“भारत की मूल भूल: हमने जड़ों को छोड़ा, फूलों के पीछे भागे”_ ओशो

 “भारत की मूल भूल: हमने जड़ों को छोड़ा, फूलों के पीछे भागे”_ ओशो

ओशो- भारत के इतिहास की बुनियादी भूल यह है कि हमने भौतिक को इनकार किया और हमने सोचा कि अध्यात्म कुछ भौतिक का विरोधी है। यह भूल ऐसी ही है जैसे कोई कहे कि जड़ें फूलों की विरोधी हैं। माना कि जड़ें बहुत कुरूप हैं, और फूलों जैसी सुंदर नहीं हैं। और यह भी माना कि जड़ें बहुत अंधेरे में हैं, बेढंगी फैली हैं और फूलों जैसी हैं अनुपात में और कवि की कल्पना में प्रकट नहीं हुई हैं; और यह भी माना कि जड़ों के लिए आज तक किसी ने गीत नहीं गाया और यह भी माना कि आज तक जड़ों की किसी ने प्रशंसा नहीं की है; लेकिन ध्यान रहे, जड़ों के बिना इस जगत में एक भी फूल नहीं खिल सकता है। सारे फूल जड़ों को धन्यवाद देते होंगे, क्योंकि जड़ों से ही सारा रस आता है, जड़ों से ही सारा जीवन आता है। हमने ऐसा किया कि हमने कहा कि जड़ों को हम पानी न देंगे। हम कुरूप को क्यों पानी दें? हम तो सिर्फ फूलों को पानी देंगे। फूलों को पानी देने से फूलों का हित नहीं होता।माओ ने अपने बचपन का एक संस्मरण लिखा है, जो मुझे बहुत प्रीतिकर रहा है। उसने लिखा है कि मेरी मां की एक बगिया थी। एक छोटी बगिया मेरी मां ने बसाई थी। वह बूढ़ी हो गई और बीमार पड़ गई। वह इतनी बीमार थी कि बगिया में नहीं जा सकती थी, तो वह बहुत चिंतित थी कि कहीं फूल कुम्हला न जाएं। तो उसने अपने बेटे को कहा कि तू देख सकेगा? उसके बेटे ने कहा, तू बिलकुल निशिं्चत रह, मैं बगिया की पूरी फिकर कर लूंगा। लेकिन उस बेटे को यह पता न था कि फूलों के प्राण जमीन में छिपी हुई जड़ों में होते हैं। जड़ें तो दिखाई पड़ती नहीं हैं, दिखाई तो फूल पड़ते हैं। उस बेटे को पता न था। उस बेटे ने एक-एक फूल को पानी दिया, एक-एक फूल को झाड़ा, पोंछा, प्रेम किया।

पंद्रह दिन में बगिया सूख गई। जब बूढ़ी उठी, उसने देखा, उसने कहा, यह क्या हुआ बगिया का? यह बगिया तो नष्ट हो गई। ये फूल तो सूख गए। तो उस बेटे ने कहा, मैं क्या करूं? मैंने तो एक-एक फूल को प्रेम किया, एक-एक फूल को झाड़ा, पोंछा, बुहारा, लेकिन पता नहीं क्या हुआ कि ये फूल सूखते चले गए। उस बूढ़ी औरत ने कहा, बेटे, जड़ों की फिकर की? उसने कहा, कैसी जड़ें? जड़ों का तो मुझे कुछ पता ही नहीं, जड़ें कहां हैं? उस बूढ़ी स्त्री ने कहा कि जड़ें जमीन में दबी हैं। फूलों की फिकर करनी हो तो फूलों की फिकर नहीं करनी पड़ती है, जड़ों की फिकर करनी पड़ती है। जड़ों की फिकर हो जाए, फूलों की फिकर अपने आप हो जाती है। और अगर किसी ने यह भूल की कि फूलों की फिकर की और जड़ें भूल गईं तो फूल कुम्हला जाएंगे, उनकी फिकर से उनको नहीं बचाया जा सकता।

इस देश ने ऐसी भूल कर ली है। हमने जड़ों को इनकार कर दिया, इसलिए विज्ञान पैदा नहीं हो सका। विज्ञान जीवन की जड़ है। धर्म जीवन के फूल हैं। इसलिए हमारा शरीर कमजोर होता चला गया। शरीर जीवन की जड़ है। आत्मा जीवन का फूल है। हम फूलों की ही बात करते रहे। हम फूल से नीचे उतरने को राजी ही न हुए। हमने सारे शास्त्र फूलों के लिखे, जड़ की हमने एक किताब न लिखी। हमने उपनिषद लिखे, हमने वेद लिखे, हमने गीता लिखी। ये सब फूलों की किताबें हैं। हमने फिजिक्स और कैमिस्ट्री न लिखी, हमने गणित और भूगोल न लिखा। वे जड़ों की किताबें थीं। इसलिए हम पिछड़ गए, हम बुरी तरह पिछड़े। फूलों की बात करते रहे और फूल कुम्हलाते चले गए। फूलों की चर्चा में रत रहे और फूल मरते चले गए।

ऐसे हमने फूलों को प्रेम तो किया, लेकिन फूलों के हत्यारे भी हम ही सिद्ध हुए। क्योंकि फूलों को प्रेम करना ही फूलों को बचाने के लिए पर्याप्त नहीं है। जड़ों को भी प्रेम करना पड़ता है। माली जड़ों की फिकर करता है, फूलों की फिकर ही नहीं करता। फूल अपने आप आ जाते हैं। फूलों को लाना नहीं पड़ता, जड़ें सम्हल जाएं, फूल चले आते हैं। फूल जड़ों की सहज छाया की भांति आते हैं।

