“भौतिकता और अध्यात्म — दोनों को अपनाओ, तभी खिलेगा जीवन का फूल: ओशो”

 “भौतिकता और अध्यात्म — दोनों को अपनाओ, तभी खिलेगा जीवन का फूल: ओशो”

ओशो- जहां परमात्मा का मंदिर बन सकता था पृथ्वी पर, वह पृथ्वी अस्वीकृत थी, मंदिर ही न बना। निमंत्रण व्यर्थ ही पड़ा रहा। परमात्मा को आने के लिए जगह भी नहीं मिल सकी। हम दोनों तरफ चूक गए। यहां प्रकृति के साथ हमारा संबंध गहरा न हो पाया, वहां परमात्मा के लिए दिया गया निमंत्रण व्यर्थ हो गया क्योंकि वह निमंत्रण तभी स्वीकार हो सकता था, जब जड़ों को प्रेम किया गया हो तभी फूलों को दिए गए निमंत्रण स्वीकार होते हैं। आने वाले भविष्य में हमें इस भूल को दोहराने से बचना होगा।क्या इसका यह मतलब है कि मैं कह रहा हूं कि भारत भौतिकवादी हो जाए? नहीं, इसका यह मतलब नहीं है। इसलिए दूसरी बात भी आप से कह दूं। भारत ने यह भूल की थी, यह आधी भूल थी–जिंदगी के आधे को अस्वीकार करने की, आधे को स्वीकार करने की। जिंदगी पूरी स्वीकृत होनी चाहिए। उसमें पदार्थ भी है, परमात्मा भी है। उसमें शरीर भी है, आत्मा भी है। उसमें अंधेरा भी है, प्रकाश भी है। पूरी जिंदगी स्वीकृत हमने नहीं की। आधी जिंदगी स्वीकार करके हमने बहुत दुख झेल लिया। लेकिन अब एक नया डर पैदा हो गया है।

पश्चिम ने भी आधी जिंदगी स्वीकार की है। उसने सिर्फ जड़ों को ही स्वीकार कर लिया है और जड़ों में ही रत हो गया है और उसने ऊपर से ठूंठ ही काट दिया है वृक्ष का। उसने फूलों के, पत्तों के आने की संभावना ही मिटा दी है। क्योंकि उनका कहना है, फूल सब झूठ हैं, सब सपने हैं, फूल कहीं आते नहीं। जड़ें ही सत्य हैं। उन्हीं को पानी देना, उन्हीं की पूजा करना। तो पश्चिम जड़ों को बहुत पानी दे रहा है। जड़ें बहुत मोटी होती चली गईं। अब वे पृथ्वी के ऊपर भी निकलने लगी हैं। जड़ों का जाल ही फैलता चला जा रहा है, वह बहुत कुरूप है। क्योंकि उन जड़ों में फूल आने का उपाय न रहा। फूल पश्चिम ने अस्वीकार कर दिए हैं।

पश्चिम है निपट भौतिकवादी और पूरब था निपट अध्यात्मवादी। यह दोनों ही अधूरी गलतियां हैं। आधे-आधे की भूल है।

आज दूसरा डर यह है कि हम पुरानी भूल से बच कर कहीं पश्चिम की भूल न पकड़ लें, इसकी बहुत संभावना है। इसकी बहुत संभावना है क्योंकि जब आदमी एक भूल छोड़ता है तो दूसरी अति पर, दूसरी एक्सट्रीम पर चला जाता है। घड़ी की पेंडुलम की तरह हमारा चित्त बाएं से जाता है तो फिर ठीक दाएं पहुंच जाता है। और एक बहुत मजे की बात है, जब घड़ी का पेंडुलम बाईं तरफ जाता है, तब कभी खयाल नहीं किया होगा कि बाईं तरफ जाता हुआ पेंडुलम दाईं तरफ जाने की शक्ति इकट्ठी करता है। जितना वह बायां जाता है, उतना दायां जाने का मोमेंटम इकट्ठा करता है। जाता है बायां, तैयारी हो रही है दाएं जाने की। जाता है दायां, तैयारी हो रही है बाएं जाने की।

