छत्तीसगढ़ सरकार का दोहरा रवैया!, शराब बेचकर आमदनी, फिर ‘ड्रंक एंड ड्राइव’ में जनता से वसूली — आखिर सरकार चाहती क्या है?
दुर्ग/ छत्तीसगढ़ में शासन की नीतियाँ आम जनता के बीच गहरी असमंजस की स्थिति पैदा कर रही हैं। एक ओर राज्य सरकार शराब बिक्री को खुलेआम प्रोत्साहित कर रही है, वहीं दूसरी ओर पुलिस विभाग ‘ड्रंक एंड ड्राइव’ के नाम पर मोटी रकम वसूल रहा है।
ऐसे में बड़ा सवाल यह है — क्या सरकार वास्तव में शराब के खिलाफ है या उसके पक्ष में?
सड़क पर अभियान, लेकिन शराब की दुकान हर मोड़ पर
दुर्ग जिले के जी ई रोड, भिलाई, कुम्हारी, पाटन और धमधा जैसे प्रमुख मार्गों पर पुलिस की ‘ड्रंक एंड ड्राइव’ के खिलाफ सघन कार्रवाई लगातार जारी है।
हर सप्ताह हजारों चालान काटे जा रहे हैं और लाखों रुपये जुर्माने के रूप में वसूले जा रहे हैं।
पुलिस प्रशासन का कहना है कि यह सड़क सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जरूरी कदम है। लेकिन स्थानीय नागरिकों का कहना है कि जब सरकार ही हर चौक-चौराहे पर शराब दुकानें खोल रही है, तो फिर उसी शराब सेवन को अपराध बताकर जुर्माना वसूलना कहां तक न्यायसंगत है?
राजस्व के लालच में फँसी नीति
शराब बिक्री से राज्य सरकार को हर साल हजारों करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त होता है। यही कारण है कि शराब दुकानों की संख्या लगातार बढ़ रही है — गांवों तक में सरकारी मदिरा दुकानें खुल चुकी हैं।
लेकिन यही सरकार ‘ड्रिंक एंड ड्राइव’ के नाम पर आम जनता से वसूली कर रही है।
जनता का कहना है कि यह नीति “राजस्व कमाने का दोहरा रास्ता” है — पहले शराब बेचो, फिर चालान काटो!
पुलिस के आंकड़े बोलते हैं
पिछले कुछ महीनों में दुर्ग जिले में सैकड़ों वाहन चालकों पर ड्रंक एंड ड्राइव का प्रकरण दर्ज हुआ है। अधिकांश मामलों में शराब सेवन आसपास की सरकारी दुकानों से ही की गई थी।
यानी सरकार एक ओर शराब उपलब्ध करवा रही है और दूसरी ओर उसी के उपभोक्ताओं पर सख्ती बरत रही है। यह विरोधाभासी रवैया जनता के लिए भ्रम पैदा कर रहा है।
विशेषज्ञों की राय — शराब नीति पर पुनर्विचार आवश्यक
सामाजिक कार्यकर्ताओं और सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शासन वास्तव में सड़क हादसे रोकने को लेकर गंभीर है, तो उसे पहले शराब बिक्री नीति पर नियंत्रण करना चाहिए।
सिर्फ चालान काटने से दुर्घटनाएँ नहीं रुकेंगी।
जरूरत है जनजागरूकता, संवेदनशीलता और शराब निर्भरता कम करने की ठोस नीति की।
जनता के मन में उठ रहा सवाल
आज छत्तीसगढ़ के आम नागरिकों के मन में यह सवाल गूंज रहा है —
“क्या सरकार जनता की सुरक्षा चाहती है या फिर राजस्व के लालच में जनता को भ्रमित कर रही है?”
शराब से लाभ और जुर्माने से आमदनी — दोनों ओर से फायदा उठाने की यह नीति अब जनता के गले नहीं उतर रही।
निष्कर्ष: दोहरी नीति पर उठे सवाल
छत्तीसगढ़ सरकार की यह नीति न केवल जनविरोधी प्रतीत होती है, बल्कि शासन की संवेदनशीलता और नीयत पर भी गहरे सवाल खड़े करती है।
यदि शासन वास्तव में “सड़क सुरक्षा” के लिए प्रतिबद्ध है, तो उसे सबसे पहले शराब की सहज उपलब्धता पर रोक लगानी होगी।
अन्यथा जनता यही कहेगी — “एक हाथ से शराब, दूसरे हाथ से चालान – यही है छत्तीसगढ़ सरकार की नई नीति!”



