यात्रा रोक दी गयी। देवदूत भागे। उनको भी शक हुआ कि हो सकता है ;गलती तो दिखती है। लौट कर आये, कहा कि’कोई गलती नहीं है। हमने पूछा तो पता चला कि संन्यासी ऊपर-ऊपर ही संन्यासी था और भीतर उसके मन में ऐसा ही होता था। निरंतर जब वह परमात्मा की पूजा भी करता था – सुबह अपने मंदिर में, तो घंटी तो परमात्मा की प्रार्थना में बजती थी ;उसके हृदय की घंटी वेश्या के घर ही बजती रहती थी। पूजा करता था, प्रार्थना करता था, लेकिन मन में यही भाव होता था कि वेश्या के घर जो लोग इकट्ठे हैं, आनंद ले रहे होंगे! वहां गीत होता है, नाच होता है, वे जरूर आनंदित हो रहे हैं। मैं यहाँ दुख में मरा व्यर्थ ही राम-राम जप रहा हूँ। मैंने अपने हाथ से रेगिस्तान चुन लिया। राम-राम जपो और रेगिस्तान में रहो। कोई मरूद्यान भी पता नहीं चलता ;न कहीं राम मिलते हैं। वेश्या मजा लूट रही है। वेश्या के घर से उठते हुए आनंद के, हंसी के झोके, और ईर्ष्या भर जाती।