मैं आऊंगा आपके घर तो मेरी छाया चली आएगी। लेकिन आप अगर मेरी छाया को निमंत्रण दे गए और मुझे भूल गए तो मैं तो आऊंगा ही नहीं, मेरी छाया के आने की भी कोई संभावना नहीं है।

हमने फूलों को निमंत्रण दिया कि आओ। हमने परमात्मा को बुलाया कि आओ, विराजो हमारे भवन में, लेकिन हमने जड़ों को, प्रकृति को, पृथ्वी को अस्वीकार कर दिया। क्रमशः…..

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-3

🌸 ओशो का चिंतन — “फूलों को नहीं, जड़ों को सींचो”

भारत की बुनियादी भूल

ओशो कहते हैं — भारत के इतिहास की सबसे बड़ी भूल यह रही कि हमने भौतिक जीवन को नकार दिया और यह मान लिया कि अध्यात्म कुछ ऐसा है जो भौतिक का विरोधी है।
यह भूल वैसी ही है जैसे कोई कहे कि जड़ें फूलों की शत्रु हैं।

माना कि जड़ें सुंदर नहीं होतीं — वे अंधेरी मिट्टी में दबी रहती हैं, बेढंगी फैली होती हैं, कवियों की कल्पनाओं में नहीं उतरतीं। परंतु ध्यान रहे, जड़ों के बिना इस धरती पर एक भी फूल नहीं खिल सकता।
फूलों का सारा जीवन, सारा रस जड़ों से ही आता है।

फूलों को पानी देने की भूल

ओशो एक उदाहरण देते हैं — माओ ने अपने बचपन का एक संस्मरण लिखा है।
वह बताते हैं कि उनकी मां की एक छोटी सी बगिया थी। जब मां बीमार पड़ीं, तो उन्होंने अपने बेटे से कहा, “बेटा, मेरी बगिया की फिकर रखना।”

बेटे ने वचन दिया कि वह फूलों की पूरी देखभाल करेगा।
वह रोज एक-एक फूल को पानी देता, साफ करता, पोंछता और सजा देता।
पर पंद्रह दिनों में बगिया सूख गई।

जब मां ने पूछा — “क्या हुआ बगिया का?”
बेटे ने कहा — “मैंने हर फूल की सेवा की, फिर भी वे मुरझा गए।”

तब मां ने कहा — “बेटा, फूलों की नहीं, जड़ों की फिकर करनी पड़ती है।
फूल तो जड़ों की छाया हैं। जड़ें सींचो, फूल अपने आप खिलते हैं।”

भारत ने जड़ों को भुला दिया

ओशो कहते हैं — यही गलती इस देश ने की है।
हमने जड़ों को पानी देना बंद कर दिया।
हमने कहा — “कुरूप को क्यों सींचें? हम तो सुंदरता, अध्यात्म, परमात्मा की बात करेंगे।”

लेकिन जड़ें भूखी रह गईं — और फूल मुरझा गए।
हमने विज्ञान को छोड़ दिया, सिर्फ धर्म पर ध्यान दिया।
हमने शरीर को भुला दिया, सिर्फ आत्मा की बात की।

विज्ञान जड़ है, धर्म फूल है

ओशो स्पष्ट करते हैं —
“विज्ञान जीवन की जड़ है, धर्म जीवन का फूल है।
शरीर जीवन की जड़ है, आत्मा जीवन का फूल है।”

लेकिन हमने केवल फूलों की चर्चा की।
हमने उपनिषद, वेद, गीता जैसी फूलों की किताबें लिखीं,
पर फिजिक्स, केमिस्ट्री, गणित जैसी जड़ों की किताबें नहीं लिखीं।

इसलिए हम पिछड़ गए।
हम फूलों की पूजा में रमे रहे, लेकिन जड़ों की उपेक्षा करते रहे।
और आखिरकार फूल कुम्हला गए।

फूलों को प्रेम करना पर्याप्त नहीं

ओशो कहते हैं — “ऐसे हमने फूलों से प्रेम तो किया, लेकिन उनके हत्यारे भी हम ही निकले।”
क्योंकि फूलों को बचाने के लिए सिर्फ उनका प्रेम पर्याप्त नहीं है, जड़ों को भी प्रेम करना जरूरी है।

सच्चा माली फूलों को नहीं, जड़ों को सींचता है।
फूल तो सहज रूप से आते हैं — वे जड़ों की छाया की तरह खिलते हैं।

छाया नहीं, स्रोत को बुलाओ

ओशो अंत में कहते हैं —
“अगर आप मेरी छाया को निमंत्रण दें और मुझे भूल जाएं, तो मैं भी नहीं आऊंगा, और मेरी छाया भी नहीं।”

इसी तरह हमने परमात्मा को बुलाया, पर प्रकृति — जो उसकी जड़ है — उसे अस्वीकार कर दिया।
और यही हमारी सबसे बड़ी भूल बन गई।

संदेश

“जड़ों को सींचो, तभी फूल खिलेंगे।
विज्ञान को स्वीकारो, तभी अध्यात्म प्रस्फुटित होगा।
शरीर का आदर करो, तभी आत्मा का तेज प्रकट होगा।”
ओशो