ध्यान रहे, युवक का अनिवार्य लक्षण है, अकेले होने की हिम्मत, दि करेज टु स्टैंड अलोन

ओशो- जीवन में नग्न सत्य हैं; जिन्हें देखने में पीड़ा हो सकती है, लेकिन वे हैं। चाहे उनकी कितनी ही पीड़ा हो, उन्हें आंख खोल कर देखना पड़ेगा। क्योंकि आंख खोल कर देखने पर ही हम उन्हें रूपांतरित करने में, बदलने में, ट्रांसफर करने में भी सफल हो सकते हैं। आंख बंद कर लेने से हम अंधे हो सकते हैं लेकिन तथ्य बदल नहीं जाते। हम सारे तथ्यों को छिपा कर जी रहे हैं। क्योंकि विश्वास की एक गैर-साहसपूर्ण धारणा हमने पकड़ ली है। संदेह की साहसपूर्ण यात्रा हमारी नहीं है। इस वजह से कि साहस कम हो गया है, अकेले होने की हिम्मत हमारी कम हो गई है।और ध्यान रहे, युवक का अनिवार्य लक्षण है, अकेले होने की हिम्मत, दि करेज टु स्टैंड अलोन। वह युवक होने का एक अनिवार्य लक्षण है। हम भीड़ के साथ खड़े हो सकते हैं। जहां सारे लोग जाते हैं वहां हम जा सकते हैं। हम वहां नहीं जा सकते जहां आदमी को अकेला जाना पड़ता है। नई जगह तो आदमी को सदा अकेला जाना पड़ता है। किसी एक व्यक्ति को अकेले चलने की हिम्मत करनी पड़ती है। क्योंकि भीड़ तो पहले प्रतीक्षा करेगी कि पता नहीं, कि रास्ता कैसा है। अकेले आदमी को हिम्मत जुटानी पड़ती है। हमने अकेले होने की हिम्मत कब खो दी, पता नहीं, हम अकेले हो ही नहीं सकते। हमें भीड़ चाहिए हमेशा साथ, तो ही हम खड़े हो सकते हैं। फिर हम युवा नहीं रह जाते। फिर हम युवा नहीं रह जाते। फिर वह जो यंग माइंड है वह हममें पैदा नहीं हो पाता।
युवक क्रांति दल चाहता है, अकेले होने का साहस—एक-एक युवक में पैदा होना चाहिए। जिस दिन एक-एक युवक अकेला खड़े होने की हिम्मत करता है, उस दिन पहली बार उसकी आत्मा प्रकट होनी शुरू होती है, उसकी प्रतिभा प्रकट होनी शुरू होती है। जब वह कहता है कि चाहे सारी दुनिया यह कहती हो लेकिन जब तक मेरा विवेक नहीं मानता, मैं अकेला खड़ा रहूंगा। मैं सारी दुनिया के प्रवाह के विपरीत तैरूंगा। नदी इस तरफ जाती है पूरब—मुझे नहीं प्रतीत होता, मुझे नहीं तर्क कहता, नहीं विवेक कहता कि पूरब जाऊं! मैं पश्चिम की तरफ तैरूंगा टूट जाऊंगा, नदी की धार में; लेकिन कोई फिकर नहीं, धार के साथ तभी तैरूंगा जब मेरा विवेक मेरे साथ होगा। जिस दिन कोई व्यक्ति जीवन की धार के विपरीत अपने विवेक के अनुकूल तैरने की कोशिश करता है, पहली बार उसके जीवन में कोई चुनौती आती है, वह चैलेंज! वह संघर्ष आता है, वह स्ट्रगल आती है, जिससे संघर्ष और चुनौती में से गुजर कर उसकी आत्मा निखरती है, साफ होती है। आग से गुजर कर पहली दफे उसकी आत्मा कुंदन बनती है, स्वर्ण बनती है; लेकिन वह हमने खो दिया। अकेले होने की हमने हिम्मत खो दी है।
मैंने सुना है, एक स्कूल में एक पादरी कुछ बच्चों को समझाने गया था। वह उन्हें करेज, मॉरल-करेज, नैतिक साहस के बाबत समझाता था। उस पादरी से एक बच्चे ने पूछा कि आप कोई छोटी कहानी से समझा दें तो शायद हमें समझ में आ जाए। तो उस पादरी ने कहा कि तुम जैसे तीस बच्चे अगर पहाड़ पर घूमने गए हों, दिन भर के थके-मांदे वापस लौटे हों, ठंडी हो रात, थकान हो, हाथ-पैर टूटते हों, बिस्तर निमंत्रण देता हो, बढ़िया बिस्तर हों, अच्छे कंबल हों, उनमें सोने का मन होता हो, उनतीस लड़के शीघ्र जाकर अपने-अपने बिस्तरों में सो गए हैं, सर्दी की रात में। लेकिन एक बच्चा एक