“व्यक्ति-पूजा से राष्ट्र निर्माण तक: भारतीय राजनीति और समाज पर ओशो की ऐतिहासिक चेतावनी”
ओशो – आज अगर किसी संन्यासी को भी सम्मानित होना हो, तो पहले किसी मिनिस्टर को खोजना पड़ता है। मिनिस्टर संन्यासी के पास आकर हाथ जोड़ कर बैठ जाए, तो संन्यासी भी प्रतिष्ठित हो जाता है; नहीं तो संन्यासी का भी अब प्रतिष्ठित होने का कोई उपाय नहीं। अगर ऐसी स्थिति हमने बनाई, तो स्वाभाविक होगा कि सभी एंबीशियस, सभी महत्वाकांक्षी लोग राजनीति की तरफ दौड़ें।
सभी ओछे, क्षुद्र मन के, हीन मन के लोग राजनीति की तरफ दौड़ें, तो वहां अगर एक अंतर-कलह की…और जहां बहुत लोग संघर्ष करने में लगें, वहां के साधन अशुद्ध हो जाएं तो आश्चर्य नहीं! दिल्ली वैसा ही अड्डा बन गया! छोटे अड्डे–अहमदाबाद है, भोपाल है, पटना है। सब छोटे अड्डे हैं। और छोटे-छोटे अड्डे हैं। फिर एक-एक गांव छोटा-छोटा अड्डा हो गया।
सारा मुल्क, सारा देश सत्ता पाने की चेष्टा में इस भांति पागल है कि समझ के बाहर हैै; कि यह मुल्क कुछ और भी सोचेगा? और भी विचारेगा, कोई और दिशा नहीं है? कोई जिंदगी में और क्रिएटिव, सृजनात्मक दिशा नहीं है? कोई दिशा नहीं मालूम पड़ती। सब अखबार उनके, सब रेडियो उनके लिए, सब सम्मान उनके लिए, तो फिर सभी आदमी पागल हो जाएंगे। और जो आदमी जितना पागल होता है उतना ज्यादा पद का आकांक्षी होता है।
पागल आदमी कहीं ऊंची जगह खड़े होकर घोषणा करना चाहता है; कि मैं कुछ हूं। समबडी होने की बड़ी गहरी आकांक्षा पागल आदमी में होती है। अगर दुनिया कभी अच्छी हुई, तो शायद हमें पता चले कि दुनिया के आधे पागल इसीलिए पागल होने से बच गए, कि उन्हें राजनीति में जाने का मौका मिल गया। अगर हिटलर राजनीति में न जाए, तो पागलखाने में हो। अगर माओ राजनीति में न जाए, तो राजनीति में जाने के सिवाय और कोई जगह नहीं मिल सकती, जहां वह हो।
हमारे राजनीतिज्ञ उतने बड़े पागल नहीं होते हैं। उतने बड़े राजनीतिज्ञ भी नहीं हैं। छोटे-मोटे पागलखानों मंे इनकी भी जगह हो सकती है, बहुत बड़े पागलखाने में इनके लिए जगह नहीं हो सकती है। लेकिन पागलपन पैदा हुआ है। और एक मैडनेस है। यह भी अगर हम गौैर करें; तो हमारे अतीत की धारणाओं से ही निकलती है बात। पद के बड़े ही सम्मान करन ेवाले लोग रहे। सत्ता और शक्ति के, धन के और व्यक्ति-पूजा के हम इतने दीवाने रहे हैं कि वह हमारा सब जारी है। अब भी वैसे का वैसा ही जारी है। लोकतंत्र ऐसे निर्मित नहीं हो सकता। यह धारणा हमें छोड़नी पड़ेगी। यह रुग्ण धारणा है, छोड़नी पड़ेगी कि व्यक्ति पूजा के योग्य है या व्यक्ति छोटे और बड़े हैं।
इंग्लैंड में चर्चिल की जरूरत थी, बुला लिया। युद्ध आया, चर्चिल की जरूरत थी; चर्चिल हुकूमत में आ गया। युद्ध गया, दुनिया सोच भी नहीं सकती कि चर्चिल ऐसे चुपचाप विदा कर दिया जाएगा। हम कभी विदा नहीं करते। हम कभी कर ही नहीं सकते थे; क्योंकि हम सोचते कि इतना बड़ा काम किया चर्चिल ने, अब हम कैसे छोड़ सकते हैं! तो पूजा करो, मूर्तियां खड़ी करो, मालाएं पहनाओ, गुणगान करो। अब हम यह काम करते हैं। चर्चिल को हम कभी नहीं छोड़ सकते थे। इंग्लैंड ने ऐसी सरलता से छोड़ दिया, जैसे काम पूरा हो गया। बुलाया था, काम पूरा हो गया, आदमी गया। व्यक्ति की कोई पूजा नहीं है, व्यक्ति का उपयोग है।
