दुखी आदमी कभी बोर नहीं होता, सिर्फ सुखी आदमी बोर होते हैं, बोर्डम जो है वह सुखी आदमी का गुणधर्म है
ओशो- सत्य की कोई परिभाषा नहीं हो सकती। यह हमारी आकांक्षा की परिभाषा है, सत्य की नहीं। हमारी आकांक्षा है कि सत्य ऐसा हो, सच्चिदानंद हो–सत् भी हो, चित् भी हो, आनंद भी हो–यह हमारी आकांक्षा है। यह आदमी की आकांक्षा है कि सत् दुख न हो, नहीं तो मर गए। यहां संसार दुख है और सत्य भी दुख है, मोक्ष भी दुख है तो फिर हम कहां जाएंगे। तो मोक्ष ऐसा हो जहां दुख बिलकुल न हो, मोक्ष ऐसा हो कि जहां अज्ञान बिलकुल न हो, ज्ञान ही ज्ञान हो। मोक्ष ऐसा हो जहां अंधेरा बिलकुल न हो, प्रकाश ही प्रकाश हो।
यह सच्चिदानंद जो है यह सत्य की परिभाषा नहीं है, यह हमारी आकांक्षा है और हमारी आकांक्षाएं हमें बड़ी प्रीतिकर लगती हैं। इसलिए जिस शास्त्र में यह लिखा है उस शास्त्र को भी हम बड़ा प्रेम करेंगे और अगर विवेकानंद यह कहेंगे तो वह भी बड़े गुरु हो जाएंगे। उसका कुल कारण इतना है कि हमारी आकांक्षाओं को तृप्ति मिल रही है। अगर कोई गुरु आए और कहे कि सत्य बड़ा दुखद है और एकदम अंधकारपूर्ण है और अज्ञान ही अज्ञान है तो आप कहेंगे कि आपकी क्या जरूरत है। आप यहां कैसे? हम तो काफी अज्ञान झेल रहे हैं, काफी दुख झेल रहे हैं और मोक्ष में भी यही होगा, तो फिर तो कोई उपाय नहीं। हमारी आकांक्षाएं हैं ऐसी कि आत्मा अमर है, कभी न मरें, हमें सुख ही सुख हो, दुख न हो।
लेकिन सत्य की यह परिभाषा नहीं है। मेरी तो अपनी समझ यह है कि जहां आनंद होगा वहां दुख के भी बड़े नये आयाम होंगे, होने ही चाहिए। अभी जिस दुख को हम जानते हैं वह बहुत छिछला है क्योंकि जिस सुख को जानते हैं वह भी बड़ा छिछला है। असल में इनकी मात्रा बराबर होती है। जिस दिन आनंद इतना गहरा होगा कि रोआं-रोआं कंप जाएगा, इस भूल में मत पड़ना कि उस दिन दुख भी उतना गहरा नहीं होगा, उस दिन दुख भी उतना गहरा होगा कि रोआं-रोआं कंप जाएगा। हमारी संवेदनशीलता बराबर बढ़ती है। एक आदमी को अगर सौंदर्य का बहुत बोध हो तो उसे कुरूपता का भी उतना ही बोध हो जाता है। यह असंभव है कि एक आदमी को सौंदर्य का ही सिर्फ बोध हो जाए और कुरूपता का बोध न हो। एक साथ ही बढ़ेगा। अगर एक आदमी को स्वच्छ रहने का बड़ा आनंद है तो उसे अस्वच्छ होने की पीड़ा बढ़ जाएगी उसी मात्रा में।
लेकिन हमारी आकांक्षा चाहती है कि ऐसी दुनिया हो जहां अंधेरा न हो, रोशनी ही रोशनी हो। हालांकि भगवान हमारी आकांक्षाएं पूरी नहीं करता, नहीं तो हम बड़ी मुश्किल में पड़ जाएं। अगर रोशनी ही रोशनी हो तो रोशनी बहुत घबड़ाने वाली हो जाए। रोशनी में भी सुबह जो हमें सुख मालूम पड़ता है उस सुख को पाने का अर्जन भी रात के अंधेरे में ही हमने किया है। और सुबह जब किसी के प्रेम में आनंद आता है तो वह किसी की घृणा में झेले गए दुख का भी उसमें हाथ है। यह अकेला नहीं है।
सत्य तो इतना बड़ा होगा कि उसमें दुख भी होगा, आनंद भी होगा, अंधेरा भी होगा और प्रकाश भी होगा और उसमें परमात्मा भी होगा और शैतान भी होगा। चूंकि सत्य तो पूरे को घेरेगा, उसमें अमरता भी होगी तो उसमें मृत्यु भी होगी, उसमें पूर्ण मृत्यु भी होगी। सत्य तो सब घेर लेगा जो है और हम जो हैं, पूरे को नहीं देखना चाहते हैं क्योंकि हम खुद ही घबड़ाते हैं कि पूरा दिखाई न पड़े, क्योंकि पूरा दिखाई पड़ने का बड़ा एक और ही मतलब होगा।
