सुखी और दुखी होना, न तो पुण्य और पाप से संबंधित है, सुखी और दुखी होना हमारी आकांक्षाओं के आरोपण से संबंधित है, कितने जोर से आरोपित करने की आकांक्षा में रहे! लेकिन किसी दिन डिसइलुजनमेंट आता है। पता चलता है कि कुछ आरोपण से नहीं होता है–सुबह आती है और आती है, सांझ आती है और आती है। तब भी सुबह आएगी, कुछ ऐसा नहीं है कि नहीं आएगी, तब भी सांझ आएगी लेकिन दंश चला जाएगा, पीड़ा चली जाएगी और तब जितनी सुबह ठीक से जी ली है, कोई कारण नहीं कि सांझ ठीक से क्यों न जी लें! मामला यह है कि ठीक से जिसने सुबह को पूरी तरह जी लिया है, वह तो खुद ही दोपहर होते-होते कहेंगे कि अब सांझ हो जाए। जो आदमी ठीक से जवान रह लिया है, उसके भीतर बुढ़ापे की आकांक्षा आ जाएगी। जो आदमी ठीक से जवान रह लिया है, उसके भीतर बुढ़ापे की आकांक्षा आ जाएगी। जो आदमी ठीक से जी लिया है वह मरना भी चाहता है।
नीत्शे ने बहुत अच्छी बात कही है। उसने कहा है कि जब फल पक जाता है तो गिरना चाहता है। एक दफे पक भर जाए और जब फल पक जाता है तो गिरना ही चाहता है। सिर्फ कच्चे फल घबड़ाते हैं कि कहीं गिर न जाएं और चूंकि हम जिंदगी भर कच्चे रह जाते हैं इसलिए मरने से डरते हैं। अब इस तरह चक्कर पर चक्कर पैदा होते चले जाते हैं। मरने से डरते हैं तो उस सिद्धांत को पकड़ते हैं जो कह दे कि मरोगे नहीं। मैं नहीं कह रहा हूं कि मर जाएंगे आप। मैं यह कह रहा हूं कि हम अपनी आकांक्षाएं आरोपित न करके, जो है उसे जानने की फिक्र कर लें तो बात पूरी हो जाएगी, नहीं तो नहीं पूरी होगी।
गरीबी है, बीमारी है, दुख है, शोषण है, उस सबमें भी स्वीकार कर लें। यह बहुत बढ़िया बात है, और मैं इधर जितना सोचता हूं, बहुत अजीब अनुभव करता हूं। पहली बात तो यह है कि यह कंट्राडिक्ट्री दिखाई पड़ेगा, लेकिन ऐसा है! जो व्यक्ति स्वयं के तल पर सुख-दुख को स्वीकार नहीं करता वह समाज के तल पर सब बीमारियों को स्वीकार करने वाला होता है। जैसे हमारा मुल्क है। हमने व्यक्ति के तल पर सुख-दुख कभी स्वीकार नहीं किया है। हम मोक्ष की खोज निरंतर कर रहे हैं, जहां सुख-दुख से छुटकारा हो जाए। लेकिन समाज के तल पर हमने सब स्वीकार कर लिया है। अगर यह बात दिखाई पड़े तो इससे उलटा भी सत्य है कि जो व्यक्ति स्वयं के तल पर सब स्वीकार कर लेगा वह समाज के तल पर तो कुछ स्वीकार नहीं करेगा। जो स्वयं के तल पर सब स्वीकार कर लेगा वही क्रांतिकारी हो सकता है, क्योंकि क्रांतिकारी होने में भी दुख झेलने की संभावना है निरंतर, क्योंकि क्रांति का सुख तो किसी और को मिलेगा। क्रांति का सुख क्रांतिकारी को तो मिलता नहीं। तो क्रांति सिर्फ वही कर सकता है जो दुख को स्वीकार कर सकता है।
जो व्यक्ति स्वयं के तल पर टोटल एक्सेप्टेबिलिटी में जीता है वह समाज के तल पर टोटल रिजेक्शन में जीता है। और जो व्यक्ति समाज के तल पर स्वीकार में जीता है वह अपने तल पर रिजेक्शन में जीता है, और अपने तल पर कहता है, मैं यह दुख में हूं, यह नहीं सुनूंगा, यह नहीं करूंगा, वह समाज के तल पर सब स्वीकार कर लेता है। उसका कारण है कि जो व्यक्ति, व्यक्ति के लिए सब कुछ करने की चिंता में रत है उसके लिए समाज का बोध ही पैदा नहीं होता है–यानी समाज की जो धारणा है, कांशसनेस जो है वह उसको पैदा होती है जो व्यक्ति के तल पर निपट गया–यानी अब इधर कुछ करने का मामला बचा नहीं, इधर बात खत्म हो गई, इधर मैंने मान लिया है कि जो है, है! तब मैं क्या करूंगा, आखिर मैं कुछ तो करूंगा। व्यक्ति के तल पर तो करने से मुक्त हो गए। तो वह जो सृजन की, निर्माण की, विध्वंस की ऊर्जा जो भी है मेरे पास वह जाएगी कहां! वह कहीं सक्रिय हो जाएगी।
इधर से हम इंतजाम करते हैं, उधर से कुछ बिखर जाता है, यानी मेरा मानना यह है कि पूर्ण इंतजाम कभी नहीं हो सकता। क्योंकि पूर्ण इंतजाम का कोई मतलब नहीं हो सकता। हम हमेशा ही एक तरफ इंतजाम करते हैं, दूसरी तरफ ठीक उसके विपरीत चीज खड़ी हो जाती है। क्योंकि जीवन जो है वह सदा विपरीत को पैदा कर लेता है इसलिए संतुलन में, अगर तौल हम कभी खोज सकें तो बराबर इतना ही रहेगी जितनी कभी थी। उसमें कोई फर्क नहीं पड़ेगा। यानी यह हो सकता है कि एक आदमी के पास आज फियेट कार है और आज से हजार साल पहले उसके बाप के पास बैलगाड़ी थी। बगल वाले के पास एक रथ था, अभी बगल वाले के पास एक इम्पाला है। दोनों का फासला उतना ही है जितना बैलगाड़ी और रथ का था, जितना फियेट और इम्पाला का है। वह जो अनुपात है वह उतना का उतना ही खड़ा है। रथ वाले को देख कर जितना बैलगाड़ी वाला दुखी होता था उतना इम्पाला वाले को देख कर फियेट वाला दुखी होता है। इम्पाला आ गई, बैलगाड़ी हट गई है, रथ हट गया है, लेकिन वह जो मामला है वह अपनी जगह खड़ा है।