हम व्यक्ति की पूजा करते हैं, व्यक्ति का कोई उपयोग नहीं। तो एक दफा एक आदमी छाती पर बैठ जाए, उसकी जरूरत भी पूरी हो जाए, तो वह आदमी फिर बैठा ही चला जाता है। और कोई आदमी इस
देश में रिटायर तो होना नहीं चाहता। कोई कभी रिटायर नहीं होना चाहता। वह तो जो लोग मर गए है, अगर उनको फिर मौका मिल जाए, तो कब्रों से वापस लौट आएं। वह तो अगर मरघटों में खबर कर दी जाए कि राष्ट्रपति का चुनाव हो रहा है, मुर्दे भी खड़े हो सकते हैं। तो मुर्दे सब खड़े हो जाएंगे। कोई आदमी सत्तर-पचहत्तर साल का, कितना ही हो जाए, वह किसी पद से हटना नहीं चाहता है। भारत की राजनीति में एक उपद्रव यह है कि वृद्धजन हटना नहीं चाहते। तो जो युवा हैं, जो उनकी जगह जाना चाहते हैं, संघर्षरत हैं, वह इस कलह का कारण बन गए हैं।
वृद्धों को हटाने योग्य क्षमता आनी चाहिए। सच तो यह है, कि वृद्धों को पता होना चाहिए, कि बच्चों का खेल है कुछ। उम्र ज्यादा हो जाए, प्रौढ़ता बढ़ जाए, तो दूसरे बच्चों को खेलने का मौका होना चाहिए। उन्हें हट आना चाहिए। कोई हटना नहीं चाहता, जब तक उसे धक्का न दिया जाए। और धक्का देने पर भी जब तक वह कुर्सी को पकड़ रहे किसी तरह से, आखिरी दम तक; तब तक वह पकड़े रहेगा, छोड़ नहीं सकता। ऐसी बेहूदगी…पर एब्सर्डिटी हो गई है, कि उस सब में बड़ा अजीब मालूम पड़ रहा है, कि यह मुल्क कैसे आगे बढ़े!
वृद्ध को हटने के योग्य क्षमता जुटानी चाहिए। जो काम कर सकते हैं, व्यक्तियों की पूजा नहीं–काम का सम्मान होना चाहिए। और काम पूरा हो जाए तो व्यक्तियों को हटना चाहिए और हमें हटाने की हिम्मत होनी चाहिए। यह अकृतज्ञता नहीं है। वह कोई ग्रेटिट््यूट की कमी नहीं है। यह सिर्फ इस बात की स्वीकृति है कि बीमार था आदमी, हमने डाक्टर को बुला लिया था। अब बीमारी खत्म हो गई, अब डाक्टर को हम वहीं बिठाए हुए है; तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी। डाक्टर को अब विदा कर देना चाहिए, सम्मानपूर्वक।
हिंदुस्तान आजाद हुआ। जिन लोगों ने स्वतंत्रता का संघर्ष किया, जरूरी नहीं है कि वे सत्ता करने में भी कुशल हों। यह बिलकुल उलटी बात है। इससे कोई संबंध नहीं है। सच तो यह है कि जो लोग सेवा करने में कुशल हैं, उनके हाथ में सत्ता देना बड़ा खतरनाक हो सकता है। जो लोग युद्ध के–जो लोग स्वंतत्रता के युद्ध में लड़ने में, जिन्होंने बड़ी क्षमता दिखलाई है, जरूरी नहीं है कि वे सत्ता करने में भी उतनी ही कुशलता दिखाएं। लेकिन ऐसा ही हो गया है।
वह जेल जाना सर्टिफिकेट हो गया सत्ता करने का। जेल जानेवाले को हमें सम्मान देना चाहिए, लेकिन सम्मान देने का मतलब यह नहीं कि वह सत्ता में बैठ जाए। तो कोई भी ऐरा-गैरा आदमी, जो किसी भी तरह जेल गया था, या किसी तरह से अब भी जेल का झूठा सर्टिफिकेट ला सकता हो, तो वह सत्ता का हकदार हो गया। हमें व्यक्तियों की फिकर है, हमें कामों की जरा भी फिकर नहीं है। इसलिए सारी की सारी राजनीति अजीब हालत में पड़ गई। देश आजाद हुआ था। सोचा जाना चाहिए था कि कौन लोग काम के साबित हो सकते हैं? नहीं, यह नहीं सोचा गया। किन लोगों ने आजादी की लड़ाई लड़ी थी। आजादी की लड़ाई लड़ना एक बात है, सत्ता करना बिलकुल दूसरी बात है! जीवन को व्यवस्था देना, समाज को गति देना बिलकुल दूसरी बात है।
