जैसे इंजिन में तेल डालते हैं न, तो तेल के कारण इंजिन के कल-पुर्जे जल्दी नहीं घिसते, ऐसे ही अच्छी आदतें व्यक्तियों के बीच में तेल का काम करती हैं, जल्दी घिसने नहीं देतीं, जल्दी झगड़ा खड़ा नहीं होता। आदत बना ली कि जब भी कोई रास्ते पर मिला, जयरामजी! यह तेल है। इससे रास्ता बना रहता है। इससे झगड़ा-झांसा ज्यादा खड़ा नहीं होता। हालांकि न तुम्हें मतलब है जयराम जी से, न उन्हें मतलब है जयरामजी से! राह पर कोई मिला, पूछ लिया–कहिए कैसे हैं? न तुम्हें मतलब है! और इसीलिए कभी-कभी कोई ऐसा नासमझ भी हो जाता है, कि तुमने पूछा, कहिए कैसे हैं, वह रोक कर सारी कथा बताने लगता है कि कैसा है! तब तुम घबड़ाते हो, कि भई, हमारा यह मतलब नहीं था! मगर अब अच्छे फंसे! यह तो पूछ कर फंस गए। वह बताने लगा अपनी सारी कहानी कि पत्नी बीमार है और बेटे की नौकरी नहीं लग रही है–अब तुमने पूछा! नहीं, कोई इसलिए तो पूछता भी नहीं कि कहिए कैसे हैं। यह तो सिर्फ बीच का तेल है। इससे जिंदगी घिसटती-पिसटती चलती रहती है। अच्छी आदतें लुब्रीकेंट हैं! उससे ज्यादा नहीं।