जीवित महिला को ‘मृत’ बताकर राशन कार्ड निरस्त! खाद्य विभाग की बड़ी लापरवाही से 8 सदस्यीय गरीब परिवार पर संकट, 250 से अधिक परिवारों पर भी कार्रवाई के आरोप
भिलाई-3। सरकारी रिकॉर्ड की एक चूक किसी गरीब परिवार के लिए कितनी बड़ी मुसीबत बन सकती है, इसका ताजा उदाहरण भिलाई चरोदा नगर निगम क्षेत्र के गांधीनगर वार्ड में सामने आया है। यहां गरीबी रेखा (बीपीएल) श्रेणी की हितग्राही रोकसाना को सरकारी दस्तावेजों में मृत घोषित कर दिया गया, जबकि वह जीवित हैं। हैरत की बात यह है कि इसी आधार पर उनका राशन कार्ड भी निरस्त कर दिया गया। अब आठ सदस्यीय परिवार के सामने दो वक्त की रोटी का संकट खड़ा हो गया है।
यह मामला सामने आने के बाद खाद्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जिस विभाग की जिम्मेदारी गरीबों तक खाद्यान्न पहुंचाने की है, वही विभाग कागजी लापरवाही के कारण जीवित लोगों को मृत घोषित कर उनके अधिकार छीन रहा है। यह केवल एक प्रशासनिक भूल नहीं, बल्कि गरीब परिवारों के संवैधानिक अधिकारों पर सीधा प्रहार माना जा रहा है।
पूर्व पार्षद लावेश मदनकर ने विभाग की कार्यप्रणाली पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि यह केवल रोकसाना का मामला नहीं है। भिलाई चरोदा नगर निगम क्षेत्र में इस प्रकार के करीब 250 राशन कार्ड निरस्त होने की शिकायतें सामने आ रही हैं। उन्होंने कहा कि यदि सरकारी अधिकारी बिना जमीनी सत्यापन किए लोगों को मृत घोषित कर देंगे, तो गरीब आखिर न्याय के लिए किसके दरवाजे पर जाएगा? उन्होंने आरोप लगाया कि विभागीय लापरवाही का खामियाजा उन परिवारों को भुगतना पड़ रहा है, जिनके घर का चूल्हा सरकारी राशन पर निर्भर है।
मदनकर ने कहा, “सरकार गरीबों के कल्याण की योजनाओं का दावा करती है, लेकिन विभागीय अधिकारियों की लापरवाही उन दावों की पोल खोल रही है। कागजों में लोगों को मृत घोषित कर देना और राशन कार्ड निरस्त कर देना बेहद गंभीर विषय है। यदि समय रहते सुधार नहीं किया गया तो प्रभावित परिवारों के साथ मिलकर बड़ा जनआंदोलन किया जाएगा।”
वहीं, महापौर निर्मल कोसरे ने भी इस मामले को गंभीर बताते हुए खाद्य विभाग के अधिकारियों को कठघरे में खड़ा किया। उन्होंने कहा कि उन्होंने अधिकारियों से इस संबंध में चर्चा की है और तत्काल त्रुटि सुधारने की मांग की है।
महापौर ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा, “लगता है खाद्य विभाग के कुछ अधिकारी अब अस्पतालों और श्मशानों से भी तेज काम करने लगे हैं। बिना किसी पुष्टि के जीवित लोगों को कागजों में मृत घोषित कर रहे हैं। यदि यही हाल रहा तो एक दिन अधिकारी खुद तय कर देंगे कि कौन जिंदा है और कौन नहीं। यह प्रशासन नहीं, बल्कि गरीबों के साथ संवेदनहीन मजाक है।”
उन्होंने आगे कहा, “गरीबों का राशन छीनने वालों को जवाब देना होगा। यदि अधिकारियों ने जल्द इस गलती को नहीं सुधारा, तो मैं अपने नगर की जनता के साथ सड़क से लेकर शासन स्तर तक लड़ाई लड़ूंगा। किसी भी गरीब परिवार के साथ अन्याय बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।”
यह मामला केवल एक परिवार तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी व्यवस्था की गंभीर खामियों की ओर संकेत करता है। यदि वास्तव में बड़ी संख्या में राशन कार्ड गलत तरीके से निरस्त किए गए हैं, तो इसकी उच्चस्तरीय जांच कर दोषी अधिकारियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए। गरीबों के अधिकारों से जुड़ी योजनाओं में इस प्रकार की लापरवाही न केवल प्रशासन की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करती है, बल्कि यह उन परिवारों की आजीविका पर भी सीधा आघात है, जिनके लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली जीवनरेखा साबित होती है।

