“शिक्षा का असली मकसद आत्म-ज्ञान है, न कि सिर्फ डिग्री या नौकरी”_ ओशो
साइकोलाॅजिकल एजुकेशन…?
ओशो- एजुकेशन भर नहीं। यह तो ठीक ही है कि मनुष्य के मन के संबंध में शिक्षा हमें देनी चाहिए, और मन के संबंध में जो भी जाना गया है वह बहुत स्पष्ट रूप से प्रकट किया जाना चाहिए। बहुत हिम्मत करनी पड़े उसमें भी क्योंकि पुरानी सारी धारणाएं उसमें बाधा डालती हैं। पुरानी हजार धारणाएं बाधा डालती हैं।
मन के संबंध में जो हम जानते हैं वह हम बच्चों को नहीं सिखा पा रहे हैं। क्योंकि जो हम जानते हैं वह हमारी नीति के विपरीत पड़ता है। तो हम उसको छिपा रखे हैं। तो मन की तो पूरी शिक्षा होनी चाहिए और बच्चा स्कूल से शिक्षित होकर निकले, उसके पहले उसे साइकोएनालिसिस से भी गुजर जाना चाहिए। उसका मनोविश्लेषण भी हो जाना चाहिए। यानी प्रत्येक बच्चे को शिक्षित होने की डिग्री ही तब मिलनी चाहिए जब उसका मनोविश्लेषण भी हो गया।
लेकिन इतना ही नहीं, मैं कह रहा हूं कि साइकोएनालिसिस भी पैसिव मामला है। दूसरा आपकी करवा देगा। एक साइकोएनालिस्ट आपकी एनालिसिस कर देगा साल भर में और आपमें कुछ बातें हल होंगी इससे। कुछ बातें साफ होंगी। आप ज्यादा हलके, ज्यादा शांत आदमी बन सकेंगे। लेकिन फिर भी आप साधक नहीं बन गए! इसलिए मैं कह रहा हूं, साइकोअवेयरनेस! यानी यह एनालिसिस तो दूसरे से होगी, इसमें आप पैसिव होंगे।
साइकोअवेयरनेस का मतलब कि आप एक्टिव होंगे, पैसिव नहीं। आप कुछ करेंगे अपने मन के बाबत–डिस्कवरिंग दि सेल्फ! और इसकी सारी की सारी व्यवस्था होनी चाहिए शिक्षा में कि प्रत्येक व्यक्ति धीरे-धीरे स्वयं की खोज में आतुर और उत्सुक हो जाए और वह स्वयं को खोजने लगे। और स्कूल, होस्टल, शिक्षक, विद्यार्थी, सारी की सारी व्यवस्थाएं ऐसी होनी चाहिए जो सेल्फ डिस्कवरी में सहयोगी बनती हों, बाधक न बनती हों। इतनी स्वतंत्रता, इतनी सच्चाई, यह सब इसमें होनी चाहिए कि एक-एक व्यक्ति अपने को डिस्कवर कर सके। क्योंकि सेल्फ डिस्कवरी कठिन बात है। और अगर चारों तरफ से विरोध हो उसका तो बहुत कठिन बात है।
जब एक बच्चे को पहली दफा सेक्स का खयाल उठना शुरू होता है तो सारा समाज इसके विरोध में है, तो वह उसको दबा जाता है। वह उसे जानना भी नहीं चाहता। लेकिन जिस स्कूल में सेल्फ डिस्कवरी के लिए, जिसे शिक्षा-व्यवस्था में गुंजाइश होगी वह बच्चा आकर स्कूल में सबके सामने कह सकेगा कि ऐसा-ऐसा हो रहा है। लेकिन इस पर न कोई हंसेगा, न इसका कोई दमन,न कोई विरोध करेगा, न कोई कहेगा कि बदमाशी की बातें हैं, बंद करो, यह बात नहीं कहनी चाहिए। कहनी नहीं चाहिए, यह अशिष्ट है–ऐसा भी कोई नहीं कहेगा। उसकी बात प्रेम से, शांति से सुनी जाएगी, सहानुभूति से। और जो शिक्षक जानते हैं उस संबंध में, उसे बताएंगे।
व्यक्ति के भीतर जो भी है, उसके प्रति हमारा कोई विरोध नहीं होगा। उसकी खोज का आमंत्रण होगा। और जो बच्चे जितना खोज में अग्रसर होंगे उनका उतना सम्मान होगा और हवा ऐसी होगी कि धीरे-धीरे प्रत्येक व्यक्ति अपनी खोज में लग जाए। विश्वविद्यालय से निकलते-निकलते उसे गणित, फिजिक्स, भूगोल और इतिहास ही नहीं जानना चाहिए, इनसे भी ज्यादा महत्वपूर्ण उसका यह है कि स्वयं को जानता हुआ निकले। कम से कम उतने सूत्र जान कर निकले जिनके आधार पर वह जीवन में धीरे-धीरे अपने को खोज लेगा और एक दिन उस जगह पहुंच जाएगा जहां वह कह सके कि मैं अपने को जानता हूं। और जो व्यक्ति यहां तक न पहुंचाया जा सके, तो शिक्षा बेमानी है।
