प्रत्येक व्यक्ति अनूठी कृति है परमात्मा की, और उसकी हमें स्वीकृति होनी चाहिए। और यह ध्यान होना चाहिए कि हमारी पूरी शिक्षा, हमारी पूरी संस्कृति और सभ्यता उसके भीतर जो भी छिपा है, उसे निकाल कर बाहर ले आए, उसके भीतर कुछ छिपा न रह जाए। और यह ज्वर के द्वारा नहीं, बीमारी के द्वारा नहीं, प्रतिस्पर्धा के द्वारा नहीं, बल्कि सहज प्रेम और आनंद के द्वारा उसके भीतर के सारे फूल खिल जाएं।
जब व्यक्ति की पूरी क्षमताएं विकसित होकर खिलती हैं तो वह आनंद से भर जाता है। तब उसमें फूल आ जाते हैं, तब उसमें सुगंध निकलती है, तब उसमें शांति उत्पन्न होती है। और ऐसा व्यक्ति ही फिर परमात्मा को, सत्य को खोज सकता है, जान सकता है। ऐसा मन ही फिर सत्य की कोई अनुभूति को उपलब्ध हो सकता है। इस जीवन में जो शांत है वही, और प्रगाढ़तर गहरे जीवन में प्रविष्ट हो सकता है। इस जीवन में जो अशांत है और जो प्रतिस्पर्धा में है, वह अशांत होगा ही। जो इस जीवन में शांत है, जिसका मन अपने को स्वीकार करता है, जिसका मन अपने फूलों को खिला कर आनंद और सुगंध से भर रहा है, धीरे-धीरे उसे परमात्मा की खबर खुद ही आने लगेगी, उसके आस-पास सब तरफ परमात्मा का दिग्दर्शन होने लगेगा। दुखी मनुष्य कभी भी परमात्मा को नहीं जान सकता। जब भीतर सारे…सारे आनंद के द्वार खिलते हैं, तभी व्यक्ति को चारों तरफ परमात्मा की अनुभूति होनी शुरू होती है।
शिक्षा का अंतिम आधार तो यही होना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी आत्मा की पूर्णता तक, अपनी आत्मा की अनुभूति तक पहुंच जाए। लेकिन अभी तो हालत यह है कि वह संसार में शांति और सुख भी अनुभव नहीं कर पाता। परमात्मा तो बहुत दूर की मंजिल और यात्रा हो जाती है। फिर अशांति के कारण, परेशान होने के कारण मंदिरों में जाता है, भगवान को पैसे चढ़ाता है, पुजारियों के पैर पड़ता है। यह सब व्यर्थ है, यह सब कोई मतलब नहीं है। अशांति से बचने के लिए भगवान का सहारा लेता है। इलेक्शन में हार जाता है तो फिर भगवान का सहारा लेता है। सफलता नहीं मिलती है तो फिर ताबीज बनवाता है। फिर रेसकोर्स की फिकर करता है, साधु-संन्यासियों के पैर पड़ता है।
अशांत, दुखी, प्रतिस्पर्धा में हारे-जीते, भयग्रस्त लोग, ये सारे के सारे लोग फिर धर्म की शरण में जाते हैं। वह धर्म झूठा हो जाता है। इन सबके वहां पहुंचने का कारण ही अधार्मिक है। धर्म के निकट वही पहुंच सकता है जिसने मन को सब भांति शांत किया हो, जिसका मन सब भांति द्वंद्व-शून्य हो, जिसके मन में कोई संघर्ष न हो, जिसके मन में सबके प्रति समादर और प्रेम हो, जिसके मन में सबके प्रति करुणा हो, ईष्र्या नहीं। ऐसा व्यक्ति धीरे-धीरे ही अपने आप धर्म के करीब पहुंचने लगता है, उसे किसी मंदिर में जाने की जरूरत नहीं होती। एक दिन परमात्मा खुद उसके मकान पर आ जाता है। एक दिन परमात्मा उसके कंधे पर हाथ रखता है। उसे खोजने की परमात्मा की कोई भी जरूरत नहीं होती। वास्तविक शिक्षा धार्मिक शिक्षा है। लेकिन धार्मिक शिक्षा का यह मतलब नहीं है कि आपको गीता रटवाई जाए और कुरान रटवाई जाए। इन सबसे तो खूब अधर्म दुनिया में फैला। अब इन सब को रटवाने से कुछ भी होने को नहीं है।
क्या होगा? एक-एक आदमी को सात-सात बार मारें तो भी हमारे पास इंतजाम ज्यादा है। यह इंतजाम तैयार है। और एक भी राजनीतिज्ञ का दिमाग बिगड़ जाए और दिमाग उनके पचास प्रतिशत पागल हैं। किसी भी क्षण सारी मनुष्यता को वे अपने साथ लेकर डूब सकते हैं। कौन उसको बचाएगा, किसके ऊपर जिम्मेवारी है?