तो ऐसी हालत हो गई कि जो लोग अंगूठा से निशान लगाते हैं, वे शिक्षामंत्री होकर बैठ गए हैं। इसकी कोई फिकर ही नहीं रही, कि शिक्षामंत्री होने का क्या मतलब हो सकता है! एक अत्यंत अव्यवस्था और अराजकता पैदा हुई है। वह अब भी जारी है। उसमें अभी भी कोई फर्क नहीं हो गया है। व्यक्ति की पूजा होनी छोड़ देनी चाहिए। काम महत्वपूर्ण है, व्यक्ति नहीं। और राष्ट्र महत्वपूर्ण है, समाज महत्वपूर्ण है, व्यक्ति नहीं! कौन हितकर है, उसे हम पुकारेंगे; कौन हितकर नहीं है, उसे हम विदा कर देंगे। विदा अपमान नहीं है, विदा केवल काम का पूरा हो जाना है। लेकिन वह कोई भाव मुल्क में पैदा नहीं होता है।
और तीसरी आखिरी बात आपसे कहना चाहता हूं, जिससे उलझन भारी होती चली जाती है। भारत का जो मन है, वह जो हमारा नेशनल माइंड है, उस राष्ट्रीय चित्त में एक बहुत गहरी बात है और वह बात बिलकुल असामाजिक है, एंटी-सोशल है। भारत के पांच-छह हजार वर्ष के चिंतन ने एक-एक व्यक्ति को निपट स्वार्थी बना दिया है। अपने तक केंद्रित कर दिया है। हर व्यक्ति का अपना मोक्ष है भारत में। हर व्यक्ति का अपना सुख है।
सामूहिक सुख, सामूहिक मुक्ति, सामूहिक आनंद की कोई कल्पना ही नहीं है–है ही नहीं। हमने कभी सोचा ही नहीं इस तरह। हम तो हरेक को समझाते हैं, पति को हम कहते हैं, तू अपनी फिकर कर, पत्नी अपनी फिकर करे, तेरा बेटा अपनी फिकर करे। कोई किसी के सुख में भागीदार नहीं है। हमने एक-एक व्यक्ति को इस तरह तोड़ दिया है, कि जिसको कम्युनिटी कहें, समाज कहें, वह भारत में पैदा ही नहीं हुआ। प्रत्येक व्यक्ति अपनी फिकर कर रहा है, अपना मोक्ष, अपना स्वर्ग खोज रहा है। अपने पाप-पुण्यों का हिसाब रख रहा है।
दूसरे से क्या संबंध है? दूसरे से कोई संबंध नहीं है। एक अंतर्संबंधी की भावना ही पैदा नहीं हुई। इसलिए समुदाय कैसे सुखी हो? समाज कैसे सुखी हो? समाज कैसे बढ़े, आगे विकसित हो? यह हमारे मन में नहीं है। एक-एक व्यक्ति अपनी-अपनी फिकर में लगा है। एक-एक व्यक्ति पहले मोक्ष की फिक्र करता था, अब एक-एक व्यक्ति पद की, धन की! एक-एक व्यक्ति अपनी-अपनी फिकर कर रहा है। इसलिए पूरा मुल्क एक बड़ी अंतर-कलह में, एक कांफ्लिक्ट में और युद्ध में पड़ा हुआ है। जहां भी व्यक्तियों के व्यक्तिगत स्वार्थ बहुत महत्वपूर्ण हों और समाज का कोई स्वार्थ न हो, वहां यह हो जाना सुनिश्चित है। राजनीति में उसके सब फफोले और घाव और फोड़े फूटने शुरू हो गए हैं। यहां एक-एक व्यक्ति अपने में उत्सुक है। यहां कोई व्यक्ति किसी दूसरे में उत्सुक नहीं है।
