हैं। जीसस बिलकुल बेपढ़े-लिखे आदमी हैं और मोहम्मद निपट निरक्षर हैं। लेकिन जीवन की किसी कला को वे जानते हैं, जिनसे हम अपरिचित हैं। कुछ उन्होंने सीख लिया है जो हमें पता नहीं है।
और हम शिक्षित होंगे और आधी जिंदगी, कोई पच्चीस साल की जिंदगी आदमी शिक्षा में व्यय कर देता है और तब अचानक पाता है कि वह खाली हाथ खड़ा है और उसके पास कुछ भी नहीं है। जरूर कहीं कोई भूल हो रही है। और पहली भूल यह हो रही है कि हम भविष्य की आशाओं को सिखा रहे हैं, वर्तमान के सत्य को नहीं। भूल यह हो रही है कि हम महत्वाकांक्षा में जीने की प्रेरणा दे रहे हैं। हम जीवन की वीणा को बजाना नहीं सिखा पा रहे हैं। इस भूल के बहुत से हिस्से हैं जिनकी मैं बात करना चाहूंगा।
पहला हिस्सा तो यह है कि हमारी शिक्षा पांच साल या सात साल के बाद शुरू होती है जो कि बहुत गलत बात है। असल में मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि चार साल की उम्र में आदमी पचास प्रतिशत बातें सीख लेता है। जिंदगी भर की पचास प्रतिशत बातें चार साल की उम्र तक सीख ली जाती हैं। फिर इसके बाद पचास प्रतिशत ही सीखने को बचता है। चार साल की उम्र तक आदमी सबसे ज्यादा रिसेप्टिव और ग्राहक होता है। चार साल तक वह आधा हिस्सा सीख लेता है जिंदगी का, जिसे वह जिंदगी भर फिर कभी नहीं भूल पाता है। और हमारी शिक्षा शुरू होगी सात वर्ष में, पांच वर्ष में, जब कि आधा आदमी बन चुका। अब इस आधे बने आदमी को मिटाना और नया बनाना बहुत मुश्किल हो जाएगा। क्रमशः……
ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-3
आज जीना सीखो, कल के भ्रम में मत खो जाओ — ओशो
दौड़ते-दौड़ते जिंदगी खो जाती है
ओशो कहते हैं— मैंने सुना है, एक आदमी जब मर गया, तब उसे पता चला कि मैं जिंदा था। जिंदगी की इतनी तेज़ दौड़ में वह यह जान ही नहीं पाया कि वह जी रहा है। उसने बस भागा, भागा और भागा… और जब मरा तब समझ आया कि जिंदगी हाथ से निकल चुकी है।
बहुतों को जीवन मरने के बाद पता चलता है कि — था।
जब तक हम जिंदा रहते हैं, तब तक हम उसे दौड़ में गँवा देते हैं।
सच्ची शिक्षा महत्वाकांक्षा नहीं, जीवन का बोध है
ओशो की दृष्टि में सच्ची शिक्षा उसी दिन जन्म लेगी, जिस दिन शिक्षित व्यक्ति महत्वाकांक्षी नहीं होगा।
शिक्षित वह है जो अंतिम पंक्ति में खड़े होने के लिए भी तैयार हो, क्योंकि उसके भीतर दौड़ का पागलपन नहीं है।
जो प्रथम होने की दौड़ में लगा है, वास्तव में वही अशिक्षित है — क्योंकि वही नासमझ है।
भविष्य के सपनों में आज खो जाता है
भागता हुआ इंसान हमेशा सोचता है —
- जब इतना पैसा होगा तब जीऊंगा
- जब बड़ा मकान होगा तब जीऊंगा
- जब बड़ा पद मिलेगा तब जीऊंगा
लेकिन जब मंज़िल मिलती है, तब तक इच्छाओं का जाल और आगे खिसक चुका होता है।
अरबपति एंड्रू कारनेगी का उदाहरण
अमेरिका के अरबपति एंड्रू कारनेगी की मृत्यु के समय उसके पास लगभग 10 अरब रुपये की संपत्ति थी।
मरने के दो दिन पहले एक मित्र ने पूछा— “अब तुम संतुष्ट होगे?”
कारनेगी हँसकर बोला—
“संतुष्ट? मेरी योजना 100 अरब की थी, मैं सबसे असंतुष्ट व्यक्ति हूं। मैं हारा हुआ आदमी हूं।”
जो 10 अरब से संतुष्ट नहीं हुआ वह 100 अरब से भी नहीं होता।
महत्वाकांक्षा का कोई अंत नहीं।
सुख अभी संभव है, भविष्य में नहीं
महत्वाकांक्षी व्यक्ति भविष्य में जीता है, और जिंदगी वर्तमान में है।
जो कल की आशा में जीता है, वह आज दुख में जीता है—
क्योंकि सुख तो कल होना है, और कल कभी आता नहीं।
इसी भ्रम के कारण हमने कहा—
“मरने के बाद स्वर्ग में सुख होगा। अभी दुख ही है।”
वर्तमान में जीने वाला ही शिक्षित है
सुख आज है और अभी संभव है,
लेकिन सिर्फ उसी के लिए, जिसने वर्तमान में जीने की कला सीख ली हो।
इसलिए ओशो कहते हैं—
शिक्षित वही है जो जीवन की वीणा बजाना जानता है।
पढ़ाई शिक्षा नहीं है
हम गलती से पढ़े-लिखे व्यक्ति को शिक्षित मान लेते हैं।
लेकिन कबीर पढ़-लिख नहीं सके, फिर भी वे शिक्षित थे,
क्योंकि उन्होंने जीवन की कला सीख ली थी, परम आनंद में जीते थे।
बुद्ध, महावीर, जीसस, मोहम्मद—
अगर मैट्रिक परीक्षा में बैठा दिए जाएं तो शायद पास न हों,
लेकिन जीवन की सच्ची शिक्षा में वे पूर्ण थे।
शुरूआती शिक्षा की सबसे बड़ी भूल
मनोवैज्ञानिक कहते हैं—
चार वर्ष की उम्र तक इंसान जीवन की 50% बातें सीख लेता है।
लेकिन हमारी शिक्षा शुरू होती है पाँच या सात वर्ष में,
जबकि आधा व्यक्तित्व बन चुका होता है—
और फिर उसे बदलना लगभग असंभव हो जाता है।
निष्कर्ष
सच्ची शिक्षा वह है जो जीना सिखाए, दौड़ना नहीं।
जीवन जीतने की चीज़ नहीं, जीने की कला है।



