“राष्ट्र नहीं, व्यक्तियों का जमावड़ा: भारत की राजनीतिक और सामाजिक बीमारी पर ओशो की तीखी चेतावनी”
ओशो – राष्ट्र की कोई आत्मा, समाज की कोई अपनी आत्मा न हो, तो जो हो रहा है, वह होगा। और विघटन होगा, और डिसइंटीग्रेशन होगा। मद्रास कहेगा–मैं अलग। बंगाल कहेगा–मैं अलग। केरल कहेगा–मैं अलग। और अभी तो यह प्रांतों की बातें हैं, जिले भी पीछे नहीं रहेंगे। बड़ौदा कहेगा, अहमदाबाद के साथ बंधे रहने की जरूरत क्या है? और अगर भारत की बुद्धि को पूरा खुल कर खेलने का मौका दिया जाए…मैंने सुना है, बुद्ध के जमाने में भारत में दो हजार राज्य थे… अगर भारत की बुद्धि को पूरा मौका दिया जाए या भारत की प्रतिभा कोे, ‘जीनियस’ को, जिसको हम बड़ा आदर करते हैं–तो दो हजार से ज्यादा राज्य फिर हो सकते हैं। कोई कठिनाई नहीं है।
हमारी बुद्धि ही अजीब है। नर्मदा किसकी है, मध्यप्रदेश की है कि गुजरात की? झगड़ा चलेगा वर्षों तक। वहां प्यासा कोई मर जाए, खेत में पानी न पहुंचे, यह झगड़ा चलता रहेगा। नर्मदा का पानी किसका? कौन कितना ले? यह तय नहीं हो सकता। नर्मदा हिंदुस्तान की नहीं है। या तो मध्य प्रदेश की है या गुजरात की है। और एक जिला मैसूर में रहना चाहिए कि महाराष्ट्र में, इस पर गोलियां चलेंगी, दंगे-फसाद होंगे–आश्चर्यजनक है! आने वाले बच्चे हमारे सोचेंगे, क्या हमारे मां-बाप पागल थे? क्या था इनके दिमाग में? हो क्या गया था? जिला गुजरात में होता है कि महाराष्ट्र में, फर्क क्या पड़ता है? जिला हिंदुस्तान का है। लेकिन हिंदुस्तान का न कोई जिला है, न कोई नदी है, न कोई पहाड़ है। सब पहाड़, सब नदियां, सब जिले किसी प्रदेश के हैं। और चीजें आगे बढ़ती चली जाएंगी।
अभी मैं पटना में था, बिहार में। वहां वे कहते हैं, हमारा झारखंड अलग होना चाहिए। मध्य प्रदेश में बुंदेलखंड के लोग कहते हैं, बुंदेलखंड अलग होना चाहिए। तैलंगाना अलग होना चाहिए, विदर्भ अलग होना चाहिए। सब अलग होना चाहिए। अगर हम पूरा मौका दें तो एक-एक आदमी, आखिरी जो नतीजा है एनालिसिस का, वह यह है–कि मैं अलग, तुम अलग। मैं एक अलग राष्ट्र, तुम एक अलग राष्ट्र! इसने हमें तीन हजार वर्ष तक पीड़ित किया था, वह फिर वैसा होना शुरू हो गया है।
यह हैरानी की बात है, कि हमने अंग्रेजी की गुलामी में पहली दफे एक राष्ट्र की शक्ल ली है। हम इसके पहले कभी राष्ट्र नहीं थे। यह इतना दुखद है कि गुलाम कौम राष्ट्र बनी और आजाद कौम कभी राष्ट्र नहीं थी।
चर्चिल ने हिंदुस्तान की आजादी के दिन, पंद्रह अगस्त को यह कहा था–कि तुम फिकर मत करो, उनको आजाद हो जाने दो, तुम एक पंद्रह-बीस साल में देखोगे, कि उन्होंने गुलामी की सब व्यवस्था फिर से पैदा कर ली है। दो सौ साल का हमारा उन्हें अनुभव है। और उसने कहा–कि सब टूट जाएंगे और बिखर जाएंगे। वह आपस में लड़ जाएंगे, टूट जाएंगे, बिखर जाएंगे। और हमने वह सारा बिखराव शुरू कर दिया है; लेकिन इन बिखरावों को अगर हमने इमिजिएट समझा, कि अभी का मामला है, तो गलती हो जाएगी। फिर हल…फिर हल नहीं होगा। इसलिए मैंने कहा, ‘आज’ बिलकुल आज नहीं है। हमारा पूरा अतीत उसके पीछे खड़ा है। आज की राजनीति बिलकुल आज की नहीं है। पूरा अतीत पीछे से धक्के दे रहा है। उसे अगर हम समझेंगे, तो हम काॅ.जेज, कारण अलग कर सकते हैं। और अगर हमने समझा कि पीछे का कोई सवाल नहीं है, यह सवाल बिलकुल आज का है, तो हम जो भी हल करेंगे, वे हल दस परेशानियां खड़ी करंगे और हल नहीं हो सकता है। पूरे भारत के चित्त को बदलना जरूरी है।