अभी मैं बात कर रहा था। कोई आया तो मैंने उससे कहा कि आ जाओ। किसी ने पूछा कि आप दोनों बातें एक साथ कर रहे हैं–आओ भी और जाओ भी। तो मैंने उसको कहा कि जिंदगी में तो दोनों साथ ही हैं, जहां आना है, वहां जाना जुड़ा हुआ है। आने का मतलब ही है, जाने की शुरुआत। और जवान होने का मतलब है, बूढ़ा होना। और जन्म लेने का मतलब है, मरने की तैयारी। पूरे सत्य को अगर हम देखने जाएंगे तो उसमें सब है अपनी पूर्णता में। लेकिन हमारी न तो उतनी हिम्मत है कि हम उतनी पूर्णता को देख सकें, हम तो काट कर च्वाइस करेंगे। तो वह जो परिभाषाएं हैं वे सब हमारे चुनाव हैं, हमारी आकांक्षाएं हैं।
अब ऋषि कहते हैं कि हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। अब इसमें ऋषि भगवान के खिलाफ बड़ी शिकायत कर रहा है। वह यह कह रहा है कि अंधकार क्यों? प्रकाश ही चाहिए। यानी वह कह रहा है कि तुमने बड़ी भूल की जो अंधकार दिया। सिर्फ प्रकाश चाहिए, मुझे तो प्रकाश की ओर ले चलो। सत्य तो अंधकार भी है और प्रकाश भी। वह जीवन भी है और मृत्यु भी, ये दोनों जो हमें विरोधी लगते हैं, जब हमें एक ही चीज के छोर दिखाई पड़ेंगे तभी हम जान जाएंगे कि क्या है! जब हम ऐसे विरोध को एक साथ जान पाएंगे तो हमारे चित्त से सब खंड विदा हो जाएंगे, फिर हमारी कोई आकांक्षा न रह जाएगी क्योंकि आकांक्षा का कोई मतलब नहीं। फिर अंधेरा होगा तो हम जानेंगे कि यह प्रकाश के आने की तैयारी है और प्रकाश होगा तो हम जानेंगे कि यह अंधेरे की तैयारी है और दुख होगा तो हम जानेंगे कि आस-पास कहीं सुख है और सुख होगा तो हम जानेंगे कि तैयार रहो, दुख आता है। वह हमारी तैयारी होगी और हम जानेंगे कि यह जीवन है। लेकिन अभिलाषाएं सुख देती हैं बहुत और धर्म के नाम पर बहुत कुछ तो हमारी मनोवांछनाएं हैं, इच्छाएं हैं जो चलती हैं और दुखी हम हैं, पीड़ित हम हैं!
बट्र्रेंड रसल ने एक बहुत बढ़िया बात कही है। उसने कहा है कि अगर दुनिया सच में सुख हो जाए तो धर्मगुरुओं का क्या होगा? क्योंकि दुखी लोग सुख की तलाश में निकलते हैं। अगर सच में दुनिया सुखी हो जाए तो कौन…कभी आपने भी खयाल किया है कि जब आप किसी क्षण में आनंद में होते हैं तो न तो ‘क्यों’ उठता है कि दुनिया क्यों है, मैं क्यों पैदा हुआ, यह भगवान ने क्यों बनाया है इसको? नरक है कि स्वर्ग है, कि नहीं! कुछ क्यों नहीं उठता? जब आप आनंद में होते हैं तो सब स्वीकार होता है–जो है, वह है! उसके होने में जरा भी कोई, कहीं जरा सा भी प्रश्न नहीं लगता। लेकिन जब आप दुख में होते हैं तब सब प्रश्न उठने शुरू हो जाते हैं। जब प्रश्न उठने शुरू हो जाते हैं तो उत्तर चाहिए। तो जो हमारे मन में अनुकूल होते हैं, उनको हम धर्म बना लेते हैं।
सच्चे उत्तर का धर्म नहीं बन पाता, मनोनुकूल उत्तर का धर्म बन जाता है। और सच्चा उत्तर जरूरी नहीं कि मनोनुकूल हो क्योंकि आवश्यक नहीं है कि आपके मन के अनुकूल सत्य चलता हो। हां, सत्य के अनुकूल आप चाहें तो चल सकते हैं। लेकिन सत्य को कोई बंधन आपके अनुकूल चलने का नहीं है। लेकिन मनोनुकूल उत्तर धर्म बन जाता है। जो उत्तर हमारे मन को भा जाता है और लगता है कि ठीक है, हमारी तृप्ति कर दी! हमारा प्रश्न, हमसे हल होता है।
मैं नहीं कहता कि इन बातों में कुछ रस है और विवेकानंद की बात आपको अच्छी लगती है वह इसलिए नहीं कि सच है, वह इसलिए कि आपके मन के अनुकूल है। अनुकूल नहीं है तो अच्छी नहीं लगती है।
क्या जीवन में केवल सुख ही सुख नहीं चाहा जा सकता?
