“विज्ञान ने संसार को बचा लिया, पर मनुष्य खो गया_ “ओशो”
ओशो– धर्म का चिंतन बहुत भिन्न बात है। धर्म को न तो मतलब है आपकी उम्र से, न धर्म को मतलब है आपके खेत में पानी से, न धर्म को मतलब है आपके मकान से, न आपके कपड़े से। धर्म को तो सीधा मतलब है आपसे। आप कैसे हैं भीतर, आनंदित! शांत! प्रफुल्लित! परमात्मा के प्रति कृतज्ञता से भरे हुए, धन्यवाद से भरे हुए! प्रार्थना से भरे हुए, प्रेम से भरे हुए, आप कैसे हैं! विज्ञान आप को छोड़ कर सब व्यवस्था कर लेगा और आप छूट जाएंगे। लेकिन धर्म आपकी भी व्यवस्था करना चाहता है भीतर से कि आप भी विकसित हो सकें।
एक छोटी सी कहानी, अपनी बात मैं पूरी करूंगा।
मैंने सुना है कि रामतीर्थ जब जापान गए तो टोक्यो के एक बड़े मकान में आग लग गई थी। वह उस मकान के सामने ठहरे हुए थे। मकान में आग लग गई है रात को। हजारों लोग मकान की आग बुझाते हैं। राम बाहर आकर खड़े होकर देख रहे हैं। मकान का मालिक रो रहा है। छाती पीट रहा है। लोग सामान निकाल रहे हैं बाहर–तिजोड़ियां, कपड़े, बहुमूल्य फर्नीचर। वह सब निकाला जा रहा है। सब सामान निकल गया है। फिर उन लोगों ने आकर मकान के मालिक को पूछा कि कुछ और जरूरी रह गया हो तो बता दें क्योंकि अब आखिरी बार मकान के भीतर जाया जा सकता है। उसके बाद लपटें इतनी बढ़ जाएंगी कि भीतर जाना असंभव है। उस मकान के मालिक ने कहा, मुझे कुछ भी होश नहीं। मुझे कुछ समझ में नहीं आता, तुम एक दफा और जाकर देख लो। कुछ बचा सको तो बचा लो। वे लोग भीतर गए। भीतर जाकर वे बहुत मुश्किल में पड़ गए। मकान मालिक का इकलौता बेटा भीतर ही सोता रह गया था। वे उसकी लाश को लेकर बाहर आए। वह तो मर चुका था। वे बाहर चिल्लाते, रोते, छाती पीटते आए और उन्होंने मकान मालिक को कहा, हमसे बड़ी भूल हो गई। हम तो मकान का सामान बचाने में लग गए और मकान का मालिक भूल गया, वह मर ही गया।
रामतीर्थ ने अपनी डायरी में लिखा कि आज इस मकान में जो घटना घटी है, उसे देख कर मुझे खयाल आता है कि सारी दुनिया में यह घटना घट रही है। आदमी सामान को बचाने में लग गया है और आदमी, खुद मालिक सामान का, भीतर मरा जा रहा है, समाप्त हुआ जा रहा है।
विज्ञान सामान को बचा सकता है, आदमी को नहीं। विज्ञान बाहर की सारी व्यवस्था को बचा लेगा, आत्मा को नहीं।
इसलिए दूसरी बात निरंतर ध्यान में रखनी जरूरी है कि वैज्ञानिक बुद्धि अधार्मिक बुद्धि न हो जाए। वैज्ञानिक बुद्धि धार्मिक बुद्धि हो, वैज्ञानिक बुद्धि धर्म के विपरीत न चली जाए। वैज्ञानिक बुद्धि बाहर की व्यवस्था करे और धर्म को मनुष्य के भीतर की व्यवस्था करने दे। और धर्म भी एक विज्ञान ही है। धर्म परम विज्ञान है। धर्म है चेतना का विज्ञान। बाहर जो है उसकी खोज साइंस है, भीतर जो है उसकी खोज धर्म है। और मनुष्य दोनों तरफ फैला है, बाहर भी, भीतर भी। इन दो में से हम एक को काटेंगे तो मनुष्य मर जाएगा। पूरब ने बाहर को काटा, पश्चिम ने भीतर को काटा। आने वाले भविष्य में भारत के युवकों को ध्यान रखना है कि हम दोनों के समन्वय को उपलब्ध हो सकें। अगर यह समन्वय हो सका तो भारत के जीवन में सुख भी, और आनंद भी…। सुख मिलता है बाहर से और आनंद मिलता है भीतर से। अगर यह संभव हो सका समन्वय तो शक्ति भी और शांति भी–शक्ति मिलती है बाहर से और शांति मिलती है भीतर से–संभव हो सकती है। परमात्मा करे, यह संभव हो सके। क्रमशः….
ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-3
🕉️ धर्म चेतना का विज्ञान है, विज्ञान व्यवस्था का — ओशो
ओशो का कहना था कि धर्म का चिंतन बहुत भिन्न बात है। धर्म का संबंध न आपकी उम्र से है, न आपके खेत से, न आपके कपड़ों या मकान से। धर्म का सीधा मतलब है — आपसे, आपके भीतर से।
आप कैसे हैं — आनंदित, शांत, प्रफुल्लित, कृतज्ञ, प्रेममय — यही धर्म का सार है।
धर्म भीतर की व्यवस्था करता है, विज्ञान बाहर की
ओशो कहते हैं — विज्ञान आपको छोड़कर सब कुछ व्यवस्थित कर देगा। लेकिन धर्म चाहता है कि आपकी भी व्यवस्था हो, भीतर से आप विकसित हों।
विज्ञान संसार को संभाल सकता है, लेकिन आत्मा को नहीं। इसलिए धर्म मनुष्य की आंतरिक उन्नति का मार्ग है, जो भीतर की शांति और जागृति लाता है।
रामतीर्थ की कहानी: जब मकान बचा, मालिक खो गया
ओशो ने अपने प्रवचन में एक गहरी कथा सुनाई —
उन्होंने कहा, “मैंने सुना है कि रामतीर्थ जब जापान गए, तब टोक्यो के एक बड़े मकान में आग लग गई।
रात को हज़ारों लोग आग बुझाने में जुटे थे। मकान का मालिक छाती पीट रहा था, और लोग उसके कीमती सामान — तिजोरियाँ, कपड़े, फर्नीचर — बाहर निकाल रहे थे।”
जब सब कुछ बाहर आ गया, किसी ने मालिक से पूछा —
“अब कुछ बचा हो तो बताओ, आख़िरी बार अंदर जा सकते हैं।”
मालिक बोला — “मुझे कुछ समझ नहीं आता, तुम ही देख लो।”
वे लोग अंदर गए और देखकर सन्न रह गए — मकान मालिक का इकलौता बेटा भीतर ही जल गया था।
वे लाश लेकर बाहर आए। सब रोने लगे — “हमसे बड़ी भूल हो गई, हम सामान बचाते रह गए और मालिक खो गया।”
“आज यही दुनिया में हो रहा है” — ओशो
ओशो ने अपनी डायरी में लिखा —
“आज जो उस मकान में हुआ, वही पूरी दुनिया में हो रहा है।
मनुष्य अपने सामान, धन और सुविधाओं को बचाने में लगा है — लेकिन स्वयं को भूल गया है।
आत्मा भीतर मरी जा रही है, जबकि बाहर के घर और कारोबार बचाए जा रहे हैं।”
विज्ञान वस्तु को बचाता है, धर्म आत्मा को
ओशो स्पष्ट करते हैं कि विज्ञान बाहर की दुनिया को बचा सकता है, लेकिन आदमी को नहीं।
विज्ञान पदार्थ का विज्ञान है, जबकि धर्म चेतना का विज्ञान है।
इसलिए आवश्यक है कि वैज्ञानिक बुद्धि अधार्मिक न हो जाए —
विज्ञान बाहरी व्यवस्था करे, और धर्म मनुष्य के भीतर की व्यवस्था।
पूरब और पश्चिम — संतुलन की पुकार
ओशो कहते हैं — “पूरब ने बाहर को काट दिया, पश्चिम ने भीतर को।
अब भारत के युवाओं को वह समन्वय बनाना है — जहां विज्ञान की शक्ति और धर्म की शांति दोनों एक साथ हों।”
सुख बाहर से मिलता है, आनंद भीतर से।
शक्ति बाहर से आती है, शांति भीतर से।
अगर दोनों का मेल हो गया, तो मनुष्य पूर्ण हो जाएगा।
ओशो का संदेश: भीतर को मत भूलो
ओशो का यह प्रवचन हमें याद दिलाता है —
विज्ञान हमें सुविधा दे सकता है, लेकिन आनंद नहीं।
सच्चा धर्म वही है जो हमें भीतर से विकसित करे,
जहाँ कृतज्ञता, प्रेम और प्रार्थना का प्रवाह हो।