तीन चार बातें मैंने कहीं–उन्हें दोहरा दूं–पहली बात! अच्छा आदमी राजनीति के प्रति वैराग छोड़े और बुरे आदमी को राजनीति में जाने से रोकने के सब उपाय होने चाहिए। लेकिन बुरे आदमी की अपनी तरकीबें हैं। वह कहता है, यह सवाल अच्छे-बुरे आदमी के चुनाव का थोड़े ही है। यह सवाल तो कम्युनिस्ट, कांग्रेसी और सोशलिस्ट का है। अच्छे और बुरे के बीच विकल्प ही नहीं होता है। वह कहता है, सोशलिस्ट को चुनो, कम्युनिस्ट को चुनो, कांग्रेस को चुनो! किसको चुनना है? और तीनों बुरे आदमी खड़े हैं। सवाल अच्छे और बुरेे के बीच नहीं है, सवाल कम्युनिस्ट और कांग्रेसी, जनसंघी और कांग्रेसी के बीच है। और दोनों मौसेस भाई हैं, इसमें कोई फर्क नहीं है।
अभी मुझसे किसी ने पूछा कि मोरार जी को चाहेंगे? मोरार जी भाई को चाहेंगे आप कि इंदिरा को? तो मैंने कहा, इंदिरा बहन हैं, और मोरार जी भाई हैं। भाई-बहन में कोई बहुत बड़ा फर्क नहीं है। झगड़े घरेलू हैं और भीतरी! और कोई आ जाए तो फर्क नहीं पड़ता। भाई उतने साबित होंगे, जितनी बहन साबित होने वाली है। भाई-बहन के झगड़े हैं, चुनाव बहुत ज्यादा नहीं है। लेकिन हम इस चुनाव में पड़ जाते हैं, कि इसको चुनें या उसको।
मैंने सुना है कि जापान में बैरे बहुत कुशल हैं। सारी दुनिया में आप जाएं, तो वह आपसे पूछेंगे कि आप भोजन के बाद चाय लेंगे कि नहीं लेंगे? जापान में ऐसा नहीं पूछेंगे। वह पूछेंगे–भोजन के बाद चाय लेंगे या काफी? विकल्प आपको ‘नहीं’ का देते ही नहीं। चाय लेंगे या काफी? तो आदमी को सीधे ही सूझता है कि क्या लंू, चाय लूं कि काफी? अगर किसी ने पूछा कि भोजन के बाद चाय लेंगे कि नहीं लेंगे, तो विकल्प दो है, कि लेना है कि नहीं लेना है। पहले वाला बैरा ठीक पोलिटिकल नहीं है, राजनीतिक नहीं है। उसकी समझ कम है। वह आदमी को गलत विकल्प दे रहा है, इनकार करने का विकल्प भी दे रहा है। नहीं, विकल्प यह देना चाहिए कि चाय लोगे कि काफी? तो कुछ आदमी सोचेगा, कि यह ले लूं कि वह। उसे ‘नहीं’ का खयाल ही नहीं आता, इमिजिएट नहीं का खयाल नहीं आता।
हमारे सामने आदमी खड़े होते हैं। एक लाल रंग की टोपी लगाए है, एक सफेद रंग की टोपी। वह दोनों एक जैसे हैं। वह कहते हैं, किसको चुनते हैं, सफेद टोपी कि लाल टोपी को? और हमको खयाल आता है कि इसको चुनें कि उसको? लेकिन यह खयाल नहीं आता कि बुरे आदमी को चुनें कि अच्छे आदमी को? इसका विकल्प नहीं है।
बुरे आदमी को हटाना जरूरी है–सब तरफ से, चाहे वह कांग्रेसी हो और चाहे कम्युनिस्ट हो, चाहे सोशलिस्ट हो, यह सवाल नहीं है। हिंदुस्तान के सामने सवाल यह है, कि अच्छा आदमी कैसे जाए और एक नई हवा पैदा करनी चाहिए कि अच्छे आदमी को चुनो; वह किस पार्टी का है, यह दो कौड़ी की बात है? पार्टियों का मूल्य उतना बड़ा नहीं है। अंततः आदमी कैसे जाए? बुरे आदमी को हटाने की, अच्छे आदमी के वैराग को तोड़ने की जरूरत है।