कोने में बैठ कर घुटने टेक कर अपनी रात्रि की अंतिम प्रार्थना कर रहा है। तो उस पादरी ने कहा: उस बच्चे को मैं कहता हूं कि उसमें साहस है। जब कि उनतीस बच्चे सोने के लिए चले गए हैं, रात सर्द है, दिन भर का थका हुआ है। उनतीस बच्चों का टेंपटेशन है। भीड़ के साथ होने की सुविधा है। कोई कुछ कहेगा नहीं, कुछ कहने की बात नहीं है। लेकिन नहीं, वह अपनी रात्रि की अंतिम प्रार्थना पूरी करता है उस सर्द रात में थके हुए। इसे मैं साहस कहता हूं: नैतिक साहस, अकेले होने का साहस, उस पादरी ने कहा।
महीने भर बाद वह फिर आया उस स्कूल में और उसने कहा कि पिछली बार मैंने नैतिक साहस की बात कही थी और एक कहानी सुनाई थी। क्या तुम भी कोई बता सकते हो, नैतिक साहस की कोई कहानी सुना कर। एक बच्चा खड़ा हुआ। और उसने कहा कि मैंने बहुत सोचा, और मुझे याद आया कि उससे भी बड़े नैतिक साहस की एक घटना हो सकती है। उस पादरी ने कहा, खुशी से तुम कहो। उस बच्चे ने कहा, आप जैसे तीस पादरी पहाड़ पर गए हुए हैं। दिन भर के थके-मांदे, भूखे-प्यासे, रात सर्द है, वापस लौटे हैं। तीसों पादरी हैं, दिन भर की थकान, ठंडी रात, आधी रात। उनतीस पादरी प्रार्थना करने बैठ गए हैं हाथ जोड़ कर और एक पादरी बिस्तर पर जाकर सो गया है। उस बच्चे ने कहा कि यह पहले करेज से ज्यादा बड़ा करेज है, ज्यादा बड़ा साहस है! क्योंकि हो सकता है कि पहला बच्चा यह सोच रहा हो कि मैं धार्मिक हूं और ये सब नास्तिक, अधार्मिक सो रहे हैं—सो जाओ, नरक में सड़ोगे, यह सोच सकता है वह बच्चा।
अक्सर धार्मिक और प्रार्थना करने वाले लोग इसी भाषा में सोचते हैं कि दूसरों को कैसे नरक में सड़वा दें। सारा चिंतन सारा…जितना वह बेचारे प्रार्थना करते हैं, उपवास करते हैं, उतना ही क्रोध दुनिया के ऊपर उनका बढ़ता चला जाता है। वे कहते हैं, एक-एक को नरक में डलवा देंगे। सड़क पर जिसको भी देखते हैं कि कुछ अच्छे चमकदार और रंगीन, खूबसूरत कपड़े पहने हुए हैं, मन ही में सोचते हैं, नरक में सड़ोगे। जिसको थोड़ा मुस्कुराते देखते हैं, सोचते हैं सड़ोगे, सड़ोगे, नरक में सड़ोगे। वह अपनी उदास सूरत का बदला तो लेंगे किसी से। वह अपनी गमगीन और रोती हुई आत्मा का बदला तो लेंगे किसी से।
तो हो सकता है, उस बच्चे ने कहा कि वह बच्चा यह मजा ले रहा हो कि कोई फिकर नहीं, आज मैं अकेला हूं तो कोई फिकर नहीं है, जब नरक की अग्नि में सड़ोगे तो मैं अकेला खड़ा देखूंगा, उनतीस सड़ते होओगे। इसलिए वह साहस बहुत बड़ा नहीं भी हो सकता है, लेकिन दूसरा साहस उसने कहा, बहुत बड़ा है। उनतीस पादरी जब स्वर्ग जाने की व्यवस्था किए ले रहे हैं, तब एक बेचारा नरक जाने की तैयारी कर रहा है। तब उसे कोई कंसोलेशन भी नहीं है, कोई सांत्वना भी नहीं है कि इनको नरक भेज दूंगा। तब उसे कोई सांत्वना नहीं है, तब टेंपटेशन बड़ा है कि उनतीस। तब उसे यह भी पता है कि यह उनतीस दुनिया में जाकर कल सुबह क्या कहेंगे। हो सकता है, रात भी न सो पाए।धार्मिक आदमी बड़े खतरनाक होते हैं। हो सकता है, आधी रात में पड़ोसी को जाग कर कह आएं कि पता है, उस पादरी की अब फिकर मत करना, वह आदमी भ्रष्ट हो गया है, उसने आज प्रार्थना नहीं की है। लेकिन कुछ भी हो, चाहे पहला साहस रहा हो चाहे दूसरा, लेकिन साहस का अर्थ हमेशा ‘अकेले’ होने का साहस है। क्रमशः…..

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-३