ओशो- संन्यास सरल हो तो अहंकार को मजा कहा? मेरे पास लोग आते हैं। वे कहते हैं कि संन्यास आप देते हैं तो इसके लिए कोई विशेष आयोजन करना चाहिए। विशेष आयोजन संन्यास के लिए! वे ठीक कहते हैं, क्योंकि ऐसा होता है : अगर जैन दीक्षा होती है तो देखा, कैसा घोड़ा, बैंडबाजा इत्यादि […]Read More
अध्यात्म की अनूठी यात्रा: परमात्मा कठिन नहीं—कठिन है हमारा अहंकार,
ओशो- जब तक योग योगातीत न हो जाये, जब तक व्यक्ति ‘मैं कर्ता हूं?, इस भाव से समग्रतया मुक्त न हो जाये, तब तक कुछ भी नहीं हुआ। तब तक तुमने सिर्फ रंग बदले। तब तक तुम गिरगिट हो : जैसा देखा वैसा रंग बदल लिया। लेकिन तुम नहीं बदले, रंग ही बदला। ‘सदा से […]Read More
योगातीत और भोगातीत होकर ही अष्टावक्र की क्रांति समझ में
ओशो- इस सूत्र को ठीक से समझना। न भोग बचा न योग बचा, न संसार बचा न स्वर्ग बचा—तो अब कर्ता होने के लिए जगह ही न बची। कुछ करने को बचे तो कर्ता बच सकता है। कुछ करने को न बचा। रात घटना। उस सांझ —वृक्ष कुछ न था।. हैरानी में पड़े। संसार छोड़ […]Read More
ओशो- अष्टावक्र जब कहते कि अभी और यहीं तो वे यही कहते हैं. कितने चलो, बीस साल नहीं बीस जन्म सही देश—निकाले पर रहे भीख मांगी बहुत भूल गये बिलकुल याद को बिलकुल सुला दिया—सुलाना ही पड़ा; न सुलाते तो भीख मांगनी मुश्किल हो जाती; द्वार—द्वार दरवाजे—दरवाजे भिक्षापात्र ले कर घूमे…। अष्टावक्र यह कह रहे […]Read More
प्रश्न- सदा से खोजियो का यह अवलोकन रहा है कि परमात्म—उपलब्धि अत्यंत दुःसाध्य घटना है। लेकिन आप जैसे बुद्धपुरुष सदा से इस बात पर जोर देते रहे हैं कि परमात्मा अभी और यहीं घट सकता है। क्या बार—बार यह कहना एक चुनौती और एक प्रयास करने की एक विधि है, एक उपाय है? ओशो- सत्य […]Read More
अध्यात्म की अनूठी यात्रा: डर मंदिर से नहीं, टूट जाने
ओशो- मेरा अपना अनुभव यह है कि नास्तिक के भीतर तथाकथित आस्तिकों से सत्य की खोज की ज्यादा गहरी आकांक्षा होती है। वह मंदिर जाने से डरता है, तुम डरते ही नहीं। तुम डरते नहीं, क्योंकि तुम्हारे भीतर कोई ऐसी प्रबल आकांक्षा नहीं कि तुम पगला जाओगे। तुम मंदिर हो आते हो, जैसे तुम दुकान […]Read More
अध्यात्म की अनूठी यात्रा: “आनंद की कसौटी : परमहंस और
ओशो- पागल और परमहंस में एक बात समान है कि दोनों ने बुद्धि गंवाई। एक ने होशपूर्वक गंवाई है, एक ने बेहोशी में गंवाई है—इसलिए फर्क बहुत है। जमीन— आसमान जितना फर्क है। लेकिन फिर भी एक समानता है। इसलिए कभी—कभी तुम्हें पागल में परमहंस दिखाई पड़ेगा और कभी—कभी परमहंस में पागल। तो भूल—चूक हो […]Read More
स्वच्छता रैंकिंग बढ़ाने भिलाई-चरोदा महापौर की नागरिकों से अपील
भिलाई-चरोदा/ नगर निगम भिलाई 03 चरोदा के महापौर निर्मल कोसरे ने शहरवासियों से स्वच्छता अभियान में सक्रिय सहभागिता की अपील की है, ताकि नगर की स्वच्छता रैंकिंग को और बेहतर बनाया जा सके। स्वच्छता रैंकिंग को सुदृढ़ करने निगम की सतत पहल महापौर निर्मल कोसरे एवं निगम कमिश्नर डी.एस. राजपूत के निर्देशानुसार नगर निगम का स्वास्थ्य […]Read More
“यह दुनिया दुखियों की भीड़ है, आनंदित आदमी यहाँ पागल
ओशो- एक बात खयाल में रखना : आनंद सत्य की परिभाषा है। जहां से आनंद मिले, वहीं सत्य है। इसलिए तो हमने परमात्मा को ‘सच्चिदानंद’ कहा है। आनंद उसकी आखिरी परिभाषा है। सत्य से भी ऊपर, चित से भी ऊपर, आनंद को रखा है, ‘सच्चिदानंद’ कहा है। सत्य एक सीढ़ी नीचे, चित एक सीढ़ी नीचे—आनंद […]Read More
अध्यात्म की अनूठी यात्रा: “मांग ही सबसे बड़ी बाधा है:
ओशो- अष्टावक्र कहते. ‘अभी और यहीं!’ मांग तो सदा कल के लिए होती है। मांग तो ‘अभी और यहीं’ नहीं हो सकती। मांग का स्वभाव वर्तमान में नहीं ठहरता। मांग का अर्थ ही है : हो, कल हो, घड़ी भर बाद हो, क्षण भर बाद हो—हो। मांग अभी तो नहीं हो सकती, मांग के लिए […]Read More

