हम सब सिखा रहे हैं कुछ न कुछ दूसरों को, बिना इसकी फिक्र किए कि हमें पता है या नहीं है “ओशो”

ओशो- मैंने सुना है कि मुल्ला नसरुद्दीन अपने बेटे के साथ बगीचे में घूम रहा था। तो उसके बेटे ने पूछा कि पिताजी, सूरज किसने बनाया?

मुल्ला ने एक क्षण तो सोचा। क्योंकि कोई भी बाप यह स्वीकार करना मुश्किल अनुभव करता है कि मुझे पता नहीं है। लेकिन ऐसे मुल्ला ईमानदार आदमी था। उसने कहा कि नहीं, मेरा मन तो उत्तर देने का होता है, लेकिन आज नहीं कल तू पता लगा ही लेगा। इसलिए मैं तुझसे साफ ही कह दूं। मुझे पता नहीं है। घूम रहे थे। फिर उस बच्चे ने पूछा कि ये वृक्ष कौन बड़े कर रहा है? मुल्ला ने कहा कि मुझे पता नहीं है। फिर उस लड़के ने पूछा कि रात को चांद निकलता है, तो उसका एक ही पहलू हमें हमेशा दिखाई पड़ता है। दूसरा पहलू क्यों दिखाई नहीं पड़ता? मुल्ला ने कहा, मुझे पता नहीं है।बार—बार लड़के ने यह सुनकर कि मुझे पता नहीं, मुझे पता नहीं, लड़का उदास हो गया। उसके उदास चेहरे को देखकर मुल्ला ने पूछा, बेटा पूछ। दिल खोलकर पूछ। पूछेगा नहीं, तो सीखेगा कैसे? कुछ भी पता नहीं है, फिर भी पूछेगा नहीं तो सीखेगा कैसे! हम सब सिखा रहे हैं, बिना इसकी फिक्र किए कि हमें पता है या नहीं है। धार्मिक व्यक्ति इस बात से शुरुआत करता है कि मुझे पता नहीं है और अब मैं सीखने निकलता हूं। फिर वह विनम्र होगा, फिर वह झुका हुआ होगा। फिर जहं। से भी सीखने को मिल जाए, वह सीखेगा।सीखने वालों की कमी है, इसलिए कबीर, दादू असफल चले जाते हैं। और जो हम उनसे सीखते हैं, वह शब्द हैं, ज्ञान नहीं सीखते; उनके शब्द सीख लेते हैं।

कबीर के पद याद हो जाते हैं। तुलसी की चौपाइयां याद हो जाती हैं। लोग तोतों की तरह दोहराते रहते हैं। जब तक वह अनुभव आपको न हो जाए, जो उन पदों में छिपा है, तब तक वे पद तोते की तरह हैं। अच्छा है मत दोहराएं। क्योंकि तोता होना अच्छा नहीं है। जब तक जान न लें, तब तक चुप रहें। और जो ताकत है, वह बोलने में न लगाकर, खोजने में लगाएं। तो कबीर सफल हो सकते हैं।एक मित्र ने पूछा है कि मनुष्य तो अपने भाग्य को लेकर जन्मता है, तो अगर खोज भाग्य में होगी भगवान की, तो हो जाएगी। नहीं होगी, तो नहीं होगी!

यह बात मतलब की भी हो सकती है और खतरनाक भी। मतलब की तो तब, जब जीवन के और हर पहलू पर भी यही .दृष्टि हो। फिर सुख को भी मत खोजें। मिलना होगा, मिल जाएगा। फिर दुख से भी मत बचें, क्योंकि भोगना है, तो भोगना ही पड़ेगा। फिर जिंदगी में जो कुछ भी हो, उसको स्वीकार कर लें; और जो न हो, उसको भी स्वीकार कर लें कि वह नहीं होना है। तो फिर मैं आपको कहता हूं कि भगवान को भी मत खोजें। भगवान आपको खोजता हुआ आ जाएगा। लेकिन फिर भाग्य की इतनी गहरी निष्ठा चाहिए कि जो होगा, ठीक है।सिर्फ भगवान के संबंध में यह बात और धन के संबंध में खोज जारी रखें, तो फिर बेईमानी है। धन के संबंध में खोज जारी रखें, और उसमें तो कहें कि पुरुषार्थ के बिना क्या होगा! और खोजेंगे नहीं तो मिलेगा कैसे! और जो लोग खोज रहे हैं, उनको मिल रहा है। तो ऐसे हाथ पर हाथ रखे बैठे रहे, तो गंवा देंगे। तो धन की तो खोज जारी रखें, क्योंकि धन पुरुषार्थ के बिना कैसे होगा! और जब भगवान को खोजने का सवाल आए, तब कहें कि सब भाग्य की बात है। होगा, तो हो जाएगा। नहीं होगा, तो नहीं होगा। तो फिर धोखा है, आत्मवचना है।तो मैं मानता हूं कि अगर भाग्य को कोई पूरी तरह स्वीकार कर ले, तो उसे भगवान को खोजने की जरूरत नहीं है। भगवान ही उसे खोजेगा। लेकिन भाग्य को पूरा स्वीकार करने का अर्थ समझ लेना। फिर कुछ भी मत खोजना। फिर खोजना ही मत। फिर यह बात ही छोड़ देना कि मेरे हाथ में करने का कुछ भी है। फिर तो जो भी हो, होने देना। जो भी हो, होने देना। अपनी तरफ से कुछ करना ही मत।

अगर कोई व्यक्ति इतने भाग्य पर अपने को छोड़ दे तो समर्पण हो गया। उसे भगवान का पता न भी हो, तो भी भगवान उसे मिल ही गया, इसी क्षण मिल गया। कोई बाधा न रही।

लेकिन यह कानूनी बात न हो। यह कोई लीगल तरकीब न हो हमारी। क्योंकि हम बड़े कानूनविद हैं। और हम ऐसी तरकीबें निकालते हैं, जिनका हिसाब नहीं है!

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-३ 
गीता दर्शन