धमतरी में पुलिसिया ‘ससुराल’: 4 साल से एक ही कुर्सी पर जमे सिपाही, नए नियम भी पस्त!

 धमतरी में पुलिसिया ‘ससुराल’: 4 साल से एक ही कुर्सी पर जमे सिपाही, नए नियम भी पस्त!

डोमन साहू की रिपोर्ट 

धमतरी। जिले में पुलिस महकमे की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक पारदर्शिता पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। थाना और चौकियों में बीते कई वर्षों से एक ही जगह पर टिके सिपाही और हवलदारों पर विभाग की ‘विशेष मेहरबानी’ बरकरार है। पुलिस महकमे द्वारा हाल ही में जारी की गई तबादला सूची को लेकर निचले अमले से लेकर प्रशासनिक गलियारों तक असंतोष और चर्चाओं का माहौल गर्म है। आरोप हैं कि नियम-कायदों को दरकिनार कर स्थानांतरण प्रक्रिया को महज एक रस्म अदायगी (खानापूर्ति) तक सीमित कर दिया गया है।
सूत्रों के मुताबिक जिले के विभिन्न थानों व चौकियों में दर्जनों ऐसे आरक्षक और प्रधान आरक्षक हैं, जो पिछले 3 से 4 वर्षों से भी अधिक समय से एक ही स्थान पर पदस्थ हैं। स्थानीय स्तर पर यह स्थिति पुलिसिंग की साख को प्रभावित कर रही है। प्रशासनिक व्यवस्था में सामान्यतः पारदर्शी पुलिसिंग और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए समय-समय पर मैदानी अमले का स्थानांतरण आवश्यक माना जाता है, लेकिन धमतरी में यह व्यवस्था धरातल पर दम तोड़ती नजर आ रही है।

 

घुमा-फिराकर पुन: पुरानी जगह पोस्टिंग
स्थानांतरण प्रणाली में सुधार की उम्मीदें उस वक्त धराशायी हो गईं जब हालिया जारी सूची में भी कोई ठोस बदलाव देखने को नहीं मिला।
सूत्रों का कहना है कि स्थानांतरण के नाम पर केवल औपचारिक फेरबदल किया गया। कई कर्मचारियों को कागजों में इधर-उधर दिखाकर वापस उन्हीं थानों में स्थापित कर दिया गया।
इससे पूर्व तत्कालीन पुलिस अधीक्षक सूरज सिंह परिहार के कार्यकाल में भी तबादला सूची जारी हुई थी, जिसमें कम समय वाले पुलिसकर्मियों के नाम तो शामिल थे, लेकिन वर्षों से जमे प्रभावशाली कर्मचारियों को छुआ तक नहीं गया था। वर्तमान सूची में भी वही ढर्रा दोहराया गया है।
प्रभावित होती पुलिसिंग और साठ-गांठ की आशंका
किसी भी प्रशासनिक या सुरक्षा एजेंसी में निचले अमले का एक ही स्थान पर लंबा कार्यकाल कई तरह की प्रशासनिक विसंगतियों को जन्म देता है।

स्थानीय साठ-गांठ: एक ही क्षेत्र में लंबे समय तक रहने से मैदानी स्तर पर मनमानी और स्थानीय तत्वों के साथ अवांछित साठ-गांठ की शिकायतें बढ़ने लगती हैं। निष्पक्ष जांच और कानून व्यवस्था बनाए रखने की प्रक्रिया प्रभावित होती है। नियमपूर्वक कार्य करने वाले अन्य पुलिसकर्मियों का मनोबल गिरता है।प्रशासनिक संज्ञान की दरकार
इस पूरे घटनाक्रम के बाद पुलिस विभाग के भीतर और बाहर यही यक्ष प्रश्न तैर रहा है कि आखिर इन चुनिंदा सिपाही-हवलदारों पर विभाग इतना मेहरबान क्यों है? क्या इन कर्मचारियों की पकड़ प्रशासनिक तंत्र पर इतनी मजबूत है कि स्थानांतरण के तय नियम इन पर लागू नहीं होते? अब देखना यह होगा कि वर्तमान पुलिस अधीक्षक इस पूरे मामले में संज्ञान लेकर वर्षों से एक ही जगह जमे अमले पर कोई ठोस प्रशासनिक कार्रवाई करते हैं या फिर यह तबादला सूची भी पूर्व की भांति महज कागजी खानापूर्ति बनकर रह जाएगी।