जहां वासना है, वहां प्रार्थना हो भी तो झूठी है तो फिर परमात्मा से सन्मुख कैसे हो? “ओशो”

 जहां वासना है, वहां प्रार्थना हो भी तो झूठी है तो फिर परमात्मा से सन्मुख कैसे हो? “ओशो”

ओशो– संसार से विमुख होते ही परमात्मा से सन्मुखता हो जाती है। इसलिए मैं कहता हूं: जहां संसार खत्म हुआ वहीं परमात्मा शुरू हो जाता है। बाहर से भीतर की तरफ आ गए तो संसार से परमात्मा की तरफ आ गए। भविष्य से वर्तमान की तरफ आ गए तो संसार से परमात्मा की तरफ आ गए। तृष्णा से, वीतत्तृष्णा में आ गए, असंतोष से संतोष में आ गए।समझो। करने का बहुत कुछ नहीं है। समझ लेने की बात है। समझ आ जाए तो करना अपने आप इसके पीछे उतर आता है। जब भी अवसर मिले, तभी संतुष्ट होकर बैठ जाओ। संतुष्ट होकर यानी स्वयं में समाहित होकर। समाधान में! न कहीं जाना, न कहीं आना। न कुछ पाने को, न कुछ खोने को। बस वहीं ध्यान, वहीं बज उठेगी बांसुरी।और जितनी तुम बांसुरी सुनने लगोगे, उतनी ही साफ होने लगेगी; उतने ही स्वर स्पष्ट होने लगेंगे। सुनते-सुनते एक दिन तुम पाओगे कि यह बांसुरी बाहर नहीं बज रही है—यह बांसुरी तुम ही हो। तत्त्वमसि! यह तुम ही हो। परमात्मा तुम्हारे ही प्राणों में नाद उठा रहा है।

समझ की बात है। नासमझी में कुछ कर लोगे तो कुछ भी न होगा। नासमझी में तुम धन छोड़ दो, मकान छोड़ दो, पत्नी छोड़ दो, हिमालय भाग जाओ—करोगे क्या हिमालय में बैठ कर? तुम्हारा मन वहां भी वासनाओं में ही रचा-पचा रहेगा। बैठ कर हिमालय की गुफा में तुम सोचोगे कि अहा, सब छोड़ आया! अब स्वर्ग आने ही वाला है! अब थोड़े ही दिन की बात और है। आते ही होंगे रामजी, पुष्पक विमान पर ले जाएंगे! अप्सराएं तैयार ही हो रही होंगी। स्वर्ग में बंदनवार बांधे जा रहे होंगे कि महात्मा आ रहे हैं!यही बैठे-बैठे सोचोगे कि कौन सी अप्सरा चुननी है—उर्वशी ठीक रहेगी कि कोई और ठीक रहेगी? और फिर बैठे-बैठे थोड़ी देर में नाराजगी भी आएगी कि रामजी अभी तक नहीं आए; पुष्पक विमान का कुछ पता भी नहीं चल रहा है। कम से कम हनुमानजी को तो भेज ही देते! कोई संदेशवाहक तो आ जाता। इधर हम बैठे-बैठे परेशान हो रहे हैं। और सब छोड़ कर आ गए हैं। घर-द्वार छोड़ा; धन, पत्नी, बच्चे छोड़े—अब और क्या चाहिए!

ऐसे गुस्सा बढ़ेगा। क्रोध भभकेगा। शिकायत उठेगी, प्रार्थना नहीं।

जहां वासना है, वहां शिकायत है। जहां वासना है, वहां प्रार्थना हो भी तो झूठी है।तुम्हारी प्रार्थनाएं, तुम्हारी स्तुतियां, तुम्हारी पूजा—अगर उनके पीछे कुछ वासना है, कुछ मिलने का लोभ है—ज्यादा देर टिकने वाली नहीं। तीस मिनट पूरे हो जाएंगे, फिर? फिर तुम टूट पड़ोगे। क्योंकि जहां वासना है, वहां क्रोध है। क्योंकि जहां काम है, वहां क्रोध है। क्रोध काम की छाया है।प्रार्थना और वासना का फर्क यही है। प्रार्थना का अर्थ होता है: जो दिया है, इतना है कि धन्यवाद मेरा ले। वासना का अर्थ होता है: जो दिया है, यह कुछ भी नहीं है। मेरी योग्यता के योग्य ही नहीं है। कहां मैं पात्र आदमी, और क्या मुझे दिया है! अन्याय हो रहा है। सुध ले मेरी! बहुत हो चुका। सुनते थे कि तेरे द्वार पर देर है, अंधेर नहीं। देर भी हो गई, अब अंधेर भी हुआ जा रहा है।

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-३ 

पद घुुंघरू बांध
प्रवचन 12