दूसरी बात आपसे मैंने कही कि यह जो इतने लंबे दिनों से हम जिस भाषा में सोचते रहे हैं, जो हमारे सोचने की कैटेगरीज हैं, धारणाएं हैं, उन धारणाओं ने ‘व्यक्ति’ को ज्यादा मूल्य दे दिया है, ‘समाज’ का कोई मूल्य नहीं! समाज का मूल्य स्थापित करना जरूरी है। यह मैंने कहा–कि हम व्यक्ति को आदर देते हैं, पूजा देते हैं, काम की कोई चिंता नहीं है। व्यक्तियों का कोई आदर और पूजा नहीं होती है, और हम गैर लोकतांत्रिक हैं। हमारी चिंतना छोटे और बड़े की भाषा में सोचती है। अब तक हमारा लोकतांत्रिक मन नहीं हो सका और लोकतंत्र खड़ा करने चले हैं! यह मैंने कहा कि हीनभाव के लोग राजनीति में तीव्रता से दौड़ते हैं, और हीनभाव का आदमी खतरनाक है। क्योंकि एक तरह से रुग्ण है, बीमार है। उन आदमियों को भेजने, सोचने, तैयार करने की जरूरत है, जो न हीन हैं, न श्रेष्ठ हैं–जो, जो हैं, वह होने में आनंदित हैं–जो कहीं से भी हट सकते हैं बिना कठिनाई के, कहीं भी काम में लाए जा सकते हैं। व्यक्ति-पूजा बंद करनी जरूरी है। और समाज का हित कैसे हो, यह चिंतन ज्यादा मूल्यवान है।
राष्ट्र नहीं है, समाज नहीं है हमारे पास। वह पैदा करना है। वह पैदा नहीं होगा हमारे पुराने ढांचे में सोचने से, और हम उस पुराने ढांचे के कारण जो भी सोचते हैं, उससे राष्ट्र टूटता है। उससे राष्ट्र टूटता चला जाता है। हम जो भी सोचते हैं–कहीं सोचते हैं, भाषावर प्रांत हो, तो राष्ट्र टूटता है। अब हम सोचते हैं, एक राष्ट्रभाषा हो, उससे भी राष्ट्र टूट रहा है। हम जो भी करते हैं, उससे चीजें टूटती हैं, बिखरती हैं, बनती नहीं है। कोई जरूरत नहीं है राष्ट्रभाषा की। जब राष्ट्र ही नहीं है, तब राष्ट्रभाषा कैसे होगी? राष्ट्र हो तो राष्ट्रभाषा भी हो सकती है। राष्ट्र है ही नहीं, आप राष्ट्रभाषा के लिए चिल्ला रहे हैं। नहीं हो सकता। देश में पच्चीस राष्ट्र हैं, पच्चीस राष्ट्रभाषाएं रहेंगी अभी। और अगर एक लादने की कोशिश की, तो ये पच्चीस टूट जाने वाले हैं, एक लादी नहीं जा सकती। अभी तो राष्ट्र को पैदा करो। उन पच्चीस को निकट लाओ और राष्ट्र बनेगा, तो राष्ट्रभाषा बन जाएगी। राष्ट्रभाषा राष्ट्र की छाया है, इसके पहले नहीं आती। राष्ट्र है ही नहीं, तो राष्ट्रभाषा भी और राष्ट्र को तोड़ने का कारण बनेगी। राष्ट्रभाषा तो बन नहीं सकती।
मैं आपसे कहता हूं–राष्ट्रभाषा अभी पचास साल नहीं बन सकती; क्योंकि राष्ट्र है नहीं। तो बेहतर है, मत उपद्रव खड़े करो। जितनी भाषाएं हैं, उनको स्वीकार कर लो। थोड़ी मेहनत होगी, अनुवाद से काम चलाओ; लेकिन राष्ट्रभाषा का सवाल छोड़ दो। जो भी तोड़ता हो, वह सवाल छोड़ दो; जो जोड़ता हो, वे सवाल इकट्ठे करो। जिससे हम जुड़ते हों, इकट्ठे होते हों, करीब आते हों, वह सब हम करें और एक राष्ट्र और एक समाज बने। एक लोकतांत्रिक चित्त पैदा हो, और भले आदमी के लिए हमने जो दीवालें उठाई हैं, वह हम अलग कर दें, तो शायद जैसा उलझाव हमें दिखाई पड़ती है, वह बदल सकता है।
मैं नहीं जानता, क्योंकि मैं कोई राजनीतिज्ञ नहीं हूं, लेकिन दिखता जो है, वह मैंने आपसे कहा। आपने शायद सोचा होगा कि आज की राजनीति पर मैं उन्हीं सब बातों की बातें करूंगा, जो रोज सुबह आप अखबार में पढ़ रहे हैं, तो आपने गलत सोचा होगा। उससे मुझे कोई मतलब नहीं है। सिर्फ वह लक्षण हैं बीमारियों के, लक्षण हैं सिर्फ ऊपर के। भीतरी बीमारियां और हैं।
