“जब परंपरा प्रगति की राह रोक दे”, “अतीत के गौरव में कैद भारत: ओशो का चेतावनी भरा विश्लेषण”

 “जब परंपरा प्रगति की राह रोक दे”, “अतीत के गौरव में कैद भारत: ओशो का चेतावनी भरा विश्लेषण”

ओशो – इसे समझना जरूरी है, कि भारत का पूरा मन कैसा है? इसे समझ लेना उचित है। क्योंकि भारत यानी क्या–नहरें, महासागर, नदियां, पहाड़? नहीं, भारत का यह मतलब नहीं है। भूगोल भारत नहीं है। भारत का आदमी, और आदमी से क्या मतलब है? उसके हाथ-पैर हैं? नहीं, आदमी से मतलब–उसका मन, बुद्धि! भारत का मन क्या है? भारत का मन गतिविरोधी है। भारत का मन रुक जाने और ठहर जाने का आग्रही है। अगर कोई धक्के दे दे मजबूरी में, तो हम स्थान छोड़ दें। लेकिन जगह छोड़ने का हमारा मन नहीं करता। जो जहां है, वहां ठहर जाने की हमारी हजारों साल की मन की चेष्टा रही है; इसिलिए सब चीजें ठहर गई हैं। बैलगाड़ी जैसी बनी थी, ठीक वैसी ही है। उसमें कोई फर्क नहीं पड़ा है कोई फर्क नहीं पड़ा।
शायद हम सोचते नहीं है। बैलगाड़ी में फर्क पड़े, तो बैलगाड़ी में फर्क पड़ते-पड़ते ही जेट प्लेन बनता है। वह बैलगाड़ी में ही हुआ निरंतर-निरंतर विकास है। आज बैलगाड़ी पर बैठ कर और जेट प्लेन पर बैठ कर सोचना मुश्किल है, कि इन दोनों में क्या संबंध है। क्योंकि बीच की सीढ़ियां नहीं होती हैं; लेकिन वहीं दिक्कत होती है। हम बैलगाड़ी पर ही खड़े हैं। वहां से हम नहीं बदलते हैं; बल्कि हम उसमें गौरव अनुभव करते हैं।
न बदलना गौरवपूर्ण है हमारे मन में! और हम निरंतर यह क हते हैं, कि मिस्त्र कहां है अब! यूनान कहां है, सीरियां कहां है, बेबीलोन कहां है! सारी संस्कृतियां दुनिया की पैदा हुई और मर गईं। चीनी सबसे पुरानी संस्कृति है, खो गई। एक हम हैं, जिनकी पुरानी संस्कृति अभी भी जिंदा है। हम इसमें भी गौरव अनुभव करते हैं। जब कि सच्चाई यह है कि जैसे एक व्यक्ति पैदा होता है, जवान होता है, बूढ़ा होता है और मरता है। यही नैसर्गिक व्यवस्था है। ऐसे ही संस्कृति भी पैदा होती है, जवान होती है, बूढ़ी होती है और मरती है। मरनी चाहिए ही! जन्मने के साथ ही अनिवार्य प्रक्रिया है।
अगर कोई संस्कृति मरने से इनकार कर दे, तो नये जीवन के अंकुर पैदा होने बंद हो जाते हैं। नया जीवन,उसका आगमन, उसके सब द्वार बंद हो जाते हैं। भारत की संस्कृति ने मरने की इनकार कर दिया है। कोई आदमी तो मरने से इनकार नहीं कर सकता, मर जाएगा, मर ही जाएगा। बदल जाएगा। लेकिन कोई समाज, कोई संस्कृति किसी व्यक्ति को बदलते चले जाते हों, लेकिन अगर मन पर शक कर ले, तो ठहर सकता है। ठहराव के कुछ परिणाम भी हमने भोगे हैं। हम सदा से गरीब हैं, और गरीब ही बने रहे।
ठहरा हुआ समाज समृद्ध नहीं हो सकता। क्योंकि ठहरा हुआ समाज किसी भी आयाम में किसी भी दिशा में, संपत्ति को ज्ञान को, कोई प्रयास नहीं करता। ठहरा हुआ समाज भी उसके पास है, उसमें ही तृप्त होता है। तृप्त न हो, तो ठहर नहीं सकता है। ठहरने का सूत्र है, कंटेंटमेंट। ठहर जाओ–उसकी आधारशिला है, संतोष कर लो। संतुष्ट ठहर जाता है, असंतुष्ट गति करता है।
अगर भारत को आगे गति करनी है तो उसको अपने पुराने संतोष के मानसिक ढांचे को तोड़ देना पड़ेगा। एक असंतोष चाहिए ही। जो है उससे तृप्त होना गलत है। क्योंकि जो हो सकता है, अगर हम तृप्त हो सकते है, वह कभी नहीं होगा। जो है, उसके अतिरिक्त होना जरूरी है ताकि जो हो सके, उस तरफ गति होती रहे, हम आगे बढ़ते रहें। भारत तृप्त है। गरीबी है, उससे तृप्त हैं। गुलामी आएं, उससे तृप्त है।
एक हजार साल तक हम गुलाम न रहते; अगर हमारी तृप्ति की यह गहरी आस्था न होती। हम गुलामी से भी तृप्त हो गए। एक हजार साल इतनी बड़ी कौम गुलाम रहे, यह हैरान करने वाला है। जब तक कि उस कौम का पूरा मानसिक ढांचा गुलामी का न हो। एक हजार साल तक किसी को गुलाम रखना बहुत मुश्किल है, जब तक कि वह कौम किसी दूसरे ढंग से गुलामी के लिए राजी न हो। हम राजी हैं। राजी होने का कारण यह था कि हम हर चीज को स्वीकार करते हैं। वह जैसी है, उसके साथ वैसे ही होने को राजी हैं।