पश्चिम भौतिकता में बहुत गहरे गया है और उसकी तैयारी हो गई है अध्यात्म में जाने की। वह दूसरी अति की भूल करेगा। इसलिए महेश योगी या और किसी को पश्चिम में जो सम्मान मिलता है, वह दूसरी अति को दिया गया सम्मान है। वह पश्चिम दूसरी अति पर जाएगा। और हम भी तैयार हो गए हैं यहां, अध्यात्म में बहुत गहरे चले गए हैं। अब हमारा पेंडुलम भौतिकवाद की तरफ जाने की तैयारी में है। तो आज हमारा युवक अगर भौतिक को, शरीर को बहुत सम्मान दे रहा है, आदर दे रहा है तो कोई आश्चर्य नहीं है, वह दूसरी अति में जाने की कोशिश कर रहा है। खतरा यह है कि कहीं पश्चिम पूरब न हो जाए और पूरब पश्चिम न हो जाए। और यह इसका डर है।

मैंने सुना है, एक गांव में ऐसा एक बार हुआ। एक गांव में एक बहुत बड़ा नास्तिक था और एक बहुत बड़ा आस्तिक था और दोनों बहुत गांव को परेशान किए थे। वादी परेशान किए ही रहते हैं। आस्तिक कहता था कि ईश्वर है और सारे गांव को समझाता था। उसकी दलीलों में ताकत थी, जान थी। और नास्तिक कहता था, ईश्वर नहीं है, उसकी दलीलें भी कम ताकतवर न थीं। थोड़ी ज्यादा ही ताकतवर थीं। आस्तिक समझा जाता, नास्तिक मिटा जाता। नास्तिक समझाता, आस्तिक मिटा देता। गांव परेशान हो गया। और गांव के लोगों ने कहा, तुम दोनों कोई निर्णय ही कर लो तो अच्छा था, ताकि हमारी परेशानी मिट जाए। एक पूर्णिमा की रात दोनों का विवाद हुआ। दोनों ने सख्त से सख्त दलीलें दीं–आस्तिक ने आस्तिकता की, नास्तिक ने नास्तिकता की। विवाद रात भर चला। और आखिर सुबह परिणाम यह हुआ कि नास्तिक की दलीलों से आस्तिक प्रभावित हो गया और आस्तिक की दलीलों से नास्तिक प्रभावित हो गया। उस गांव में फिर एक आस्तिक रहा, फिर एक नास्तिक रहा। गांव की मुसीबत बरकरार रही, गांव की मुसीबत वही की वही रही।

आज पूरब पश्चिम को समझा रहा है, पश्चिम पूरब को समझा रहा है। धर्म के संबंध में पूछना हो तो पश्चिम पूरब के चरणों में आकर बैठता है। और विज्ञान के संबंध में पूछना हो, पूरब को पश्चिम के चरणों में जाकर बैठ जाना पड़ता है। आज अगर विज्ञान की फिकर करनी हो, आॅक्सफोर्ड और कैंब्रिज, हार्वर्ड में बैठना पड़ता है। और अगर धर्म की फिकर करनी हो तो ऋषिकेश आना पड़ता है। लेकिन ये दोनों कहीं खतरा न हो जाए, जमीन फिर वही भूल में न पड़ जाए कि हम आधे-आधे फिर आधे-आधे बदल जाएं। उससे कुछ फर्क न पड़ेगा।

तो दूसरी बात ध्यान में रखने की है कि भारत को अपने अतीत की भूल से बचना है। और पश्चिम की अतीत की भूल से भी बचना है। अगर मैं पश्चिम के लोगों से कहूं, तो उनसे भी कहूंगा कि तुम अपनी भूल से भी बचना, और भारत की भूल से भी बचना। अन्यथा तुम भी मुश्किल में पड़ जाओगे। पूरी जिंदगी स्वीकृत होनी चाहिए। मेरा कहना है, भौतिकवाद जीवन का आधार बने, अध्यात्म जीवन का शिखर। न तो शिखर को इनकार करना उचित है, न बुनियाद को इनकार करना उचित है। जीवन इकट्ठा है। क्रमशः….

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-3 

 ओशो: जीवन आधा नहीं, पूरा स्वीकृत होना चाहिए

जहां मंदिर बन सकता था, वहां जगह ही नहीं मिली

ओशो कहते हैं —
“जहां परमात्मा का मंदिर बन सकता था पृथ्वी पर, वह पृथ्वी अस्वीकृत थी। मंदिर ही न बना। निमंत्रण व्यर्थ पड़ा रहा। परमात्मा को आने के लिए जगह भी नहीं मिल सकी।”

हमने दोनों तरफ चूक की —
न तो प्रकृति से हमारा संबंध गहरा हो पाया,
न ही परमात्मा के लिए दी गई जगह तैयार थी।

जड़ें प्रेम से सींची नहीं गईं, इसलिए फूल भी नहीं खिले।
ओशो चेतावनी देते हैं — “आने वाले भविष्य में हमें इस भूल को दोहराने से बचना होगा।”

 जिंदगी आधी नहीं, पूरी स्वीकृत होनी चाहिए

ओशो स्पष्ट करते हैं —
“क्या इसका अर्थ है कि भारत भौतिकवादी हो जाए? नहीं!”