एक किताब मैं पढ़ रहा था–‘उन्नीस सौ पचहत्तर’ किताब का नाम है। लेखकों ने घोषणा की है–बड़ेे अर्थशास्त्री हैं, तीन लेखक–उन्होंने घोषणा की है, कि भारत में उन्नीस सौ अठहत्तर तक, उन्नीस सौ पचहत्तर और अस्सी के बीच इतना बड़ा अकाल पड़ेगा कि जिसमें दस करोड़ से बीस करोड़ तक लोग मर सकते हैं। और मुझे लगता है कि उन्होंने जो दलीलें दी हैं, वे सब सही हैं, उनमें कुछ कमी नहीं है। यह हो सकता है। दिल्ली में एक बहुत बड़े नेता से, नाम उनका नहीं लूंगा–नाम लेने से इस मुल्क में बड़ी मुश्किल होती है; बड़ी झंझटें खड़ी हो जाती हैं–उनका नाम नहीं लूंगा, उनसे मैंने कहा कि आपने यह किताब पढ़ी है? उन्नीस सौ अठहत्तर में अर्थशास्त्री कहते हैं–भारत में मुल्क के इतिहास का सबसे बड़ा अकाल पड़ेगा। उन्होंने कहा, उन्नीस सौ अठहत्तर अभी बहुत दूर है, अभी तो उन्नीस सौ बहत्तर का सवाल है। उन्नीस सौ अठहत्तर से किसको मतलब है? न हम रहेंगे, न सवाल है। वह जो रहेंगे, वह जानेंगे।
किसी को मतलब नहीं है पूरे देश से। प्रत्येक को अपने से मतलब है कि मैं कितनी देर सत्ता में, संपत्ति में, रह सकता हूं। इसके बाद बात खत्म हो जाती है। पूरा मुल्क–हमारा पूरा मुल्क व्यक्तियों की भीड़ है, समाज नहीं है। हम एक भीड़ हैं, न हम राष्ट्र हैं, न हम समाज हैं, हम एक क्राउड हैं, बड़ी। इसलिए हम कभी भी गुलाम हो सकते हैं। गुलाम रहे हम एक हजार साल इसीलिए! क्योंकि इस मुल्क में कोई समाज था ही नहीं। अगर एक आदमी का कोई कत्ल कर रहा था–दूसरे लोगों ने सोचा, हमें क्या मतलब है? अगर एक प्रांत जीत लिया गया, एक राज्य हर गया–दूसरे राज्यों ने सोचा, हमें क्या मतलब है? लोग हारते चले गए, किसी को मतलब न था।
दुश्मन बहुत कम आए थे हिंदुस्तान में। शायद बाबर हजार-पांच सौ आदमियों को लेकर प्रविष्ट हुआ था। करोड़ों के मुल्क को जीत लेना कितना कठिन था; लेकिन यहां एक-एक आदमी था, यहां मुल्क था ही नहीं। तो पांच सौ आदमी एक आदमी के खिलाफ बहुत मजबूत पड़ गए। इतने थोड़े से अंग्रेज इतने बड़े मुल्क पर, इतने दिन हुकूमत कर सके, उसका और कोई कारण न था। यहां कोई समाज था ही नहीं। उनका एक समाज था। अगर तीन लाख अंग्रेज भी भारत में थे, तो वे हमसे ज्यादा थे। हम चालीस करोड़ बेकार थे। वे तीन लाख का एक समाज था, एक कम्युनिटी थी। यह चालीस करोड़ की भीड़ है। इस भीड़ में कोई अर्थ नहीं, किसी को किसी से कोई प्रयोजन नहीं।
अगर भारत को कहीं भी, इन जीवन की सारी गंदगियों को, राजनीति के सारे उपद्रवों को शांत करना हो, और एक ठीक राजपथ पर भारत के भविष्य को ले जाना हो, तो भारत की व्यक्तिगत स्वार्थ की प्रवृत्ति को तोड़ना ही पड़ेगा। एक-एक बच्चे को सिखाना पड़ेगा, कि ‘तुम्हारा सुख’ जैसी चीज नहीं होती। ‘हमारा सुख’ जैसी चीज होती है। ‘तुम’ जैसा कुछ नहीं होता, ‘हम’ जैसी कोई चीज होती है। सुख व्यक्ति का नहीं होता, हम सबका सामूहिक अंतर्सम्बंध है। और दुख भी अंतर्संबंध है। लेकिन हम भारत को समझा रहे हैं। एक आदमी गरीब है, तो हम कहते हैं, अपने कर्मों का फल भोग रहा है। हम समाज से तोड़ देते हैं उसको। हम यह नहीं कहते कि समाज की गलत व्यवस्था का फल भोग रहा है। हम कहते हैं, अपने कर्मों का फल भोग रहा है।
क्रमशः…..