शिक्षा फिर सिर्फ आजीविका सिखा रही है। वह सिखा रही है कि तुम खाना कैसे कमा लोगे, मकान कैसे बना लोगे। इससे ज्यादा मूल्य की नहीं है। वह आत्म-ज्ञान नहीं सिखा रही है। और आत्म-ज्ञान सिखाने की पुरानी बातें भी थीं। उनका कहना कुल इतना है कि स्कूल में उपनिषद पढ़ाओ, गीता पढ़ाओ, कुरान पढ़ाओ, फलां संत के वचन पढ़ा दो, और लोगों को रटवा दो तो आत्म-ज्ञान हो जाएगा। ये सब बेवकूफी की बातें हैं। न उपनिषद पढ़ने से, न गीता पढ़ने से, न किसी संत के वचन पढ़ने से आत्म-ज्ञान होगा। आत्म-ज्ञान एक लंबी डिस्कवरी है, जो कि किन्हीं के वचन पढ़ने से नहीं हो जाएगा। पढ़ाओ, उपनिषद भी पढ़ाओ, गीता भी पढ़ाओ, लेकिन सिर्फ इसके लिए कि बच्चे जानें कि कुछ लोगों ने ऐसी बातें कहीं हैं, कुछ लोग इस खोज पर गए हैं। लेकिन इनके पढ़ लेने से उनकी खोज नहीं हो जाएगी। उनकी खोज तो एक मनोविश्लेषण, मनोजागरण और मनोसाधना–उसकी गति उनकी बढ़ती चली जाए तो होगी।
यह सारी व्यवस्था, स्कूल शिक्षण में न हो तो बड़े पैमाने पर नये मनुष्य के पैदा होने में सहयोग नहीं दिया जा सकता। फिर हम छोटे पैमाने पर व्यक्तिगत आधार पर जो कर सकते हैं, वही कर सकते हैं।
शिक्षण तो को बदलना ही पड़ेगा। क्योंकि पुराना आदमी जैसा है, वह पुरानी शिक्षा की वजह से है। नया आदमी जैसा होगा, वह नई शिक्षा की वजह से होगा। क्रमशः…..
ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-3
🕉️ ओशो: शिक्षा का असली उद्देश्य आत्म-ज्ञान है, न कि सिर्फ आजीविका
शिक्षा का अर्थ केवल जानकारी नहीं
ओशो कहते हैं — “एजुकेशन भर नहीं, यह तो ठीक है कि मनुष्य के मन के संबंध में शिक्षा हमें देनी चाहिए।”
उनके अनुसार आज की शिक्षा केवल जानकारी देती है, लेकिन मन की गहराइयों को समझने की क्षमता नहीं देती।
मन को जानने की दिशा में कदम बढ़ाना ही सच्ची शिक्षा की शुरुआत है।
वे कहते हैं —
“मन के संबंध में जो हम जानते हैं, वह हम बच्चों को नहीं सिखा पा रहे हैं, क्योंकि जो हम जानते हैं वह हमारी नीति के विपरीत पड़ता है।”
इसलिए ओशो का मानना है कि हर बच्चे को शिक्षित होने से पहले मनोविश्लेषण (Psychoanalysis) से गुजरना चाहिए।
जिस दिन किसी विद्यार्थी का मनोविश्लेषण पूरा हो जाए — तभी उसे डिग्री मिलनी चाहिए।
साइकोएनालिसिस से आगे — साइकोअवेयरनेस
ओशो स्पष्ट करते हैं कि साइकोएनालिसिस केवल एक निष्क्रिय प्रक्रिया है।
यह किसी और द्वारा किया जाता है, और व्यक्ति उसमें पैसिव (Passive) रहता है।
लेकिन सच्ची शिक्षा के लिए साइकोअवेयरनेस (Psycho-awareness) ज़रूरी है — जिसमें व्यक्ति खुद सक्रिय रूप से अपने मन को जानने की प्रक्रिया में उतरता है।
“साइकोअवेयरनेस का मतलब है कि आप एक्टिव होंगे, पैसिव नहीं।
आप कुछ करेंगे अपने मन के बाबत — डिस्कवरिंग दि सेल्फ!”