भारत ने जिंदगी का केवल आधा हिस्सा स्वीकार किया —
आत्मा को अपनाया, लेकिन शरीर को अस्वीकार कर दिया।
जबकि जीवन दोनों का मेल है —
पदार्थ और परमात्मा, शरीर और आत्मा, अंधेरा और प्रकाश।

आधी जिंदगी स्वीकार करने से हमने बहुत पीड़ा झेली है।

 पश्चिम ने जड़ों को अपनाया, फूलों को काट दिया

जैसे भारत ने शरीर को छोड़ा, वैसे ही पश्चिम ने आत्मा को भुला दिया।
ओशो कहते हैं —
“पश्चिम ने जड़ों को ही सत्य मान लिया। फूलों को झूठ कहा। इसलिए फूल आने की संभावना ही खत्म कर दी।”

अब पश्चिम भौतिकता में गहराई तक डूब गया है।
उसकी धरती पर जड़ें बहुत मोटी हो गई हैं —
पर वृक्ष ठूंठ बन गया है, सुंदरता खो गई है।

पूरब था निपट अध्यात्मवादी, पश्चिम निपट भौतिकवादी

ओशो कहते हैं —
“पूरब और पश्चिम दोनों ने आधी-आधी भूल की है।
एक ने जड़ें छोड़ीं, दूसरे ने फूल काट दिए।”

अब डर यह है कि भारत अपनी पुरानी भूल से बचकर कहीं पश्चिम की भूल न पकड़ ले।
क्योंकि जब इंसान एक अति छोड़ता है, तो वह दूसरी अति में चला जाता है।

जैसे घड़ी का पेंडुलम —
बाईं ओर झूलता है, तो दाईं ओर जाने की ताकत जमा करता है।

 पूरब पश्चिम बन रहा है, पश्चिम पूरब बनने को तैयार

आज पश्चिम भौतिकता से ऊब चुका है।
वह अध्यात्म की ओर झुक रहा है।
और भारत अध्यात्म से ऊबकर भौतिकता की ओर दौड़ रहा है।

ओशो कहते हैं —
“खतरा यह है कि कहीं पश्चिम पूरब न हो जाए और पूरब पश्चिम न हो जाए। तब भी संतुलन नहीं आएगा।”

 आस्तिक-नास्तिक की कहानी: दो छोर, एक भूल

ओशो एक प्रतीकात्मक कथा सुनाते हैं —
एक गांव में एक बड़ा आस्तिक था और एक बड़ा नास्तिक।
दोनों अपनी-अपनी दलीलों से गांव को परेशान करते थे।

एक रात बहस में दोनों इतने प्रभावित हुए कि
आस्तिक नास्तिक बन गया और नास्तिक आस्तिक।
गांव की मुसीबत वहीं की वहीं रही।

जैसे पूरब और पश्चिम — जगहें बदलीं, पर भूल वही रही।

 विज्ञान के लिए पश्चिम, धर्म के लिए पूरब

आज हालात ऐसे हैं —
विज्ञान की बात करनी हो तो ऑक्सफोर्ड और हार्वर्ड जाना पड़ता है,
और धर्म की खोज करनी हो तो ऋषिकेश आना पड़ता है।

पूरब पश्चिम को धर्म सिखा रहा है,
पश्चिम पूरब को विज्ञान सिखा रहा है।

ओशो चेतावनी देते हैं —
“कहीं ऐसा न हो कि हम फिर आधे-आधे ही रह जाएं।”

 ओशो का अंतिम संदेश: जीवन का आधार और शिखर

“भारत को अपनी भूल से भी बचना है और पश्चिम की भूल से भी।
और पश्चिम को अपनी भूल से भी बचना है और भारत की भूल से भी।”

ओशो का निष्कर्ष:

“भौतिकवाद जीवन की बुनियाद बने,
अध्यात्म जीवन का शिखर बने।
न शिखर को इनकार करो,
न बुनियाद को अस्वीकार करो।
जीवन इकट्ठा है — पूरा, एकाकार।”

ओशो का यह संदेश समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है —
ना केवल ध्यान में बैठो, बल्कि धरती पर भी टिको।
ना केवल जड़ों को सींचो, बल्कि फूलों को भी खिलने दो।

तभी जीवन पूर्ण, सुंदर और दिव्य बनेगा।