लक्षणों के सोचने से कुछ हल नहीं होता है। एक आदमी को बुखार चढ़ा है, एक आदमी हाथ को गरम देख कर समजे कि गरम होना बीमारी है, ठंडा पानी डालो, ठंडा करो इस आदमी को। हो जाएगा आदमी ठंडा! बिलकुल ठंडा हो जाएगा! नहीं, बीमारी है, बुखार नहीं है, बीमारी। वह जो गर्मी मालूम हो रही है, वह बीमारी नहीं है, बीमारी कहीं भीतर है, बुखार सिर्फ खबर है। बुखार सिर्फ खबर दे रहा है, कि आदमी भीतर कहीं रुग्ण हो गया है। उस भीतर के रोग को खोजो, तो यह बुखार चला जाएगा। बुखार सिर्फ सिंबालिक है। तो यह जो हमें दिखाई पड़ रहा है, सब फीवर है, सब बुखार है, इसको बीमारी मत समझ लेना। नहीं तो ठंडा पानी डालने से और मुश्किल होगी। इसको नहीं, इसके भीतर कहां कारण छिपे हैं।
कुछ कारण मैंने सुझाए, आप सोचना। हो सकता है ठीक हों, हो सकता है गलत हों। कोई मेरी बात ठीक होनी चाहिए, ऐसा सवाल नहीं है। वह पुराने जो व्यक्तिवादी लोग थे, उनका दावा था यह, कि हम जो कहते हैं वह ठीक है। वह मैं नहीं कहता। मैं कहता हूं, समाज सोचे। मैंने कहा, आप सोचें। सोचने से ठीक निकलेगा, मेरे कहने से ठीक नहीं होता। न आपके कहने से ठीक होता है।
हम सब एक डायलाॅग में जुड़ जाएं। हम सोचें, विचारें। समाज सोचे तो धीरे-धीरे मंथन होगा और ठीक निकलेगा। ठीक निकल सकता है। आशा खोने की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन दिल्ली की तरफ देखो, तो बहुत निराशा होती है। दिल्ली की तरफ देख कर एकदम निराशा होगी। दिल्ली की तरफ देखें ही मत। यह बड़ा देश है, दिल्ली तो कुछ भी नहीं है। बड़े देश की तरफ देखें, इसके एक-एक आदमी को सोचने-विचारने के लिए तैयार करें। हवा पैदा करें, तो शायद एक दिन आ सकता है, कि इस तरह की बेवकूफियां जो चलती हैं रोज, इनसे छुटकारा हो जाए। छुटकारा न हुआ तो देश का बहुत नुकसान पीछे अतीत में हुआ है, आगे भी होगा।
हम विकसित मुल्कों से कम से कम तीन सौ वर्ष पीछे हैं। अमरीका जहां है, वहां से हम तीन सौ वर्ष पीछे हैं; ज्यादा हो सकते हैं। अगर हमें हमारे साधन पर छोड़ दिया जाए तो हम तीन सौ साल बाद भी चांद पर नहीं पहुंच सकते। बहुत पीछे हैं, और उनकी गति रोज बढ़ती चली जा रही है। मैं एक आंकड़ा पढ़ रहा था–कि जीसस से मरने के अठारह सौ वर्ष तक मनुष्य का जितना विकास हुआ अठारह सौ वर्षो में उतना पिछले डेढ़ सौ वर्षों में हुआ है, और पिछले डेढ़ सौ वर्षों में जितना विकास हुआ, उतना पिछले पंद्रह वर्षों में हुआ है, और पिछले पंद्रह वर्षों में जितना विकास हुआ, वह आने वाले डेढ़ वर्ष में होगा।
लेकिन हम कहां होंगे? हम अपनी बैलगाड़ी लिए अपना चरखा चलाते रहेंगे। हमारी मर्जी। कोई हमें रोक नहीं सकता, धक्का नहीं दे सकता। लेकिन दुनिया आगे चली गई है, आदमी बहुत आगे चला गया है, हम बहुत पीछे रह गए हैं। हमारे झगड़े भी बहुत टुच्चे हैं, ओछे हैं, छोटे हैं, बहुत छोटे हैं। झगड़े भी बड़े हों तो भी दुख मालूम पड़ता है। झगड़े भी बड़े हों, तो मुल्क ऊपर उठता है। झगड़े ही बड़े छोटे हैं। कोई बहुत बड़े झगड़े नहीं हैं। यह सोचने की आपसे प्रार्थना की।
क्रमशः…..