शिक्षा व्यवस्था को ऐसा बनना चाहिए जो प्रत्येक विद्यार्थी को स्वयं की खोज (Self Discovery) के मार्ग पर ले जाए।
स्कूल और शिक्षक बनें आत्म-खोज के साथी
ओशो कहते हैं,
“स्कूल, होस्टल, शिक्षक, विद्यार्थी — सभी की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जो सेल्फ-डिस्कवरी में सहयोगी बने, बाधक नहीं।”
शिक्षा में इतनी स्वतंत्रता, सत्यनिष्ठा और सच्चाई होनी चाहिए कि हर बच्चा अपने मन की गहराई को खोज सके।
सेल्फ-डिस्कवरी कठिन है, और यदि समाज इसका विरोध करे तो यह लगभग असंभव हो जाती है।
दबाव नहीं, संवाद की संस्कृति हो
ओशो बच्चों के मानसिक विकास के प्रति समाज के रवैये पर सवाल उठाते हैं।
वे उदाहरण देते हैं —
“जब एक बच्चे को पहली बार सेक्स का खयाल उठता है, तो सारा समाज उसके विरोध में खड़ा हो जाता है।”
ओशो के अनुसार सही शिक्षा व्यवस्था में बच्चा खुलकर अपनी भावनाएं व्यक्त कर सके।
शिक्षक और साथी उसे प्रेम, सहानुभूति और समझ के साथ सुनें — न कि दबाव, मजाक या शर्म से भर दें।
ऐसा वातावरण ही आत्म-खोज को संभव बना सकता है।
आत्म-ज्ञान: शिक्षा का अंतिम लक्ष्य
ओशो कहते हैं कि शिक्षा केवल गणित, विज्ञान, भूगोल या इतिहास सिखाने का माध्यम नहीं होनी चाहिए,
बल्कि उससे भी महत्वपूर्ण यह है कि विद्यार्थी स्वयं को जानने की दिशा में अग्रसर हो।
“विश्वविद्यालय से निकलते-निकलते व्यक्ति को स्वयं को जानने की दिशा में इतना सक्षम होना चाहिए कि वह कह सके — ‘मैं अपने को जानता हूं।’”
जो शिक्षा आत्म-ज्ञान की ओर न ले जाए, वह ओशो के अनुसार अधूरी और व्यर्थ है।
शिक्षा सिर्फ नौकरी नहीं, जीवन की समझ सिखाए
ओशो आधुनिक शिक्षा प्रणाली पर कटाक्ष करते हुए कहते हैं —
“आज शिक्षा सिर्फ यह सिखा रही है कि खाना कैसे कमा लोगे, मकान कैसे बना लोगे — इससे ज्यादा मूल्य की नहीं है।”
सच्ची शिक्षा वही है जो आत्म-जागरण, आत्म-समझ और आत्म-परिवर्तन की ओर ले जाए।
केवल आजीविका नहीं, बल्कि जीवन का अर्थ और दिशा सिखाए।
उपनिषद या गीता पढ़ना पर्याप्त नहीं
ओशो कहते हैं कि आत्म-ज्ञान किसी धर्मग्रंथ को रट लेने से नहीं आता।
गीता, उपनिषद या कुरान पढ़ना जरूरी है, लेकिन केवल यह जानने के लिए कि इन रास्तों पर कुछ लोगों ने खोज की थी।
सच्ची खोज व्यक्ति को स्वयं करनी पड़ती है।
“आत्म-ज्ञान एक लंबी डिस्कवरी है — जो किसी संत के वचन पढ़ने से नहीं होती,
बल्कि मनोविश्लेषण, मनोजागरण और मनोसाधना के रास्ते पर चलने से होती है।”
नई शिक्षा से ही जन्मेगा नया मनुष्य
ओशो निष्कर्ष देते हैं —
“पुराना आदमी जैसा है, वह पुरानी शिक्षा की वजह से है।
नया आदमी जैसा होगा, वह नई शिक्षा की वजह से होगा।”
इसलिए शिक्षा को बदलना ही पड़ेगा —
ऐसी शिक्षा जो स्वयं की खोज, जागरूकता और अंतःशांति को जन्म दे।
निष्कर्ष:
ओशो की दृष्टि में शिक्षा का असली उद्देश्य डिग्री नहीं, डिस्कवरी है।
ज्ञान नहीं, जागरण है।
और जब तक शिक्षा आत्म-ज्ञान की ओर नहीं ले जाती — तब तक वह अधूरी है।