यह हमने कल्पना कर ली है। लेकिन हमारी कल्पनाओं से कुछ हल नहीं होता है और हम कितने ही चाहें कि हम सुख-सुख को ही वरण कर लें और दुख को इंकार कर दें, हम यह समझ ही नहीं पा रहे हैं कि सुख को वरण करने में दुख हुआ जा रहा है और ऐसे जैसे एक सिक्का है और मैं उसका एक पहलू फेंक देना चाहता हूं। अब मैं पागल हो जाऊंगा, क्योंकि मैंने एक ऐसा काम शुरू किया है जो पूरा हो नहीं सकता है। एक हिस्सा फेंक देना चाहता हूं एक सिक्के का और एक हिस्सा बचा लेना चाहता हूं। अब ज्यादा से ज्यादा इतना ही हो सकता है कि जिस हिस्से को मैं बचा लेना चाहता हूं उसे ऊपर कर लूं और जिसे फेंक देना चाहता हूं उसे नीचे कर लूं। बस इससे ज्यादा कोई सफलता नहीं मिल सकती लेकिन कितनी देर ऊपर नीचे करूंगा। जिसको मैंने नीचे किया है उससे थोड़ी देर में मैं ऊब जाऊंगा क्योंकि तब तक उसे देखता रहूंगा और बड़े मजे की बात है कि दुख उतना उबाने वाला नहीं होता है जितना सुख उबाने वाला हो जाता है।
असल में दुखी आदमी कभी बोर नहीं होता। सिर्फ सुखी आदमी बोर होते हैं। बोर्डम जो है वह सुखी आदमी का गुणधर्म है। इसलिए आप हैरान होंगे कि जितना जो दुखी होता है उतनी आत्महत्या कम होती है। लेकिन कम परेशान नजर आते हैं, कम चिंता घेरती है, क्योंकि दुखी आदमी को बोर होने की फुर्सत नहीं है। वह अपने काम में लगा हुआ है। बदलने में लगा हुआ है कि सिक्का उलटा कर ले। लेकिन जब सिक्का उलटा हो जाएगा तब क्या करिएगा। एक दफा दुख को नीचे दबा दिया और सुख को ऊपर कर लिया, फिर क्या करिएगा और अब अगर सिक्के को उलटाया तो नीचे दुख है। तो जैसे ही एक आदमी सुखी हुआ कि उसकी मुसीबत शुरू हो गई।
देवताओं को अगर दुनिया में कोई दुख होगा तो बोर्डम का होगा। मोक्ष में भी अगर कोई दुख होगा तो बोर्डम का तो होगा और बोर्डम इतनी हो गई होगी कि मैं नहीं समझता कि मोक्ष में अब कोई एक भी बचा होगा, सब भाग गए होंगे। उनकी बोर्डम की तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते क्योंकि जहां सुख बिलकुल उपलब्ध हो वहां करिएगा क्या? वह तो दुख से लड़ने में रस है, सुख मिलता नहीं, उसके पाने की आकांक्षा में सारा मजा है और जब मिल जाता है तो थोड़ी देर बाद हम पाते हैं कि अब क्या करें! तब आप हैरान होंगे कि सुखी आदमी अपने हाथ से दुख भी खोजने लगता है। तो वह ऐसी तरकीबें करता है जिनसे अब दुख आए। क्रमशः……..
ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-३