दो रास्ते हैं समाज के–या तो जिंदगी गलत हो तो जिंदगी को बदलो। और अगर जिंदगी गलत हो, तो एक रास्ता यह है कि अपने को गलत जिंदगी के साथ राजी कर लो। या तो दुनिया को बदलो या बाहर की दुनिया के साथ राजी हो जाओ।
भारत ने दूसरा रास्ता पकड़ा हुआ है। जैसी भी स्थिति हो उसके साथ मनुष्य को ही राजी हो जाना है, बदलना नहीं है बाहर की स्थिति को। गरीबी हो, तो गरीबी में राजी हो जाना हैं, बीमारी हो, बीमारी में राजी हो जाना है। और राजीपन के लिए हमने बड़ी फिलासफीज खोजी हैं, बड़े दर्शन खोजे हैं। वह हमें समझाते हैं। जो कर रहा है, वह भगवान कर रहा है। तो फिर हम कुछ कर नहीं सकते। गरीबी है, तो भगवान कर रहा है। बीमारी है, तो भगवान कर रहा है। हमने रास्ते खोजे है कि हर आदमी के भाग्य में जो लिखा है, वही हो रहा है। कुछ अन्यथा हो नहीं सकता है। हम एक-एक आदमी को समझाते रहे हैं कि तुम्हारे पिछले जन्मों के फल तुम भोग रहे हो। अब कुछ हो नहीं सकता, फल भोगने के बारे में। गरीब आदमी अपने पिछले जन्मों का फल भोग रहा है। अमीर आदमी भी पिछले जन्मों को फल भोग रहा है। इसलिए दोनों के बीच कोई झगड़ा नहीं है, कोई संघर्ष नहीं है। दोनों ही अपने पिछले जन्मों से बंधे हैं। और दोनों का आज की जिंदगी से कोई संबंध नहीं है, आज की जिंदगी से कोई मतलब नहीं है, गरीबी-अमीरी का। गुलामी भी हम भोग रहे हैं। वह भी हमारे भाग्य, हमारे कर्मों का फल है। डाल हमने एक व्याख्या विकसित की, कि जिसमें जिंदगी जैसी है, हम उसके साथ राजी हो सकते हैं। उस व्याख्या ने भारत को ठहरा दिया, खड़ा कर दिया। वह ठहरा ही रहा, लेकिन दुनिया की हवाएं आई, हमारी सब दीवालें टूट गईं, हमारे सब घेराबंदी-मोर्चे टूट गए, हमारे सब ज्ञान-व्याख्याएं टूट गईं। चारों तरफ से दुनिया आई और हमको बहुत हिला दिया और बहुत तकलीफ में डाल दिया हम फिर भी आंखे बंद करने के आदी हैं। अगर दुनिया हमें हिलाती भी हो, तो हम आंख बंद करके अपनी पुरानी सुरक्षा के घर में पहुंच जाते हैं।
अभी पुरी के शंकराचार्य ने कहा कि चांद पर आदमी पहुंच ही नहीं सकता है, हमारी किताब में लिखा है। तो यह आर्मस्ट्रांग और उसके साथी जो पहुंचे, यह सब झूठी अफवाह है। यह सब चल नहीं सकती। यह आंख बंद करने की तरकीबें हैं। तो हम आंख बंद कर लेंगे, सोचेंगे नहीं? और शंकराचार्य ने कहा, अगर कोई पहुंच भी गया हो, तो फिर पक्का है कि वह चांद नहीं है, जो हमारे शास्त्रों में लिखा है। वह चांद-सूरज से भी आगे है। ये आंखें बंद हैं। जिंदगी के तथ्य अगर उघड़ जाएं तो हम फिर आंख बंद करने की कोशिश करते हैं, कि आंख बंद कर लो और इनकार कर दो, कि यह चांद तो चांद ही नहीं है। हम तो दूसरे ही चांद की बात करते हैं। उस चांद पर आदमी का पैर पड़ ही कैसे सकता है?
हम पिछले दो-तीन सौ वर्षों से जब से विश्व संपर्क में आए हैं तब से हम इसी तरह निरंतर इनकार करने की कोशिश कर रहे हैं, और अपनी आंख बंद करने की कोशिश कर रहे हैं बहुत। यह हो गई बात! और इस आंख बंद करने में हमने बहुत सी तरकीबें उपयोग की हैं। जैसे अगर हम पिछले तीन सौ वर्षों का भारत का विचार देखें तो अतीत का गुणगान है! एक ही रास्ता था आशा का, वह यह, कि हम अतीत का गुणगान करें। तो पिछले दो सौ वर्षों में हमारे अच्छे से अच्छे आदमी से लेकर, बुरे से बुरे आदमी, अतीत के गुणगान में लगे हुए हैं। वे सिर्फ यह कह रहे हैं, कि कभी हम बहुत अदभुत थे। सब ज्ञान हमारे पास था। अगर लोगों की किताबें हम पढ़ें, तो घबड़ाने वाली होंगी। वे कहते हैं, एटम बम हमारे वेद में लिखा हुआ है। उसी से निकला हुआ है। यहां तक वे कहते हैं कि जर्मनी हमारे ग्रंथ चले गए, उन्हीं से ही खोज-बीन करके सारे विज्ञान की बात निकली है। हमारे ग्रंथों में सब है। कभी हम सब जानते थे, सब हमने जान लिया था। हम पीछे की तरफ लौट गए।

क्रमशः…….