तलाक के बाद फिर साथ रहना चाहते थे दंपती, हाई कोर्ट ने कहा – डिक्री रद्द करना कानूनी रूप से संभव नहीं
Alert chhattisgarh! प्रतिनिधि|बिलासपुर |
बिलासपुर हाई कोर्ट में एक अनोखा मामला सामने आया, जहां आमतौर पर तलाक की अर्जी खारिज होने के खिलाफ अपील दायर की जाती है, वहीं इस बार स्थिति बिल्कुल उलट थी। पति-पत्नी ने आपसी सहमति से मिले तलाक को ही रद्द कराने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया।
फैमिली कोर्ट से मिला था आपसी सहमति का तलाक
बिलासपुर के सिविल लाइन क्षेत्र की महिला और मोपका निवासी युवक के बीच कुछ समय पहले वैवाहिक विवाद उत्पन्न हुआ था। रिश्तों में बढ़ती दूरियों के चलते दोनों ने साथ रहने के बजाय अलग होने का फैसला लिया। इसके बाद परिवार न्यायालय में आपसी सहमति से तलाक की अर्जी प्रस्तुत की गई, जिसे अदालत ने स्वीकार करते हुए तलाक की डिक्री पारित कर दी।
तलाक के बाद बदले हालात
तलाक के करीब दो महीने बाद दोनों के रिश्तों में नरमी आई। आपसी बातचीत और समझदारी से हालात सुधरे और दंपती ने दोबारा साथ रहने का निर्णय लिया।
याचिका में बताया गया कि 11 मार्च से 15 मार्च 2025 के बीच दोनों ने मथुरा की यात्रा की। ट्रेन टिकट, साथ बिताए समय की तस्वीरें और शादी की सालगिरह मनाने के प्रमाण भी अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए गए। दंपती का कहना था कि अब उनके संबंध सामान्य हो चुके हैं और वे फिर से वैवाहिक जीवन शुरू करना चाहते हैं।
हाई कोर्ट में डिक्री रद्द करने की मांग
पत्नी की ओर से हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर परिवार न्यायालय द्वारा पारित तलाक की डिक्री निरस्त करने की मांग की गई। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि परिस्थितियां बदल चुकी हैं और वे अब साथ रहना चाहते हैं, इसलिए तलाक आदेश को रद्द किया जाए।
डिवीजन बेंच का स्पष्ट मत
मामले की सुनवाई डिवीजन बेंच में हुई। अदालत ने कहा कि तलाक आपसी सहमति से हुआ था और विधि अनुसार प्रक्रिया पूर्ण कर डिक्री पारित की गई थी। ऐसे में केवल भावनात्मक आधार पर उस आदेश को रद्द नहीं किया जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि आपसी सहमति से पारित तलाक की डिक्री के विरुद्ध अब अपील की कोई गुंजाइश नहीं है। परिणामस्वरूप याचिका खारिज कर दी गई।
कानूनी स्थिति क्या कहती है?
विशेषज्ञों के अनुसार, आपसी सहमति से दिया गया तलाक अंतिम माना जाता है, जब तक कि उसमें किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि या धोखाधड़ी साबित न हो। दंपती यदि दोबारा साथ रहना चाहते हैं, तो उन्हें पुनः वैधानिक विवाह प्रक्रिया अपनानी पड़ सकती है।
यह मामला बताता है कि रिश्तों में बदलाव संभव है, लेकिन न्यायिक आदेशों को बदलना केवल भावनात्मक सहमति से संभव नहीं होता।

