एस.आई.आर. सत्यापन के ‘नियम’ बनाम जीवन की ‘जटिलता’, वयोवृद्ध प्रोफेसर के मामले ने खींचा ध्यानाकर्षण

 एस.आई.आर. सत्यापन के ‘नियम’ बनाम जीवन की ‘जटिलता’, वयोवृद्ध प्रोफेसर के मामले ने खींचा ध्यानाकर्षण
■ विसंगति: घर पर ही ‘सघन निगरानी’ में मौजूद बुजुर्ग को नोटिस; मानवीय गरिमा और नियमों पर नई बहस।

■ विशेषज्ञ मत: गंभीर चिकित्सकीय स्थिति में ‘सघन निगरानी’ ही एकमात्र सुरक्षा कवच।

■ नीतिगत मांग: 75+ आयु वर्ग के गंभीर मरीजों हेतु ‘किसी भी प्रशासनिक कार्य’ के लिए ‘डोरस्टेप’ या ‘डिजिटल’ माध्यम को मिले कानूनी मान्यता।

प्रशासनिक नियमों की व्यवहारिकता पर सवाल

वार्ड क्रमांक 15, कुम्हारी (पाटन) के 88 वर्षीय सेवानिवृत्त प्रोफेसर यज्ञ व्रत श्रीवास्तव, जो विगत चार वर्षों से गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं, उनके भौतिक सत्यापन हेतु जारी एस.आई.आर. नोटिस ने प्रशासनिक नियमों की व्यवहारिकता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।

स्थानीय पार्षद अनुराग गुप्ता के हस्तक्षेप से इस प्रकरण का तात्कालिक समाधान तो हो गया, लेकिन यह मामला प्रशासनिक प्रक्रियाओं में मौजूद एक बड़ी नीतिगत खामी को उजागर करता है।

मेडिकल प्रोटोकॉल: ‘सघन निगरानी’ ही एकमात्र सुरक्षा कवच

चिकित्सकीय विशेषज्ञों के अनुसार प्रोफेसर श्रीवास्तव हार्ट फेलियर (HFpEF), क्रोनिक किडनी डिजीज (CKD) तथा सी.ए.डी. विथ I.W.M.I. जैसी जटिल मल्टी-ऑर्गन बीमारियों से ग्रसित हैं।

लगातार चल रही दवाओं के कारण शरीर में इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन का खतरा हर समय बना रहता है, जिसकी पहचान केवल लक्षणों और निरंतर क्लिनिकल निगरानी से ही संभव है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अत्यधिक आयु और बहु-रोग स्थितियों में मृत्यु का जोखिम चिकित्सकीय दृष्टि से अत्यंत अधिक होता है। ऐसी स्थिति में निगरानी में थोड़ी सी चूक भी जानलेवा सिद्ध हो सकती है।

‘साँसों पर पहरा’: घर बना सघन निगरानी कक्ष

देखभालकर्ता एवं पुत्र शील रत्न श्रीवास्तव ने बताया कि विगत चार वर्षों से पिता की सुरक्षा कठोर मेडिकल प्रोटोकॉल और सतत मानवीय निगरानी पर आधारित है।

हाइपोग्लाइसीमिया, इलेक्ट्रोलाइट बदलाव, यूरिन आउटपुट, पल्स रेट, रक्तचाप और ऑक्सीजन स्तर में उतार-चढ़ाव का खतरा हर समय बना रहता है। इसी कारण घर को ही एक प्रकार के ‘आईसीयू-जैसे सघन निगरानी कक्ष’ में परिवर्तित किया गया है।

चिकित्सकीय विवशता के कारण पुत्र ने यह स्पष्ट किया कि मरीज को किसी गैर-अनुभवी अटेंडेंट के भरोसे अकेला छोड़कर प्रशासनिक कार्य हेतु दफ्तर जाना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है।

प्रशासनिक संवेदनशीलता की दरकार

इस प्रकरण ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या प्रशासनिक नियम मानवीय गरिमा और जीवन रक्षा से ऊपर हो सकते हैं।

बुद्धिजीवियों द्वारा सुझाए गए नीतिगत सुधार

  • प्रशासनिक सरलीकरण: 75+ आयु वर्ग के गंभीर मरीजों के लिए भौतिक उपस्थिति की बाध्यता समाप्त हो।
  • डिजिटल व डोरस्टेप सुविधा: वीडियो कॉल के माध्यम से ‘वर्चुअल सत्यापन’ को मानक प्रक्रिया बनाया जाए।
  • प्राथमिकता का अधिकार: देखभालकर्ताओं को सरकारी कार्यालयों में त्वरित कार्य हेतु प्राथमिकता दी जाए।

साहित्यकार सुरेश वाहने ने कहा, “नियम नागरिकों की सुविधा के लिए होते हैं, उन्हें नियमों की वेदी पर बलि नहीं चढ़ाया जा सकता।”